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लौट आओ,

चंद लहरें

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लौट आओ
हाथ की हँसिया पटक दो
बदल न जाए कही इतिहास
था जो
शौर्य भरा –
जौहर की ज्वाला से धधकता
चूमता आसमान
स्वर्ण सा जगमग
सोलह हजार नारियोंसे सजा
आत्मबलि को तत्पर
अक्षम संघर्ष ,विवशता
अमिट कहानी
बन नहीं सकीं जो
झाँसी की रानी ,
बाधी थी पीठ पर जिसने
अपनी एकमात्र सन्तान
बेखबर कि —
कहीं बन्दूक की गोलियाँ
और तीप के गोले
छीन नले उसे
उससे।
देश के लिए दिए थे प्राण।
किए थे दो दो हाथ
फिरंगियों से खुले मैदान में निर्भीक।
यह तो,
एक प्रेम कथा
बचा लाए प्रेमी को ,नृप को।
गोरा बादल की बलि शौर्य कथा
छुड़ा लाए
शत्रु की दुर्लंघ्य दीवारों के भीतर से
पर नहीं कर सके ऱक्षा अन्ततः उनकी
स्वयं की ।
जो हो कारण चाहे
पराक्रम की कथा सही
जौहर की व्यथा सही
दे दी आहुति निज की ही
अग्नि यज्ञ में।
आज
तुम्हारे कटार
-शीश लेने को छटपट
म्यान से झाँकती तुम्हारी तलवार
उस चित्रपट की
चित्रांगना पद्मावती का
सुनो,
कहीं अमर नकर दे उसे
इतिहास के पन्ने मे
जिसमे तुम जीना चाहते हो
इतिहास कहीं बोल न दे मुखर हो—
–थी एक नाट्यबाला
अभिनय निपुण
कहीं अधिक सुष्ठ, सुन्दर प्रत्यक्ष
मनोहर भी कल्पनातीत
शौर्य गाथा के साज से सज्जित
उससे भी
जिसे अमर करदिया था अग्नि ने
पवित्र।
पर कहीं
आधुनिका
यह नाट्यबाला
जी नजाए इतिहास में
कहीं हो न जाए विस्मृत पुरातन
इस आत्मबलि की आग में।
जी न जाए कल्पना नवीन की
बलि अनुपम।
फिर क्या करोगे?
किस इतिहास पर मरोगे।
कैसे बचेगी शान आन और बान?
लौट आओ
रख दो हाथ की हँसिया कटार, कृपाण।

आशा सहाय

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