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युद्ध अनिवार्य नहीं

चंद लहरें

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सारे विश्व के साथ भारत भी आक्रोश से ग्रस्त है पर यह कुछ अलग ढंग का आक्रोश है। विश्व के आक्रोश से इसका अधिक तालमेल नहीं। सम्पूर्ण विश्व के साथ इसकी चिन्ता भी कोरोना जन्य है अवश्य पर अपनी  सीमाओं  की सुरक्षा का प्रश्न इसके लिए अधिक महत्वपूर्ण है।  इसी ने देश में संभावित युद्ध का माहौल बना दिया है। एक देश, जिसकी सीमाएँ चीन जैसे महत्वाकाँक्षी, विस्तारवादी देश  से मिलती हों, उससे निपटने के लिए सेना को उससे जुड़ी सीमाओं पर तो मुस्तैद रहना ही होगा। हाल में गलवान घाटी में हुई झड़प ने अत्यधिक तनाव पैदा कर दिया है। अतः सेना को हर स्थिति से निपटने को तत्पर रहने की भी आवश्यकता है।

भारतीय मीडिया तो हर घड़ी भारतीय जनता को आश्वस्त करती प्रतीत होती है कि राष्ट्र की जल थल वायु सेना इतनी  सशक्त है कि शत्रु उसके सामने टिक नहीं सकते। जनता को भयरहित करने के उद्येश्य से कही  जा रहीं ये बातें अगर  सही हैं तो यह भी  गलत नहीं कि जिस शत्रु को हम मिनटों में परास्त करने की बात सोचते हैं, वह अपने उच्चतम मनोबल के साथ सर्वथा भयहीन हो नयी नयी योजनाएँ बनाने में रत है। निरंतर तरह तरह की राजनैतिक चालें चलकर अपने प्रभावक्षेत्र का विस्तार कर रहा है। माथे पर उसके शिकन नहीं है।

अपनी विस्तारवादी नीति के तहत वह नयी नयी दिशाएँ तलाश रहा है। पाकिस्तान पर तो उसका भरोसा अटूट है, नेपाल उसके प्रभावों में आ चुका है औरअब भूटान के एक ऐसे क्षेत्र पर अधिकार की योजना उसने बनाई है जिसके बहाने अरुणाचल पर अपने अधिकार को वह पुष्ट कर सके। ये स्थितियाँ इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि न तो वह अमेरिका से भयभीत है न ही भारत का अमेरिका के संभावित साथ होने से ही। अपनी शक्ति पर उसे विश्वास है।

विस्तारवादिता की नीति उसकी बहुत पुरानी है चीन के महाअस्तित्व की वह प्राणशक्ति है। धीरे धीरे और चुपके चुपके सीमाओं का विस्तार करते जाने की उसकी नीति में कर्ज देने से लेकर पड़ोसी देशों की आंतरिक गतिविधियों में विकास के नाम पर हस्तक्षेप अथवा डराना धमकाना सभी सम्मिलित हैं।चौदह देशों से उसकी सीमाएँ मिलती हैं उनकी तो बात ही अलग है ,वहाँ टंटा खड़े करने का तो मानो प्राकृतिक अधिकार है उसका पर बहुत सारे अन्य देशों में भी उसने अपनी विस्तारवादिता के नमूने पेश किए हैं।अब जबकि सारा विश्व उसकी नीतियों से परिचित होचुका है ,सबों का आक्रोश भी जाग्रत हो चुका है। कोरोना की समस्या का भी वहीं से उत्पन्न होना ने भी इस में काफी वृद्धि की है।

प्रश्न यह उठता है कि कोविड-19 काल में भी विस्तारवादी उसकी इन योजनाओं में कोई अन्तर क्यों नहीं आया है, जबकि पूरे विश्व की दृष्टि में वह कोरोना-  अपराधी के रूप में कटघरे में खड़ा है?अमेरिका विरोधी भावनाएँ ही इसके मूल में प्रतीत होती हैं। यह वर्चस्व की लड़ाई है जो भारत को भी अपने लपेटे में ले ले रही हैं ।सम्पूर्ण एशिया मे अपने एकमात्र प्रतिद्वन्द्वी के रूप में वह भारत को भी देखना नहीं चाहता किन्तु भारत को भी उसके आगे अब विनत भाव में रहना स्वीकार नहीं।चीन भारत की प्रगति में निरंतर बाधक बनना चाहता है भारत को दक्षिणएशियाई देशों मे प्रमुख आर्थिक, राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वी मानकर पाकिस्तान नेपाल तिब्बत आदिअपने कृपापात्र देशों के जरिए जानबूझकर आन्दोलित कर कश्मीर समस्याओं में उलझाए रखना चाहता है।  वहअपनी परंपरागत महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए एक जिद्द्दी और चतुर देश के रूप में कृतसंकल्प है। वे गलवान घाटी की झड़पें और उनमें हताहत हुए भारतीय सैनिक भारत के लिए अवश्य मायने रखते हैं परअपनेक्षेत्र के मारे गये सैनिकों की संख्या को नहीं प्रकाशित कर वह अपनी अविचलित मानसिक स्थिति को ही स्पष्ट करता है।वह कदापि भयभीत नहीं है।

कारण चाहे जो , कोरोना ने उसके लैब में जन्म लिया हो या नही , उसके भयावह स्वरूप के अस्तित्व को लम्बे समय तक देश में छिपाए रखने से सम्बन्धित आरोपों से भी वह भयभीत नहीं।आरोप जितने गम्भीर हैं ,युद्ध के लिए उसकी सन्नद्धता उतनी ही गहरी होती जा रही है। इस विषय को महत्वहीन सिद्ध करने , और अन्य राष्ट्रों की भटकी हुई मानसिक स्थिति में अपनी  राजनीतिक महत्वाकाँक्षाओं को पूर्ण करने का उसने इसे समुचित अवसर माना है।

वह हमारा पड़ोसी भी है औरप्रमुख प्रतिद्वन्दी भी। सीमा विवाद शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाना अगर किसी तरह सम्भव नहीं हो तभी युद्ध क आश्रय लेना उचित हो सकता है। किसी अन्य के द्वारा प्रायोजित युद्ध का हिस्सा बनना तो कदापि उचित नहीं ।ऐसा लगता है कि भयभीत हम हैं और यह आवश्यक है क्योंकि हम न तो पड़ोसी बदल सकते हैं और न हम युद्ध की स्थिति ही पैदा होने देना चाहते ।शान्तिप्रियता हमारी सैद्धान्तिक नीतिगत विशेषता है।।

किन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं कि हम युद्ध की अनिवार्य स्थितियों मे उससे मुँह मोड़ लें। अतः हमें सशक्त होना आवश्यक है। हमारे अस्त्र शस्त्र आधुनिकतम और भरपूर हों। हमारी सेना का मनोबल उच्चतम स्तर पर हो।देश उसके लिए प्रयत्नशील है। ,किन्तु युद्ध  के बदले अन्य कूटनीतिक उपायों का आश्रय लेने को ही अधिक प्राथमिकता देना उपयुक्त प्रतीत होता है। भात सरकार ने इसके लिए सही कदम उठाए हैं।। चीनी वस्तुओं का बहिष्कार, उसके निवेशों का बहिष्कार भी शक्ति प्रदर्शन का ही  एक तरीका है। देश की भावभूमि तो इसके लिए पूर्णतःतैयार है । देश की आत्मनिर्भरता की भावना को भी अवश्य बल मिलेगा ,जिसके दूरगामी परिणाम बहुत अच्छे होंगे।  भारत एक विकसित देश की श्रेणी की ओर बढ़ता हुआ देश है । उसकी आवश्यकताओं  की पूर्ति के लिए वह किसी अन्य देश पर न निर्भर हो , यह सुयोग भरा अवसर है,और चीन जैसे देशों को कुछ सोचने को अवश्य विवश करने वाला होगा। किसी दूसरे की योजनाओं और निवेश पर हमारा विकास आधारित न हो, इसके लिए भले ही लम्बी लड़ाई लड़ी पड़े  पर यह किसी भी सुस्वप्न को पूरा करने जैसा ही होगा। यह सैद्धान्तिक रूप से स्वीकार कर भारतीय तकनीक और कला कौशल को बढ़ावा देनाआवश्यक है।

इसके अतिरिक्त संयम खोये बिना द्विपक्षीय वार्ताओं से समाधान निकालने की आवश्यकता है।  यद्यपि अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाकर उसपर दवाव बनाने की भी आवश्कता है। अन्तर्राष्ट्रीय दबावों के तहत  युद्ध की संभावनाएँ दिखती हैं। संभव है कोरोना वैक्सीन के आने से इन दबावों और तनावों मे थोड़ा फर्क पड़े पर चूंकि आक्रोश के कई अन्य राजनैतिक कारण हैं अतः निश्चित तौर पर कुछ भी कहा नही जा सकता। युद्ध मे संलग्न होने की स्थिति में हम भारतवासी एक ऐसे पड़ोसी देश को परम शत्रु बना लेंगे जिससे लम्बे समय तक सांस्कृतिक और व्यापारिक  संबन्ध रहा है ।चीन पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा, नही कहा जा सकता पर क्या तब हमारे देश की सुरक्षा सदैव दाँव पर लगी नही रहेगी ?

आशा सहाय 29 -8-2020

 

 

​डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी है। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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