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कृषक: भय भी, अज्ञानता भी

चंद लहरें

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अखबार खोलते ही जिन खबरों पर दृष्टि जाती है वह कृषकों केआन्दोलन से जुड़ी होती है अथवा कोविड 19के वैक्सीन की उपलब्धि, टीकाकरण और उसकी समस्याएँ ही होती हैं। बाकी खबरों पर दृष्टि रुकती नहीं| वैक्सीन को देश की सम्पूर्ण जनता तक उपलब्ध कराने को प्रतिबद्ध सरकार निरंतर कार्य योजना बना रही है। जनता की उम्मीद भरी आँखें इस ओर लगी हैं कि कब वह हर तरह के संशयों से मुक्त हो किसी वैक्सीन का वरण कर रोग भय से छुटकारा पा सके और पूर्व की तरह उन्मुक्त जीवन यापन कर सके।

यह अभी भी इतना आसान नहीं जबतक  वैक्सीनेशन के बाद वाले दुष्प्रभावों की चिन्ता से वह मुक्त न हो जाये। अब चूँकि यह चिन्ता  भारत ही नहीं, पूरे विश्व की है, जबतक यह जनता के बड़े वर्ग के द्वारा स्वीकृत न हो जाये ,पूरी तरह कोई इसके प्रति आश्वस्त नहीं हो सकता फिर भी डूबते को यह तिनके का सहारा अवश्य है। हलाँकि  लोग घरों के बाहर आ गये हैं बाजार फिर से न्यूनाधिक गुलजार हो रहे हैं, यह कहा जा सकता है कि लोग अब भय के वातावरण से बाहर निकलना चाह रहे हैं।

मृत्यु दर में कमी और रिकवरी दर में तेजी से वृद्धि भी उनकी भयमुक्ति में सहायक तत्व बन रहे हैं । मास्क के प्रति सजगता, दूरी के पालन की अनिवार्यता जैसे निर्देश भी अंशतः कारगर हो रहे हैं सबसे बड़ी बात तो यह है कि वर्ष भर के इस भय ने उन्हें अपनी इम्यूनिटी विकसित करने को सतर्क या यों कहें कि जागरुक कर दिया है।आवश्यकता इसी की सबसे अधिक थी। चाहे जो हो इसके लिए सरकार पूरी तरह प्रयत्नशील है और जनता का सहयोग उसे प्राप्त है।

पर दूसरी वह खबर जो कृषको से सम्बन्धित है ,वह  तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध एक आन्दोलन है। कृषक इस जिद पर उतर आए हैं कि ये कानून वापस ले लिए जाएँ।उन्हें भय है कि इन कानूनों के कारण भविष्य में उनकी जमीन बड़े बड़े उद्योग पतियों द्वारा छीन ली जा सकती है।  उन्हें अपनी फसल की एम एस पी शायद बरकरार नहीं रह पाये।

एक तो इसके मूल में अज्ञानता भी है। भारतीय किसान चाहे वे जिस वर्ग और जहाँ कहीं के हों, अभी भी इतने शिक्षित ऩहीं कि कानून की बारीकियों को समझें और उसके द्वारा होने वाले परिवर्तनों को तुरत स्वीकार कर लें। उनकी वर्तमान सामान्य स्थितियों में बड़े किसान जोखिम उठाना नहीं पड़ रहा । आराम से की गई उनकी खेती की उपज का निष्पादन आराम से हो रहा है, और एमएसपी भी प्राप्त हो रहा है। फिर इस तरह का जोखिम वे नहीं उठाना चाहते  जहाँ उन्हें किसी ऐसी तीसरी पार्टी से बातचीत करनी पडें, जिनसे उन्हें चतुराई किए जाने की आशंका है। अतः वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं। उन्हें डर है कि खुले बाजार में अन्य मंडियों का सहारा लेने पर उनकी फसल औने पौने भाव में वे बेचने को न विवश हो जाएँ।

यह प्रश्न  विशेषकर उनकी फसल, विशेषकर अनाजों के संदर्भ में  उसकी गुणवत्ता के आकलन और जरूरत से ज्यादा उत्पादन के संदर्भ में उनकी चिन्ताओं के विशेष कारण बनते हैं। मध्यम और छोटेदर्जे के किसानों के लिये नयी व्यवस्था जोखिम से भरी है। उन्हें लगता है कि उनकी स्थितियों में उनके और सरकार, जिसके साथ वे सुविधाओं की एकविशिष्ट मतदाता होकरमाँग कर लेते हैं। बीज, खाद के साथ कीटनाशक और अन्य सारी सुवधाएं, लोन,रिकवरी से अधिक माफी की संभावना, कृषि बीमा आदि अनेक अन्य सुविधाएं वे सरकार से क्यों न लें, वे क्यों किसी अन्य  सशक्त पार्टी से इसे प्राप्त कर संभवतः कृषक से अपने ही खेतों के मजदूर बन कर रह जाएँ?

यह एक बड़ा प्रश्न है उनके मन में। और अगर वे अपने  खेतों में जुटे नहीं रहें तो उनकी जमीन कहीं अरक्षित न हो जाय। बड़ी पार्टियों द्वारा कब्जा न कर लिया जाए। यहउनके एक कृषक के रूप में अस्तित्व रक्षा एवम पहचान का प्रश्न है। फिर बड़ी पार्टियों से वेअपने सीमित साधनों द्वारा कितनी लड़ाईयाँ और किस किस कचहरियों में लड़ सकेंगे। बड़ी पार्टियों से सदैव हार की संभावना उन्हें नजर आती है। अत इन कानूनों के नये रूप की पेचीदगियों में वे फँसना नहीं चाहते। सरकार के लाख आश्वासन उन्हें आश्वस्त नहीं कर सकते।

यह सच है कि दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसान किसी अवाँछित तत्व को अपन साथ जुड़ने नहीं देना चाहते। यह उनकी सदाशयता है पर  जलती हुई इस आग में अगर वे अपने हाथ और रोटियाँ सेंकना ही चाहें तो उन्हें कहाँ तक रोका जा सकता है?जनता की हर समस्या में कूद कर उसे गलत मोड़ देना उनका कर्तव्य है। पार्टी पॉलिटिक्स किसानों की समस्याओं को अपने नजरिये से देखने को विवश है। केजरीवाल का विधान सभा के विशेष सत्र में कानूनों की प्रतियों को फाड़ देना निश्चय ही भारतीय संविधान की अवमानना है।

कृषि मंत्री के आश्वासन भीकिसानों को शायद ही आश्वस्त कर  सके। अन्दर के भय को समाप्त करने में समय लग सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कमिटि बना कर समस्या के समाधान का रास्ता सुझया है। पर इससे उनके अड़ियल रवैये में कितनी कमी आयेगी, कहा नहीं जा सकता। अच्छा होता अगर इस कानून को बनाने के पूर्व किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से विचार विमर्श किया जाता। उनकी आय दुगुनी होगी, यह तो दूर की बात है, खुले बाजार के लिए विचारों में खुलापन पैदा करने की सर्वप्रथम आवश्कता है।हम आशा करें कि वे कानून को समझ और उसपर विश्वास कर सकें।

आशा सहाय

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है।

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