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देशभक्ति और वन्देमातरम्

चंद लहरें

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vandematram

पुनः स्वतंत्रता दिवस आ रहा है। शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगान और देशभक्ति गानों की धूम मचेगी। देश में पुनः नयी ऊर्जा जागृत करने की कोशिश की जाएगी। शैक्षणिक संस्थाएँ ही क्यों हर उस संस्था में, जिससे बद्धिजीवी लोग जुड़े होते हैं, स्‍वतंत्रता दिवस का महोत्सव मनाया जाएगा। संघर्ष का नाम लिया जाएगा। बड़े-बड़े नेताओं का स्मरण किया जाएगा और हाँ राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के साथ ‘वन्देमातरम’ का भी अनिवार्य गायन होगा। क्योंकि कुछ राज्यों में हाइकोर्ट के आदेश से इसे अनिवार्य कर दिया गया है।

यह वन्दे मातरम शब्द ही बहुत विवादास्पद बनता जा रहा है। खासकर कुछ कट्टर धर्मानुयायियों के द्वारा, जिनके अनुसार भारत भूमि को माता की संज्ञा से अभिहित करना उनके धर्मादेश का उल्लंघन है। यह विषय बिल्कुल पृथक तो नहीं पर अनन्तर विचार करने योग्य अवश्य है। हाँ तो इस प्रकार वर्ष भर विस्मृतप्राय राष्ट्रभक्ति की भावना पुनः जाग्रत करने की कोशिश की जाएगी। प्रश्न है कि एक दिन देश के प्रतीकों का इस्तेमाल कर लेना, उनके लिए भक्ति का प्रकाशन कर शेष दिनों देशविरोधी गतिविधियों या यूं कहें कि देश और काल को ताक पर रखकर सिर्फ स्वार्थ में लिप्त हो जाना ही राष्ट्रभक्ति है, तो यह राष्ट्र के किस काम की।

यह तो एक दिन का उबाल है, जिसका ताप दूसरे-तीसरे दिन तक भी नहीं ठहरता। सिर्फ इन प्रतीकों का इस्तेमाल ही देश भक्ति का पर्याय होता, तो किसी को इनके उपयोग पर क्यों हिचक होती और सभी देशभक्त की परिभाषा के अन्तर्गत आ जाते। पर इसका यह अर्थ भी नहीं कि सीमा पर कुर्बान होने वाले सैनिक ही देशभक्त हैं अथवा वे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में संघर्ष किया या अपनी भागीदारी दर्ज की, या फिर वे जिन्होंने अपनी जान को जोखिम में डालकर देश को आजाद करने का सपना देखा था। वे भी तो देशभक्त थे, जो एक आह्वान पर इनके पीछे-पीछे चल पड़े थे। वे भी देशभक्त थे, जिन्होंने संग्राम अथवा क्रान्ति में जुड़ने की इच्छा रखने वाले सपूतों को अगली पंक्ति में लाठी और गोली खाने की अनुमति दे दी थी। प्रकारान्तर से पूरे देश ने उस समय देशभक्ति का परिचय दिया था।

देशभक्ति प्रदर्शित करने के इस तरीके की माँग उस काल की आवश्यकता थी। देश भक्ति प्रदर्शित करने का स्वरूप युगधर्म सापेक्ष होता है। तरीके काल के अनुरूप बदलते हैं। वस्तुतः जिस देशभक्ति की बातें हम करते हैं, उसमें निहित देश को ही समझना अधिक आवश्यक है। क्या विश्वपटल के मानचित्र पर अंकित भारत की सीमा रेखाओं से बनी आकृतिजन्य भू-भाग मात्र भारत है? जिसकी सीमाओं का रक्षण ही देश का कर्तव्य है? या कि उस देश की वह आत्मा जो वहाँ के जन-जन में बसती है। वहाँ की सभ्यता और संस्कृति जो विश्व में अनूठी है। वह शस्य श्यामल भूमि अकूत सम्पदा से युक्त, जो यहाँ के लोगों का पोषण करती है। एक सम्पूर्ण देश का चित्र हमारे मस्तिष्‍क में कुछ ऐसा ही बनता है, जिसके लिए भक्ति रखना देशभक्ति का दर्जा पा सकता है। किन्तु इन सबके केन्द्र में यहाँ का मानव समूह है, जिसकी आकृतियाँ भिन्न-भिन्न रूप रंग की तो हैं, खान-पान, वेशभूषा, विश्वास और सांस्कृतिक तौर तरीके भी भिन्न हैं। पर वे इस देश को अपना देश समझ अपने नित्य बदलती स्थितियों के साथ यहीं रहना पसन्द करते हैं।

आज समय बदल गया है। भारत स्वतंत्र है। इस स्वतंत्रता की और संप्रभुता की रक्षा करने में संलग्न देश की अपनी सरकार है, जिसे देशभक्ति की प्रथम पहचान बनकर उभरनी चाहिए। यह ऐसा है या नहीं, यह एक गम्भीर प्रश्न है। पर गम्भीरता से विचार करें, तो ऐसा लगता है कि वे लोग जो इस लोकतांत्रिक सरकार का निर्माण करते हैं, देश की रक्षा, विकास, देशवासियों के हितों की रक्षा और देश को हर तरह की आपदा-विपदा से बचाने के लिए, वे भी तो देशभक्ति की एक भावना के अन्तर्गत ही कार्य करते हैं।

देशभक्ति की मात्रा में कम-ज्‍यादा की संभावना हो सकती है, क्योंकि सरकार निर्माण में उनके स्वार्थ अथवा निजी हित सिद्ध करने की भावना का प्रथम स्थान होता है। पर यह भी सत्य है कि देशभक्ति की एक अन्तर्भावना कहीं न कहीं उनके हृदय में अवश्य होती है। अन्यथा राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा जैसे मुद्दे उनके मन को आन्दोलित नहीं करते होते। आज देशभक्ति की पहचान बदलनी है। हर वह व्यक्ति जो देश के गौरव की रक्षा करनें में प्राण पण से जुटा है, देशभक्त की श्रेणी में स्थान पा सकता है। तब इस देश का गौरव किन कार्यकलापों और भावनाओं से जुड़ा है, इसे भी मन में स्पष्ट करने की आवश्यकता है।

वर्षों पूर्व देश के एक महान विचारक, हिन्दूधर्म की पताका विश्व में लहराने वाले व्यक्ति स्वामी विवेकानन्द ने धार्मिक वाह्याडम्बरों के परिणामस्वरूप मार्ग से भटके जनसमुदाय को कहा था कि देशभक्ति देश के प्राचीन स्वरूप की रक्षाकरना, संस्कृति के प्रतीकों की रक्षा करना मात्र नहीं, बल्कि मानवमात्र की सेवा करने में है। देश का प्रत्येक व्यक्ति संतुष्ट हो जाय, कोई भूखा-नंगा न रहे, दरिद्रता का कोई अवशेष न रहे, उनके अभ्युदय के लिए प्रयत्न करना ही सच्ची देशभक्ति है।

यह सच है कि उस समय उनकी आँखों के सम्मुख भारत की तैंतीस करोड़ जनता की दरिद्रता थी, अशिक्षा थी। आज हमारे सम्मुख करीब एक सौ पच्‍चीस करोड़ जनता है और यह संख्या बढ़ती ही जाएगी। पर मूल समस्याएं वही हैं। आज भी वह कथन उतना ही सार्थक है। उनके अनुसार देश जब समस्याओं से ग्रस्त हो, तो उनके सामने वेद वेदांगों के सिद्धांतों का बलात् आरोपण देशभक्ति का प्रमाण नहीं, देशद्रोह का प्रमाण हो सकता है।

यह सच है कि आज भारतीयों की आवश्यकताएँ उपरोक्त विषयों तक सीमित नहीं रह गयी हैं। अब विश्व के समृद्ध देशों की समस्त सुविधाओं की प्राप्ति की आकाँक्षा वे करने लगे हैं। उनकी इन महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति भी सामान्य स्तर पर किये जाने की आवश्यकता है, अन्यथा योग्यता का पलायन होता है। देश की योग्यता देश में रहे, अतः अनुकूल वातावरण की सृष्टि करना भी देश की सेवा करना है। इसे हम देश को विकास के अन्तर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप बनाना भी कह सकते हैं। आज हम इन मुद्दों पर अपनी दृष्टि केन्द्रित करने के स्थान पर छोटी-छोटी महत्वहीन बातों में देशभक्ति की पहचान ढूँढने लगे हैं।

‘वन्देमातरम’ एक ऐसा ही मुद्दा है। भारत को माता न कहने की जिद कुछ लोगों में अधिक ही बलवान होती जा रही है। जन्मभूमि को माता के समान आदर देने में किसी को भी गर्व की अनुभूति होनी चाहिए। प्रत्येक देश की जनता अपनी मातृभूमि या मदरलैंड का सम्मान करती है। भारत के लोग,चाहे वे जिस धार्मिक मूल के हों, इसे यह सम्मान प्रदान करने में क्यों संकोच करें । पर जब यह प्रश्न धार्मिक वाह्य मान्यताओं, आडम्बरों और आचरणों से जुड़ जाता है, तो इसके लिए दबाव बनाना अनुचित है। भारत मिश्रित संस्कृतियों या यूं कहें कि विविधताओं वाला देश है। विविधताओं में एकता की स्थापना का आदर्श ही सदैव यहाँ पोषित किया जा रहा है। हम उस विविधता को नकारें तो देश की विराटता भी नकार दी जाएगी। इसलिए अगर कुछ प्रतिशत लोग वन्देमातरम का उच्चारण मुख से नहीं भी करते और अपने अन्य कार्यों से देश का विकास करने में, जनता की भलाई करने में लगे रहते हैं। उसके जय-पराजय से क्रमशः गर्वित अथवा आहत होते हैं, तो वह क्षम्य होना चाहिए।

वन्देमातरम न कहकर जय हिन्द या हिन्दुस्तान की जय कहना भी बुरा नहीं। वन्देमातरम की आवाज हृदय से निकलनी चाहिए। उसके लिए एक अनुभूति की आवश्यकता है, जिसे इस नारे और गायन के द्वारा स्वतंत्रता संग्राम के जुनून के दौरान अनुभूत किया गया था। बिना उस अनुभूति के इस नारे के कथन और गीत के खोखले गायन से क्या लाभ। सर्वप्रथम सभी को उस अनुभूति से जोड़ने का प्रयत्न होना चाहिए। उन्हें आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा देनी होगी, ताकि वे इस देश को मातृवत सम्मान दे सकें। बलात् यह करवाना सर्वथा अनुचित है।

राष्ट्रप्रेम अगर उनके मन में जागृत करना है, जो अब तक इस देश को अपना नहीं समझते और इसे विभाजित कर देने पर आमादा हैं, तो उसके लिए दो तरह की व्यवस्था की जा सकती है। सामाजिक स्तर पर त्याग और प्रेम के विस्तार के द्वारा उन्हें अपना बनाने का प्रयत्न या अति होने पर कानूनी दंडात्मक व्यवस्था। पर यह दंड व्यवस्था भी सुधरने का मौका देने के लिए होनी चाहिए।
जेएनयू या हैदराबाद यूनिवर्सिटी जैसे विश्वविद्यालयों में परिपक्व मानस के विद्यार्थियों के मन में व्यवस्था के प्रति असंतोष था, जिसे उन्होंने अपने विचारों के माध्यम से स्पष्ट करने की कोशिश की थी। प्रश्न यहीं उठता है- बौद्धिकता अथवा बौद्धिक विकास का। विश्वविद्यालय का अर्थ और कार्य देश-विदेश की सभी विचार धाराओं, ज्ञान-विज्ञान की समस्त उपलब्धियों से अवगत करा अन्य विविध कार्यकलाप जनित प्रयासों से विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास को समर्पित होता है। यह विकास उनके मन में किसी भी प्रकार की विचारधारा के पोषण में मददगार हो सकता है। हम उस पर सम्पूर्णतः अंकुश नहीं लगा सकते, पर पक्ष और विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कर उनकी उग्रता अवश्य कम कर सकते हैं। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलग्नता को पहचानकर उन्हें आगाह और कभी-कभी दंडित भी कर सकते हैं। किन्तु परिष्कृत ढंग से विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता तो उन्हें मिलनी ही चाहिए।

इसी देश में विभिन्न प्रकार की विचारधाराएँ विकास पाती रही हैं और अपना स्थान बनाती रही हैं। जहाँ वे हिंसक हो जाती हैं, आपराधिक गतिविधियों को जन्म देती हैं, वहां वे राष्ट्रद्रोही हो जाती हैं। इस देश में पलने वाली नक्सल विचारधारा ऐसी ही है। भय या आतंक उत्पन्न करने के कारण यह कभी भी कल्याणकारी नहीं है। आयुधों के बल पर अपनी बातें मनवाना कभी भी किसी विचारधारा को वैध नहीं बना सकती। उन्हें अपने अनुकूल बनाना हमारे लिए एक चुनौती है। वन्देमातरम की अनिवार्यता संस्थानों में हो पर इसकी धार पर राष्ट्र की एकता और  देशभक्ति को परखने की आवश्यकता नहीं। भारत की मिश्रित संस्कृति का मूल उदारता, सहिष्णुता और धैर्य में निहित है। इन्हीं भावनाओं के तहत अगर आपस में हम सब देश की एकता की रक्षा करने को कटिबद्ध हों, तो वही देशभक्ति का सच्चा प्रमाण होगा।

सच पूछिए तो सर्वाधिक नयी पीढ़ी, जो अभी गाँवों शहरों के विद्यालयों में सासें ले रही है, विभिन्न भाषाएँ सीख रही है, सभ्यता और संस्कृति सीख रही है, शिष्टाचार सीख रही है, वह कच्ची मिट्टी के समान है। उन्हें देश, उसके इतिहास और स्वतंत्रता का महत्व समझाने की आवश्यकता है। उस स्वतंत्रता की रक्षा से सम्बद्ध भावना का विकास करना है। भारत किस प्रकार माता के पद पर प्रतिष्ठित है और कैसे उसकी वन्दना की जानी चाहिए, यह उन्हें बताना है। वन्देमातरम का आरम्भ वहीं से करना है। जो युवा और प्रौढ़ मानसिकता अभी देश में पल रही है, वह शुष्कप्राय काष्ठ सदृश है, जिसे अपने अनुकूल बनाना इतना सरल नहीं है। उसे इस शब्द से जोड़कर देशभक्ति का प्रमाण देने को बाध्य करने की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती। हमें उनकी स्वतः स्फूर्त भावना की प्रतीक्षा करनी होगी। वन्देमातरम्।

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