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एक लड़ाई, आधारहीन सी

चंद लहरें

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हवा में एक आधारहीन लड़ाई गहरी होती जाती सी दिखती है। आधारहीन इसलिए कि किसी ठोस वैचारिक भूमि का अभाव दीखता है उसमें। भूमि के नाम पर आधुनिक लोकतांत्रित व्यवस्था में विचारों को ही प्राधान्य मिला हुआ सा दीखता है वह भी ऐसे लोगों के विचार जो विचारों के ठोस धरातल को पकड़ना नहीं चाहते और काल्पनिक विषयों को लेकर परस्पर  गुत्थम गुत्था होना चाहते हैं। यह मात्र अस्तित्व बचाने की लड़ाई है जो देश में वर्तमान के प्रति नकारात्मकता की लहर पैदा करना चाहती है। यह स्थिति सच को झूठ और झूठ को सच बनाने की एक अन्तहीन जिद सी प्रतीत हो रही है।

सामान्य भारतीय जनता मात्र अपने जीवन को सुविधापूर्ण बनाना चाहती है और हर उस प्रयत्न का स्वागत करना चाहती है जो इस दिशा में उसे कदम बढ़ाती सी प्रतीत होती है। उसे इन लड़ाइयों से तबतक मतलब नहीं होता जबतक उसके व्यक्तिगत स्वार्थ उसमें निहित नहीं होते। किन्तु यह भी सत्य है कि देश की अशिक्षित अथवा अर्धशिक्षित जनता को अपने लाभ हानि के विषयों का भी ज्ञान नहीं होता और वे सहज ही झूठी सच्ची बातों से बरगला दी जा सकती है। बरगलाने और बरगलाए जाने की प्रक्रिया मे ऐसी ही अशिक्षित और अर्धशिक्षित जनता तथा देश के तथाकथित प्रसिद्ध दलों के अस्तित्व को बचाए रखने को जी जान से लगे हुए नेताओं की भूमिका को देशहित की कसौटी पर कसने की अत्यधिक आवश्यकता होती है।

विरोध उनका अधिकार है, उनके इस अधिकार का प्रयोग लोकतांत्रिक वर्तमान व्यवस्था में होना भी आवश्यक है अन्यथा लोकतंत्र अर्थहीन हो जा सकता है पर प्रश्न है कि इस विरोध के ठोस कारण मौजूद हों और ठोस परिणाम देशहित से जुड़े हों।

हर दल के कुछ सुस्पष्ट सिद्धान्त होते हैं जो देशहित से ही जुड़े होते हैं। समय और स्थान के अनुसार उसमे परिवर्तन ग्राह्य होते हैं। अगर ये परिवर्तन नहीं किए जाएँ तो वे एक स्थान विशेष की न तो तात्कालिक जरूरतों की पूर्ति कर सकें न भविष्य के अनुरूप ही बन सकें। यह सही है कि देश मानवों से बनता है उसकी सभ्यता और संस्कृति और एक लम्बे काल से बनी उसकी विचारधारा उसे एक विशेष स्वरूप प्रदान करती है और उसी के परिष्कृत, परिवर्धित स्वरूप को एक राष्ट्र और राष्ट्र भावना के रूप में देश जीवित रखना चाहता है। वह उसकी पहचान भी होती है। यह पहचान विश्वपटल पर सम्मान प्राप्त करे। यह सम्पूर्ण राष्ट्र की आकांंक्षा और चेष्टा होती है। उसके अहंभाव का पोषण भी तभी होता है। अतः आवश्यकता होती है पुनर्निरीक्षण और पुनर्गठन की। नये सिद्धांतों के स्वागत की। पुराने सिद्धान्त जर्जर होकर अनुपयोगी भी हो सकते हैं। यह बात सभी दलों के सिद्धांतों के संदर्भ में कही जा सकती है।

यह भी सत्य है कि कुछ सिद्धांत नवीनीकरण को प्रश्रय नहीं देना चाहते अपने सिद्धान्तों के वे सार्वकालिक और सार्वदेशिकरूप से सही मान कर चलते हैं। विकास का पैमाना उनके लिए मनुष्य से जुड़ा होता है  किसी, सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न  राष्ट्र की सत्ता से नहीं।  कुछ के लिए राष्ट्र का समवेत विकास अधिक मायने रखता है। हालांंकि दोनों सिद्धान्त एक दूसरे की सहायता के बिना किसी राष्ट्र का विकास नहीं कर सकते। प्रश्न बस प्राधान्य का होता है। राष्ट्र के विकास का मतलब राष्ट्र की विशेष सभ्यता और संस्कृति की पहचान से युक्त एक विशिष्ट क्षेत्र का विकास। मानवों का विकास तो उसका अनिवार्य तत्व है। मानव अपनी विभिन्न कार्यजनित श्रेणियों से हीअपना और राष्ट्र का विकास कर सकता है।

एक विकसित राष्ट्र की पहचान उसकी उस शक्ति सम्पन्नता से होती है, जिससे उसकी संप्रभुता पर कोई आंंच न आए, उसमें निवास करने वाली जनता की जरूरतों की पूर्ति के लिए उसे किसी अन्य राष्ट्र पर निर्भर नहींं रहना हो। अपनी वस्तुओं का ससम्मान हम स्वयम प्रयोग करें और एक विश्व समाज का अंग होने के कारण अन्य जरूरतमंद देशों की सहायता भी कर सकें। हम हर स्थिति में अपने स्वाभिमान और गौरव की रक्षा कर सकें।एक शक्तिसम्पन्न राष्ट दूसरे की घुड़कियों का जवाब अपनी शक्ति प्रदर्शन से दे सके यह उसकी उपलब्धि होनी चाहिए। देश की आन्तरिक शान्ति में ही विकासोन्मुख प्रयत्नशीलता सफल हो सकती है।

एक लोकतांत्रिक देश बहुदल वादी सिद्धांतों को जब प्रश्रय देता है तो उनके निजी स्वार्थ और सत्तासीनता की भूख देश में अनिवार्यतःअशान्ति पैदा करती है। विरोध की भाषा न शालीनता का ख्याल रखती है ,न तथ्यों का और न हीं मर्यादाओं का। एक अराजक स्थिति पैदा कर देश को आन्दोलित कर येन केन प्रकारेण वह स्वार्थ सिद्ध करना चाहती है। इस स्थिति से निबटने के लिए जनता का शिक्षित होना अत्यन्त आवश्यक है ताकि वे अपने हितों को सही सही पहचान सकें, अपने अधिकारों और कर्तव्यों को अपने देश एवम व्यक्तिगत संदर्भों में समझ कर अपने अधिकारोंं की लड़ाई लड़  सकें। न वे किसी के बहकावे में आएं और न व्यर्थ के प्रलोभनों में। दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के इतने दिनों पश्चात भी भारत में अशिक्षितों की संख्या बहुत बड़ी है। और भारत की वर्तमान दलगत राजनीति ने इनके त्वरित शिक्षित होने की ओर कोई कारगर कदम नहीं उठाया। जागरुकता आई है और  अब प्रयत्नशीलता भी। पर जिस विवेकशीलता की कामना हम इसके द्वारा करते हैं, वह शायद बहुत दूर का विषय ही है।

उपरोक्त बातें सैद्धान्तिक सत्य हैं। किन्तु भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में किसी सिद्धान्त पर निरंतर आरूढ़ रहकर उस जनसंख्या को समान रूप से विकास की परिधि में ले आना शायद सहज संभव नहीं। एक ही नियम किसी के लिए फलदायी तो किसी के लिए कष्टदायी सिद्ध हो सकता है। यहांं सिद्धांतों में लचीलापन लाने की आवश्यकता महसूस होती है। यह तब तक करणीय है जब तक बहुसंख्यक जनता प्रौढ़ चिन्तन से युक्त न हो जाये और बाकी को अपने प्रभाव में न ले ले। किन्तु यह अल्पसंख्यक अगर निम्न स्तर की राजनीति की शिकार हो जाय तब भी अराजकता से कोई रोक नहीं सकता। क्योंकि तर्क हीनता उनके वक्तव्यों का सम्बल होता है और अदूरदृष्टि उनका सहज विश्वास। यह अदूरदृष्टि  ही उनके वर्तमान का रक्षक होता है।

वर्तमान के हित का साधन ही उनका उद्देश्य भी। भविष्य उनके लिए सदैव अबूझ है। भविष्य राष्ट्रगत समष्टि के कल्याणहित हो सकता है जबकि वर्तमान व्यष्टि के हितार्थ वरणीय है। चिन्तन के एक वर्ग विशेष की यह सोच भी कुछ गलत नहीं। यह विकास की प्रक्रियाओं की गति धीमी कर जनता के मनोनुकूल बनने में सहायक होता है पर विकास की गति का धीमा हो जाना इसका एक काला पक्ष है। एक विकासशील देश को विकसित की श्रेणी में शीघ्रता से पहुंंचा देने के मार्ग में यह बहुत बड़ी बाधा है। हमारी भविष्य सम्बन्धी सोच की तीव्रता को यथार्थ में तीव्रता से परिणत कर देने के मार्ग में आन्दोलन और अराजकता को आने से रोकना इसलिए ही कठिन है। इस कठिनता को सरल कर देना किसी भी सरकार के लिये एक चुनौती है । इससे निपटने की कला के भी कई काट मौजूद होते हैं जिसमे उनकी अन्तर्राष्ट्रीय सहभागिता भी हो सकती है जो सरकार के मनोबल पर प्रभाव डाल सकती है।

हमारा देश ऐसी ही कुछ समस्याओं से जूझ रहा है जो हवा में विरोध और विद्रोह की गंध फैला रहे हैं। सीएए और किसान आंदोलन की जड़ें इन्ही वैचारिक स्थितियों में कहीं दबी पड़ी हैं। राष्ट्रवादिता और मानववादिता का द्वन्द्व, सीमाओं की सुरक्षा के साथ ही सीमाओं के किसी हद तक खुले होने का द्वन्द्व, किसी भी तरह विहितस अथवा अविहित ढंग से प्रवेश किए लोगों को राष्ट्रीय नागरिकता प्रदार करते रहने की सांवैधानिक अथवा गैर सांवैधानिक नैरंतर्य बनाए रखना, यह विवाद का विषय तो होगा ही, क्योंकि यह देश की सीमा सुरक्षा, बढ़ती जनसंख्या एवम तज्जन्य पोषण से सम्बन्धित अधिकारों एवम कर्तव्यों से जुड़ा प्रश्न होता है। मानववादिता और मानवता से जुड़े इस प्रश्न पर मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना के सिद्धान्त का हावी होना सहज स्वाभाविक है। विशेष कर तब जब यह राष्ट्रवाद विरोधी तथा कुछ राज्यविशेष की सरकारों के लिए लाभकारी अथवा गैर लाभकारी विषय बन जाता है। अराजक आंदोलन इसकी अनिवार्य परिणति होती है। यह लम्बे समय की अनावश्यक उदारता का परिणाम है। एक साथ इनपर काबू पा लेने की कोशिश करना अन्दरुनी और वाह्य अशान्ति पैदा करने में सक्षम हो सकता है। एक साहसी कदम लेकर उसके प्रतिकार को झेलने की ताकत सरकार में होनी ही चाहिए।

अभी अभी के कृषक आंदोलन में सरकार ने जिस दूरदृष्टि का परिचय दिया है कृषक समुदाय का एक वर्ग विशेष उसके दूरगामी परिणामों से दो चार होना नहीं चाहते। तात्कालिक लाभ के बदले उन्हें हाथों से शक्ति छिन जाने का भय सामने दीखता है। कृषक का कृषक होने का आत्माभिमान आहत होने का भय दीखता है। अडानी अंबानी जैसे लोगों के भूत उनकी सारी जमीन छीनते हुए से दीखते हैं। साथ ही उनकी इन कल्पनाओं को भयावह रूप प्रदान करने वाले विपक्षी दलों का साथ उनकी कल्पनाओं को उसी दिशा में ढकेलते हैं। कानूनों के दूरगामी परिणामों को देखते हुए उनका भय कुछ बहुत अनुचित भी नहीं लगता, जबतक प्रयोग स्तर पर इनकी निरापदता की वे जांंच न कर लें। यह एक लम्बी प्रक्रिया होगी, इस दृष्टि से इन्हें डेढ़ वर्ष तक स्थगित रखना एक उचित कदम था पर अन्ततः इसे उनके लिए विकल्प रूप में स्वीकार करना भी किसानों की ओर बढ़ाया हुआ सुलह का हाथ प्रतीत होता है। स्पष्ट रूप में इस सन्देश को कृषकों तक पहुँचाने की चेष्टा करना कुछ सकारात्मक प्रभाव अवश्य उत्पन्न करेगा।

भ्रांतियांं कभी न कभी छंंटती हैं। कृषकों की भ्रांतियांं तो अवश्य कुछ हद तक छंंटेंगी। पर कृषि एक व्यापार अथवा यों कहें कि एक बिजनेस रूप में परिणत न हो जाय और उनका कृषि कौशल न उनसे दूर हो जाय इसका भय अवश्य है। कृषक समुदाय इससे भी भयभीत है। कृषक और जमीन का सनातन रिश्ता न खतरे में पड़ जाए, यह भी भय है ही। देश की उन्नति और कृषकों को समृद्ध करने हेतु  एक क्रान्तिकारी कदम उठाने की आवश्यकता थी पर अचानक उनकी मानसिक और भौतिक स्थिति में बदलाव के लिए वे अप्रस्तुत अभी भी हैं। उन्हें इस भय से निकाल प्रगति की ओर उन्मुख करने की आवश्यकता है। इसके लिए उनसे सतत संवाद स्थापित करते रहने की आवश्यकता भी है।

यह भी सत्य है कि आंदोलन को जिलाए रखने में किसान से अधिक वे विभिन्न नेतागण जुड़ जा रहे हैं जो अपने नेतृत्व को प्रभावी बनाना चाहते हैं और इसके लिए किसी भी प्रकार के आन्दोलन की शाख पकड़ कर जुड़ जाना चाहते हैं वस्तुतः ये आन्दोलनजीवी कहलाने के अधिकारी हैं। किसानों के मध्य भी ऐसे ही नेतागण हैं जिनकी रुचि मात्र नेतृत्व में है, किसानों में नहीं। इन स्थितियों के आलोक में यह कहना उचित प्रतीत होता है कि विकास के जितने स्वस्थ और त्वरित प्रयत्न किए जाएँगे, आन्दोलनों की गति भी उतनी ही तीव्र होगी। शान्तिपूर्ण आन्दोलन स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। विरोधी पार्टियों की बेसब्री भी इसी का एक हिस्सा है। पर आन्दोलन जीविता प्रगति पथ में बाधक न हो, इतनी नैतिकता को अपनाना भी आवश्यक है।जहाँ एक ओर सरकार को मध्यममार्ग अपनाने की आवश्यककता है, पक्ष एवम विपक्ष को सिद्धांतों के पुनर्निरीक्षण की आवश्यकता है, सामान्य जनता को अर्धशिक्षा से बाहर निकालने की भी आवश्यकता है। तभी एक लोकतंत्र में स्वस्थ विकास संभाव है।

आाशा सहाय।-17-2 -2021.

 

डिस्‍क्‍लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे, आंकड़े या तथ्‍य की पुष्टि नहीं करता है।

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