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लोकसभा परिणाम 2019

चंद लहरें

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2019के बहुप्रतीक्षित लोकसभा चुनाव परिणामों से एक बात पूरी तरह स्पष्ट हो गयी है कि भारत की जनता अब जागरुक हो गयी है। इतना अवश्य कि वह सही गलत, सचझूठ के अन्तर को समझ सके।भुलावे और झाँसे में नहीं आए। आँखों देखी पर वह विश्वास करना चाहती है,कानों सुनी को तब तक भ्रम समझकर त्याज्य समझती है,जबतक उसके स्पष्ट प्रमाण न उपलब्ध हो जाएँ । विपक्ष की लुभावनी घोषणाएँ इसी लिए उसपर अधिक प्रभाव नहीं डाल सकीं।सामान्य जनता का इतना प्रबुद्ध होना  वस्तुतः लोकतंत्र की आवश्यकता है और यही उसकी सफलता की प्रथम शर्त भी।  धर्म जाति , पिछड़े अगड़े के नारों के सहारे लड़ी गयी लड़ाइयो के पीछे छिपी स्वार्थी रणनीति कोअगर वह पहचानने लगी है तो देश में आते हुए नये युग की यह शुरुआत है।  छद्म धर्मनिरपेक्षता की असलियत को वह पहले ही भाँप चुकी है अतः इस शब्द का सहारा प्रस्तुत चुनाव में नही लिया गया।उसने देखा कि जाति धर्म वर्ण केमुद्दे में फँसकर असली विकास के मुद्दों को गँवा देना  स्वयं की ही हानि करना है अतः उनके दिनानुदिन के जीवन को प्रभावित करने वाले भ्रष्टाचार के मुद्दे को उसने प्राधान्य दिया। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व पर अपना विश्वास प्रगट किया।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए  राष्ट्रीय सुरक्षा ,राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे उसे अधिक प्रिय लगे। सबसे बड़ी बात कि वह लोकसभा चुनाव के उचित मुद्दों और विधान सभा के चुनाव के मुद्दों मे भलीभाँति पहचान करना जान लिया।मध्यवर्ग नेतो इस राष्ट्रवाद के मुद्दे को हाथों हाथ लिया। उसे पुलवामा अटैक के बदले सर्जिकल स्ट्राईक का किया जाना , पाकिस्तान तो अलग थलग कर दिया जाना विश्व में आतंकीदेश के रूप में पहचान बना देना , सभी भगोड़े कर्जदारों पर पकड़ बना लेना और  अन्य सभी देशों पर अपनी वैचारिक प्रभुता स्थापित करना आदि प्रिय लगा। यह वर्ग प्रबुद्ध वर्ग होता है और अपनी वैचारिक दृष्टि की छाप अपने से नीचे वाले वर्गों पर स्पष्ट ही छोड़ता है।राष्ट्र सुरक्षा और राष्ट़ोत्थान केमार्ग में आने वाली बाधाओं से वह अगर स्वयं नहीं लड़ सकता तो उसे मनोबल प्रदान करने से वह नहीं चूकना चाहता।इस कार्य का निर्वाह उसने बखूबी किया। इस मध्यवर्ग से छनकर नीचे आनेवाली विचार धारा तथाकथित उस निम्न वर्ग को अवश्य प्भावित करती हैं जो भौतिकऔर वैचारिक रूप से उसकी समकक्षता स्थापित करना चाहते हैं। राष्ट्रवाद का मुद्दा  युवा वर्ग को सर्वाधिक प्रभावित करता है और जनमत निर्माण में उनकी  सर्वाधिक  भूमिका होती है।

भारत अपने नेताओं को सम्मान देना चाहता है। नायक पूजा इसकी संभ्रांत परम्परा रही है।  उसके नायकों को गाली गलौज करने वालों को वह अपना विश्वास नहीं दै सकती। विपक्ष का एकमात्र एजेंडा मोदी हटाओ भी जनता को रास नहींआया।  मोदी नहीं तो कौन –यह प्रश्न सदैव रहा। गठबंधन के किसी नेता पर वह विश्वास नहीं कर सती। जनता स्थायित्व चाह रही थी ताकि विकास कार्य आगे बढें। गठबंधन के अस्थायित्व को वह सदैव परख चुकी है।मोदी को हटाने के लिए दिए हर नारे विपक्ष को उलटे पड़ते गये औरउसके विगत इतिहास को उभारने में मददगार हो गये।

यह एक  साफ सुथरी राजनीति की भारत में शुरुआत होती सी जान पड़ती है जिसमें सर्वजनहिताय ,सर्वजन सुखाय की भावना पवित्र भावना के समान जुड़ती हुई दिखायी देती है।वस्तुतः लोकतंत्र की मूल भावना भी यही है।अगर सफल कार्यों का श्रेय जनता को दिया जाता है तो वह शक्तिमान बन जाती है और अधिक कार्यों के प्रति सचेष्ट भी होती है।

वस्तुतः  प्रस्तुत चुनाव का परिणाम बहुत अधिक चौंकानेवाला नहीं रहा। विपक्ष के आरोपों का निष्प्रभावित होते जाना अवश्य्म्भावी था। ऐसा अब विपक्ष के कुछ दल भी स्वीकार कर रहे हैं कि उछाले गये किसी मुद्दे में कोई दम नहीं था।

परिवारवाद को जनता ने नकार दिया, राहुल हलाँ कि मुखर रहे पर प्रभाव नहीं छोड़ पाए।प्रियंका गाँधी भी दबी दबी सी लगीं। अन्य क्षेत्रीय नेताओं की छद्म देश हित की चिन्ता जनता ताड़ गयी।

जैसा कि पूर्व कल्पित था सारे दल बिखर जाएँगे । लगता है इस चुनाव ने आत्ममंथन के लिए भी अवकाश नहीं छोड़ा है।

देश के वैचारिक पटल पर राष्ट्रवाद के स्वर उभर कर आए हैं । यह देश के लिए शुभ संकेत है।  राष्ट्रवाद एक पृथक विवेच्य विषय है।किन्तु देश की बदलती हुई विचार धारा का यह एक सशक्त आधार बनेगा।

सत्ता पक्ष और विपक्ष भविष्य में अपनी भूमिकओं का निर्वाह किस प्रकार करता है , यह देखने और परखने का विषय है।

 

आशा सहाय–24–5–2019।

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