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सोच युगानुसार और तर्कसंगत हों

चंद लहरें

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यह वक्तव्य विशेषकर उन्हे उत्तर देने हेतु मैंने लिखना चाहा है जो स्त्रियों को सदियो पूर्व विवशता की स्थिति मे ढकेल कर  मध्यकालीन स्थितियों की नारी की आंतरिक शक्ति को आदर्श रूप में  प्रस्तुत करना चाहते हैं। ,जिन्हें आज की नारी की सशक्त स्थिति आकर्षित नहीं करती।

पद्मावती  नामक फिल्म ने देश में जो शोर उत्पन्न किया उसने  इतिहास वर्णित    कुछ ऐसे प्रसंगों के छेड़छाड़ पर आपत्ति प्रगट कीहै  जो  तात्कालिक नारी  की आत्मिक शौर्य गाथा का वहन करते हैं । वे ऐतिहासिक आदर्श हैं जो  युग के घात प्रतिघातों से निर्मित है। मेरा मानना कि इन आदर्शों को युगीन आदर्शों के रूप  में  देखना  ही  उचित है।.इन्हें वर्तमान मानसिकता पर  थोपना कदापि उचित नहीं। युग का सत्य, और युग का आदर्श  बहुत सारे संघर्षों के पश्चात जन्म लेता है जिसका केन्द्र मानव होता  है,मानव और उसकी आवश्यकताएँ,  वे भौतिक हों अथवा भावनात्मक ,हर युग मे वे परिवर्तन शील होती  ही हैं।

अगर वहउस युग की आदर्श सोच हैतो उसी मध्यकाल में  इस सोच के परिपुष्ट होने के लिए पर्याप्त वातावरण प्राप्त था  लोककथाऎँ बनीकुछ इतिहास भी कथा रूप में लिखे गए और वह सोच जीवित हो गयी और उन्हीं लोक कथाओं से भव्यता प्रदान की गयी एक महा कथा एक महाकाव्य  पद्मावत मेंबद्ध होगयी जो स्वयं मे कल्पना ओं से जुड़करसत्य और कल्पना  का सुन्दर सम्मिश्रण बनी।यह उस युग में दो धर्मों के सद्भाव का एक प्रयत्न भी माना गया।

पर आज युग बदल गया है।हाँ, हम पाश्चात्य प्रभाव में जी रहे हैं पर सारी सोचों मे नहीं।आज हमारी भारतीय सोच अगर अपनी कुछ आदर्श स्थापनाओं को लेकर विश्व के सामने न जाए तो वह पिछड़ जाएगी।विश्व की अनुमान्य आधी जनसंख्या–  नारी( सही –सही आँकड़े नहीं) अगर पिछड़ी सोच पर आधृत रह जाएगी तो वह अपनी वैश्विक पहचान कैसे बना पाएगी। यह भी ठीक है कि भारतीय नारियों की एक अलग पहचान है पर आज के संघर्षशील जीवन में मात्र उसे ही लेकर जीया नहीं जा सकता। नारी सशक्ति करण की आवश्यकता उन्हें है।और यह मात्र एक दिखावा  नहीं ,वास्तविकता है। नारी सर्वप्रथम एक व्यक्ति है जिसका सम्पूर्ण विकास होना है,और इसीलिए पिछली परम्पराओं के विगत आदर्शों  को युगीन आदर्शो की तरह दिखाने की ही आवश्यकता है।एक सम्पूर्ण मानव के रूप में नारी को जीने का अधिकार है। न चाहते हुए भी कभी कभी अपने प्रति कठोर निर्णय उसे लेने पड़ते हैं जिसका उसे अधिकार है। पाश्चात्य नारियों की विचार धारा नारियों के शील अशील से नहीं बल्कि लिंग अभेद और व्यक्तित्व विकास सेही जुड़ी है।वह उनका आदर्श है,और युगानुरूप है।हम अपने आदर्शों की रक्षा करते हुए भी सशक्तिकरण की बातें कर सकते हैं ,पिछली कमजोरियों से  छूटने की कोशिश कर सकते हैं यह आज की आवश्यकता है।

हमारे अध्यात्म के अनुसार भी धर्म अर्थ काम मोक्ष की धारणाएँ हमें भौतिक समृद्धि की ओर भी अग्रसर करती हैं।उपनिषद और  पुराण भी ऐसा कहते हैं। इन सबों की प्राप्ति के लिए भी जो संघर्ष होते हैं उनमें मानव का  व्यर्थ कष्ट सहनाया सहने को विवश करना किसी युग का आदर्श उद्येश्य नहीं हो सकता ज्ञान और अध्यात्म अतनी जगह है पर यह जग   विगत जीवन का निर्देशन ऐसे नहीं कर सकता कि नारी विवशता की मर्यादा में जीना सीखे।उसे संघर्ष सीखना है।वह छाया नहीं।उसका अपना अस्तित्व है ,और उसे इस अस्तित्वबोध के साथ जीना होगा।परम्परा के निरर्थक अतीत को भुला देना श्रेयस्कर है।तर्क और बुद्धि से परे जाकर अतीत का समर्थन करना -लगता है  यह  राजनीतिक विवशता  हो  गयी है। पार्टिया  चाहे जो हों  , इस स्थिति को इसी तरह प्रस्तुत करने में उनकी भलाई  है विशेषकर तब जब चुनाव समीप हो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नारी सशक्तिकरण आदि मुद्दे तब उसके लिये कोई मायने नहीं रखते।अभी मध्यप्रदे श गुजरात , उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों इस फिल्म प्रदर्शन पर रोक इसी दृष्टि से फूँक फूंक कर कदम रखने जैसा प्रतीत होता है। अगर कोई अन्य दल भी वहाँ शासन में होते तो संवेदन शीलता के बहाने वे  भी  यही करते।
अभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की पक्षधर वही पार्टियाँ हो सकती हैं जिनका केन्द्र और तत्सम्बन्धित ऐतिहासिक सम्बन्धों वाले राज्यों से प्रशासनिक अथवा चुनावी वास्ता न हो।मध्यप्रदेश केप्रशासन ने तो ईतिहास की रानी पद्मिनी को  राष्ट्रमाता का गौरव तक प्रदान कर दिया।  यह उनकी परम् उदारता है। इस पद के लिए चयन पद्धतियों की उलझनों से बच सारे इतिहास प्रिय समाज को ही खुश कर दिया।

कुछलोगों नेसदैव ही टी .वी  के नारी चरित्र और स्वरूप- प्रदर्शन पर आपत्ति जाहिर की है।इस तरह अत्यानुधिकता का प्रदर्शन कर भारतीयता की संयमित सोच पर प्रहार का

आरोप भी लगाते रहे हैं। यह सत्य है कि टी.वी. मे दिखाए गये काल्पनिक कथाओं के नारी चरित्रों में अधिकांश में फूहड़ता  को प्रदर्शित किया जाता है।वह नारी का आदर्श रूप नहीं  उसमें वह फूहड़ता है जो समाज को नया कुछ सिखाने के बजाय सामान्य अनपढ़ लोगों को भ्रमित कर सकती हैं। समाज की बहुत सी बुराइयाँ इन्हीं की उपज हैं। पर उसमे दोष कथा लेखकों का है , वे हमारे आदर्श नारी चरित्र नहीं और वास्तविकता से वे कोसों दूर भी हैं।ऐसे प्रयासों पर लगाम लगनी ही चाहिए।

विश्व बहुत आगे बढ़ चुका है। भारत उस दौड़ में सम्मिलित होना चाहता है। माना कि हमारी अध्यात्मिकता कर्मफल में विश्वास करती है। कर्म चाहे इस जन्म के हों अथवा पूर्व जन्म के। इस विश्वास के परिणाम स्वरूप हम अनुचित कार्य करने से डरते है। हमारा यह दृष्टिकोण हमें कई तथाकथित पापों से बचाता है।पर हाल ही में कैंसर जैसे रोग को पापों का फल बता छुट्टी पा लेना हमे मेडिकल साइंस पर अविश्वास करना नहीं सिखाता?अभी का यह नया शगूफा उस प्राचीन सोच को वर्तमान पर हावी करना चाहता है जिसके लिए हम कोई तर्क नहीं दे सकते।हमारा अध्यात्मिक चिंतन तो हमारे सम्पूर्ण जीवन को ही पूर्वजन्म केकर्मों का परिणाम मानता है।तब तर्कपूर्ण चिन्तन की परम्परा भी उसी का परिणाम है। हमें अब अपनी दृश्टि को तर्कसंगत बनाने की आवश्यकता है। यह वर्तमान युग की माँग है।

आशा सहाय 25–11–2017

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