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हिन्दी के विकास और विस्‍तार पर मंथन जरूरी

चंद लहरें

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हिन्दी को सर्वाधिक उदासीनता दक्षिण भारतीय राज्यों में ही मिलती रही है। यह संभवतः इसलिये भी कि उन राज्यों की भाषाओं का कुल बिलकुल ही अलग है और उन राज्यों की पृथक पहचान ही उनकी भाषा,  वेशभूषा और संस्कारों पर आधारित है। उनके रीति रिवाजों पर आधारित है। हिन्दी भाषा उन्हें अपने सम्पूर्ण अस्तित्व पर हमला करती हुई प्रतीत होती है। उन्हें अपनी विशिष्ट पहचान पर संकट आता सा प्रतीत होता है।

 

भारत का संघीय ढांंचा और परस्पर सह अस्तित्व ही इसकी विशिष्टता है, जो इतने बड़े लोकतंत्र को सफलता और विकास के मार्ग पर सतत् ले जाती रही है। यह सच है जैसा कि एक प्रसिद्ध नेता ओवैसी ने कहा कि भारत हिन्दी, हिन्दु और हिन्दुत्व से कहीं बहुत अधिक बड़ा है, पर भारत की राष्ट्र भाषाजनित एक विशिष्ट पहचान का क्या होगा? क्या यही बात वे तब कह सकते अगर हिन्दी की जगह उर्दु को राष्ट्रभाषा के लिए प्रस्तावित कर दिया जाता? शायद वे नहीं कहते अथवा चुप ही रहते। यह बाद का विषय है कि यही प्रश्न दक्षिण भारतीय राज्यों से भी पूछा जाए।एक विराट राष्ट्र के सम्मानजनित हितों की रक्षा के लिए हमे छोटे छोटे स्वार्थों से क्या उपर नहीं उठना चाहिए?

 

संस्कृतियों को जोड़ने के लिए आदिगुरु शंकराचार्य से लेकर आजतक प्रयत्न किए जा रहे हैं। उन्होंने आध्यात्मिक पीठों की स्थापना की, उत्तर में दक्षिण, दक्षिण में उत्तर के पीठाधीश शंकराचार्यों की स्थापना की। हम भाषा को भी संस्कृतियों को जोड़ने का बड़ा माध्यम मानते हैं। यह युगानुरूप भी है। इन 72 वर्षों में दक्षिण और उत्तर को जोड़ने के लिए हिन्दी की पहचान उन्हें करानी चाही। त्रिभाषा फार्मूला के जरिए उत्तर भारत को भी तीसरी भाषा के रूप मे एक दक्षिण भारतीय भाषा को सिखाना चाहा ताकि एक मजबूत सेतु बन सके। ताकि उनका आक्रोश कम हो सके कि हिन्दी भाषी ही दक्षिणी भाषा क्यों न सीखें, साथ ही सभी भाषाओं से सबकी पहचान हो। सांस्कृतिक एकता के लिए उठाया जा सकनेवाला यह भी एक बड़ा कदम होता। सदा ही यह अत्यधिक संवेदनशील विषय बना दिया गया और सत्तालोभी केन्द्रीय पार्टियों ने इसे छोड़ देने में ही भला समझा। यह फार्मूला अपनी उम्‍मीदों पर सफल नहीं हो सका और प्रयोक्ताओं ने इसका स्वरूप ही परिवर्तित कर दिया।

 

यह सच है कि हिन्दी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसकी लिखावट इसकी वर्णव्यवस्था,  व्याकरण में ऐसी कोई समस्या नहीं। यह एक वैज्ञानिक भाषा है। जैसी लिखी जाती है, वैसी ही बोली भी जाती है। यह अत्यन्त सरल और सहज उच्चरित होती है। पर एक दुराग्रह उन्हें यह भाषा सीखने नहीं देती। इसके लिये बहुत मायनों मे भाषायी आधार पर राज्य के पुनर्गठन का होना भी जिम्मेवार है। द्वितीयतः हिन्दी का थोपा जाना उन्हें सहन नहीं। इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की बात जब जब उठती है, उनका यह आक्रोश विवेक की सीमा को लांंघकर अपनी प्रतिक्रियाएंं देता है।

 

दिनांक 16 -9-2019 के एक समाचार पत्र में इन प्रतिक्रियाओं को पढ़कर चौंक जाना पड़ा। गृहमंत्री शाह के हिन्दी को सम्पर्क भाषा बनाए जाने के आह्वान पर व्यक्त उनका आक्रोश हिन्दी नही, वरन भाजपा पर व्यक्त होता सा प्रतीत हुआ। वे इसे भाजपा का छिपा एजेंडा बताते हैं। पुडुचेरी के एक नेता ने कुछ ऐसा ही व्यक्त किया। कर्नाटक में कांग्रेस के बड़े लीडर ने जो टिप्पणी की है वह पार्टी विशेष के प्रति की गयी है, और अत्यधिक गम्भीर है। यह आक्रोश पार्टीगत वैमनस्य को प्रगट करने के अलावा और कुछ नहीं है। एक अन्‍य काग्रेस लीडर ने प्रतिक्रिया जाहिर कर कहा कि we have one nation, one tax ,but one nation one language will never be a reality.”यह सही हो सकता है क्योंकि इस देश की सभी प्रान्तीय मुख्य भाषाएंं अपने आप में सशक्त और समृद्ध भाषाएंं हैं। उनका अपना समृद्ध साहित्य भी है। आज जब विभिन्न बोलियांं अपने को भाषा कहलाने का गौरव प्राप्त करना चाहती हैं तो दक्षिण की किसी भी समृद्ध भाषा को स्थानच्युत तो कदापि किया  नहीं जा सकता।

 

मेरी समझ से गृह मंत्री अमित शाह की भी ऐसी मंशा कभी नहीं हो सकती। हांं, हिन्दी को सम्पर्क भाषा बनाकर अंंग्रेजी की गुलामी से मुक्ति दिलाना उनका अभिप्राय अवश्य होना चाहिए। इस सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी के अतिरित्त किसी दूसरी भाषा का चयन नहीं किया जा सकता। इससे किसी भी क्षेत्र की अपनी भाषा के वर्चस्व पर कोई आंंच नहीं आ सकती। बिना गहराई सेविचार किए गये दी गयी ये प्रतिक्रियाएंं मांंब लिंचिंग सी प्रतीत होती है, जिसमें भीड़ किसी व्यक्ति की हत्या पीट पीटकर मात्र किसी अफवाह के कारण कर देती है। गहराई से विचार किए बिना, प्रामाणिकता की खोज किए बिना, बच्चा चोर पशुचोर, गोहत्या के नाम पर ये घटनाएंं विरोधी पार्टी को राजनीति का खाद्य दे रही हैं।इस तरह की सामूहिक पिटाई तुरत उत्पन्न आक्रोश का नमूना है, जिसमें धैर्य के लिए कोई जगह नहीं होती।

 

लगता है यह देश अपनी स्वस्थ मानसिकता से दूर होता जा रहा है। हर किसी का वक्तव्य किसी न किसी राजनीतिक पटल को अभिव्यक्त करता प्रतीत होता है। हम वास्तविकता से दूर भागते जा रहे हैं। पार्टी पालिटिक्स ने स्वस्थ सामाजिक विचारधारा को नष्ट कर दिया है। अन्यथा दक्षिण के राजनेतागण यह भी समझने का प्रयत्न क्यों नहीं करते कि सम्पूर्ण देश से आकर वहांं भ्रमण करने वाले, निवास करने वालों को भी घुलने मिलने में परेशानियों को दूर करने के लिए हिन्दी जैसी सहज और सशक्त भाषा चाहिए। अगर यह खुशी से होता है तो शेष देशवासियों को भी उनकी भाषा सीखने की प्रेरणा मिलेगी। यह प्रयास किसी भी तरह तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम आदि का विरोध नहीं। और न ही, यह सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त अंग्रेजी भाषा का विरोध है। हो भी नही सकता। वह एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है जिसका विरोध व्यक्ति के विश्वजनीन विकास का विरोध होगा। पर प्रश्न राष्ट्र भाषा के रूप में हिन्दी के पहचान से जुड़ा है, जिसके लिए अन्य किसी भाषा का हम चयन नहीं कर सकते। एकबारगी तो नहीं पर धीरे धीरे इस लक्ष्य तक पहुंंचने के लिए देश के सभी राज्यों को साथ देना होगा। हमे छुद्र राजनीति से उपर उठकर देश के लिए उदारमन बनना होगा।

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