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लीक होना प्रश्नपत्रों का

चंद लहरें

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यह अत्यन्त कायरतापूर्ण प्रयास है कि सीबी एस ई के दसवीं के गणित एवम बारहवीं के अर्थशास्त्र के प्रश्नपत्र लीक कर दिये गये।यह कृत्य सीधे सादे ढंग से आर्थिक लाभ के लिए किया गया क्योंकि प्रत्यक्ष परिणाम तो लीक करनेवालों और उसका लाभ उठानेवालों को यही मिला।चन्द लोलुप व्यक्तियों के इस कृत्य नेन केवल केन्द्रीय विद्यालय  परीक्षाबोर्ड के पदाधिकारियों और  परीक्षा पद्धितिपर कीचड़ उछाले बल्कि उसे राजनीतिक मुद्दा भी बना दिया।आलोचकों और वर्तमान सरकार और प्रशासन से खार खाए लोगों के वाग्वाणों के प्रहार भी होने लगे।वस्तुतः किसी भी बोर्ड की दसवीं और बारहवी की परीक्षा लेने की प्रणाली करीब करीब एक सी है।इसमें प्रश्नपत्रों के लीक होने का कोई अवसर नहीं मिलना चाहिये पर जिस देश में बड़े बड़े घोटाले अवसरों को अपने अनुरूप कर के कर लिए जा सकते है वहाँ के लिए किसी छोटे से दरवाजे से  पेपर को लीक कर देना कौन सी बड़ी बात है। ऐसी स्थितियों को जन्म देने वालों को परिणाम की परवा नहीं होती। वे चोरी डकैती की तरह ही सिर्फ तात्कालिक परिणामों पर ही नजर रखते हैं। अतः प्रश्न पत्र बनने से लेकर परीक्षार्थियों के मध्य वितरित होने के किसी भी स्तर पर लीक हो सकता है अगर इस प्रक्रिया में संलग्न प्रत्येक व्यक्ति अपनी नैतिक जिम्मेदारियों का पालन न करे।स्वयं का अनुशासित होना ही बहुत सारी समस्याओं का समाधान होता है।

प्रश्नपत्र सेटिंग से लेकर प्रश्नपत्रों की सीलिंग एवं परीक्षा पूर्व स्ट्राँग रूम में पहुँचाने की प्रक्रियाअत्यधिक गोपन एवम् सुरक्षित होती है।परीक्षा प्रारम्भ होने के कुछ समय पूर्व ही सम्बद्ध केन्द्राधीक्षक अथवा उसके द्वारा अधिकृत व्यक्ति को दिये जाते हैं।पेपर्स के पैकेटों को खोलने के पूर्व कई शिक्षकों ,केन्द्राधीक्षक के हस्ताक्षर समय अंकित करते हुए लिए जाते हैं। करीब पंद्रह मिनट के समय में यह सब घटित हो जाता है। अतः कहा जा सकता है कि परीक्षार्थियों तकप्रश्नपत्रों के पहुँचने की यह यात्रा सुरक्षित होती है।किन्तु इन्ही शिक्षकों, केन्द्राधीक्षक के मिली भगत से अगर कुछ समय पूर्व ही इसे खोल लिया जाय तो यह उसे लीक करने के लिये काफी हो सकता है। प्रश्न सिर्फ नैतिकता का है। प्राप्त समाचारों के अनुसार यही हुआ सम्बद्ध प्रकरण में।यह सबसे आसान तरीका था।

नैतिकता का प्रश्न तो हर स्तर पर है। सेटर ,मॉडरेटर के पूरे समूह के साथ शर्तों की नियमावली में उनके लिए निर्देश होता है कि उनका कोई सगा सम्बन्धी परीक्षार्थी न हो। कोई परिचित भी नहीं। पर ये बातें जमाने पूर्व का स्मरण कराती हैं जब वे सत्य ही इन शर्तों को स्वीकार करते थे।पैसे कमाने के लोभ में कौन किस हद तक गर्त में गिर सकता है ,इसकी कल्पना आज आसानी से ही की जा सकती है।कानून से सभी बँधे होते हैं पर गैर इमानदारी की अपनी प्रवृतियों पर अंकुश लगाना अत्यधिक कष्टकर होता है।

आज कोचिंग सेन्टर्स की हर छोटे बड़े शहरों में भरमार है। ये दुकानें हैं जो आय के साधन हैं । अपने विद्यार्थियों को येन केन प्रकारेण अच्छे अंक दिलाने में विश्वास रखते हैं। स्वयं आगे बढ़कर उनकी मदद नैतिक अनैतिक हथकंडों से करने को तत्पर इन संस्थानों को छात्रों , अभिभावकों की सहमति भी प्राप्त होती है।वे सभी जिम्मेवार होते हैं जो प्रश्नों ,प्रश्नपत्रों की सम्भावना से लेकर मूल्यांकन केन्द्रों अथवा परीक्षक तक पहुँच बनाने को तत्पर होते हैं।अधिक से अधिक पैसे कमाने के इस खेल के दौरान  अगर पेपर ही लीक कर दिया जाय और व्हाट्स एप जैसे जरिए से छात्रों के विभिन्न समूहों तक पहुँचा दिया जाय और रही सही कसर प्रश्नों  के उत्तर भी उनतक भेजकर पूरी की जाय तो इससे बड़ी सफलता की कामना और क्या  करें।

हुआ कुछ ऐसा ही । कोचिंग सेन्टर के शिक्षकों के साथ   वे परीक्षाकेन्द्र के पदाधिकारी भी अरेस्ट किए गये जिन्होंने निर्धारित समय के पूर्व प्रश्नपत्र के पैकेट खोल दिए।

यह एक बहुत बड़ा अपराध है, घोर अदूरदर्शिता का परिणाम है, और तथाकथित अट्ठाइस लाख छात्रों की मानसिकता और योग्यता  के साथ खिलवाड़ है ।बिहार में हुए टॉपर घोटाला से भी अधिक कदर्य आपराधिक कांड है।

आज जहाँ .5 अंको से भी छात्रों की वरीयता निश्चित की जाती हैबहाँ इस प्रकार साल्व्ड प्रश्नपत्रों के जरिये सारी प्रतियोगितात्मक भावनाओं को अनायास कत्ल कर देने जैसा प्रयास है।

प्रश्न उठता है कि आखिर इसका मूल उद्येश्य क्या है?सिर्फ पैसा,कुछेक छात्रों की सहायता करना,या सम्पूर्ण व्यवस्था को बदनाम कर किसी नेता, मंत्री या पार्टी पर प्रश्नचिह्न उठाना ?आज की स्थितियों में उद्येश्य कुछ भी हो सकता है।कुछ प्रत्क्ष और कुछ अप्रत्यक्ष।

हम वहाँ तक नभी सोचने की आवश्यकता समझें तो शेष छात्रों के दृष्टिकोण से देखें जिन्होंने अपनी तैयारी के बल पर परीक्षा दीहै। तैयारी उन्होंने चाहे पूरे कोर्स को पढ़कर कीहो या सिलेक्टिव—परीक्षा देकर उन्होंने मुक्ति की साँस ली है।दुबारा परीक्षा देने की बात उनके गले से नहीं उतरती।पर अगर बोर्ड के प्रस्तावित कोर्स  औरउसके आधार पर ली गयी परीक्षाकी दृष्टि से देखें तो उनसे पूरी पढ़ाई क उम्मीद की जाती है।और तब उन्हे पुनर्परीक्षा से भी ऐतराज नहीं होना चाहिए। किन्तु पुनर्परीक्षा मे प्रश्नों के दुहराये या नही  दुहराये जाने की कोई गारंटी नहीं होगी । यह भी एक विवादास्पद विषय होगा।छात्रों ने आंदोलन शुरु कर दिया है।उनके तर्कों को सुनने के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार है।पुनर्परीक्षा देने अथवा न देने,दोनो ही स्थितियों में सही न्याय किस  प्रकारकिया जाएगा,यह भविष्य के गर्भ में है। उन अपराधियों को तो अवश्य ही कठोर दड मिलना चाहिए जिन्होंने ऐसी हरकत की ।सम्बद्ध कोचिंग संस्थानों और ऐसे विद्यालयों जहाँ काप्रबंधन इतना सशक्त नहीं कि वह परीक्षा लेने से सम्बन्धित नियमों का पालन कर अथवा करवा सके,को बंद करवा देना चाहिए।और इन व्हाट्म एप जैसे एप्स के लिए क्या कहा जाए जो इतनी बहुमूल्य सवाएँ प्रदान करते हैं।यह किसी भी प्रकार देश के लिए हितकर नहीं।

 

आशा सहाय 4—4—2018  ।

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