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आखिर भ्रष्टाचार और अपराध से कैसे मुक्त हुआ जाए।

चंद लहरें

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अभी हाथमे कलम लेकर बैठी हूं।समझ में नही आता कि क्या लिखूँ। सुबह से कुछविचार आन्दोलित कर रहे हैं मनको।भ्रष्टाचार समाप्त करने का बीड़ा उठाया है कुछ लोगों ने, पर यह भ्रष्टाचार महारानी देश के कोने कोने में विविध स्वरूप धरे ऐसी जड़ जमा कर बैठी है कि किसी के भगाए नहीं भागती। कोई लाख नाक रगड़ ले।अभी नोटबन्दी के दोष गुन फिर से सभी दलों द्वारा गिनाए जा रहे हैं। यह सही है कि बहुत सारे फायदे हुए हैं इसके । लागू होते हीजो कुछलोगों और कुछ पाटियों में हड़कंप मचा था, विरोध के स्वर उठे थे वे नोटबंदी के प्रभावक्षेत्र मे स्वयं के आ जाने के कारण ही ज्यादा थे। सामान्य जनता ने तब भी उसका समर्थन किया था, आज भी कमोवेश करती है। कुछ लोगों को बड़े बड़े नोटों के आने से कष्ट हुआ पर यह भी सच है कि जिनको अपनी अनैतिक कमाई को बचाना था, उन्होंने बचा ही लिया। और भ्रष्टाचार दूर करने में लगी संस्थाओं ने इसमें भी योग दिया ही। और जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो भ्रष्टाचार पर कैसे लगाम लगायी जा सकती है।यह तो निश्चित है कि दूरगामी प्रभाव अच्छे होंगे। एक बड़ी योजना में योजना के सारे सूत्रसीधे ही रहें,कहीं उलझें नहीं यह बहुत संभव नहीं हो सकता। परिणामतः कुछ लोगों का भ्रष्टाचार उजागर नहीं भी हो सका।भ्रष्टाचार मात्र नियम कानून बनाने सेसमाप्त नहीं हो सकता इसके लिए लोगों की मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। इमानदारी को जीवन में प्रश्रय देने की आवश्यकता है। इस देश मे स्वतंत्रता के पश्चात् बेईमानी का क्रमशः विकास और ईमानदारी का ह्रास जितनी तेजी हुआहै उसे विपरीत दिशा मे मोड़ना इतना सहज नहीं।
— कैशलेस ट्रांसजैक्शन की दिशा मे कम लोगों की रुचि जाग्रतहै। पूरी तरह कैशलेस होने से व्यापार बेनकाब होगा अतः लोग कैश के साथ लेनदेन पसंद करते हैं।घर में भरे नोटों का ।उसी तरह आदान प्रदान करते हैं। सपष्ट है कि लोग ज्यादा चतुर हैं।“तुम डाल डाल तो हम पात-पात” वाली लोकोक्ति हर क्षेत्रमें चरितार्थ हो रही है।जमीन से जुड़े निम्न मध्यम वर्ग के लोगों में कैशलेस के प्रति जानकारी की भी कमी हैपरिणामतः वे इस व्यवस्था का बहुत स्वागत नही कर सकते।अगर यह चतुराई मन की बेईमानी के कारण है तो यहीतथाकथित चतुराई इस व्यवस्था की आलोचनाओं के प्रकारांतर से रक्षकअथवा कवच बन जाती है।कैशलेस के प्रति सम्पूर्ण समाज की स्वीकृति धीरे धीरे आएगी जब थोड़ी और सख्ती होगी। पर सख्ती हर समस्या का समाधान भी नहीं। यह प्रतिक्रियाओं को जन्म देती है।थोड़ी प्रतीक्षा की भी आवश्यकता है।
— जी एस टी निश्चय ही आतुरता और व्यग्रता में लागू कर देने के कारण कई अनियमितताओं को जन्म दे रहा है। न उपभोक्ता सन्तुष्ट हैं न व्यापारी। उपभोक्ताओं से बढ् चढ़ाकर मूल्य वसूले जा रहे हैं । किसी क्षेत्र में मूल्यों में राहत नहीं है। दवा विक्रेता कहते हैं अभी तो इसी दर पर जी एस टी जोड़कर दूँगा ।नया स्टॉक आने तक तो सहना होगा। ऐसा ही बहुत सारे क्षेत्रों में हो रहा है। आलोचना अवश्यंभावी है। सरकार जी एस टी दरों मे कमी करने का प्रयास कर रहीहै। पर कितने प्रतिशत व्यापारी उसका लाभ उपभोक्ता तक पहुँचने देंगे, कहना मुश्किल है।यह भ्रष्टाचार है जो हर सुधारवादी योजना से निपटना जानती है और अनपढ़ को तो छोड़िए पढ़े लिखे लोगों को भी वेवकूफ बनाती है।
— प्रश्न है चारो ओर फैले इस भ्रष्टाचार की शिकायत किससे की जाए।सरकारी तंत्र का हर महकमा पुराने रुख पर कायम रहना चाहता है। अपराधियों के बजाय इनकी चौकसी कीसख्त आवश्यकता है।थोड़ा भय अवश्य उत्पन्न हुआ है पर वह पर्याप्त नहीं ।समाज मे नियम कानून न माननेवालों को पुलिस थाने की धमकी दी जाती है,या सम्बद्ध विभाग के अधिकारी को सूचना दी जाती है। मामले की जाँच पुलिस को सर्वप्रथम सुपुर्द की जाती है और भारतीय पुलिस का मनोबल इतना गिरा है कि थोड़े से प्रलोभन से वे कर्तव्य पथ से विचलित हो जाते हैं।एक युग था—स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ दिनो पश्चात तक कि हमे पुलिस पर भरोसा था। मातापिता बाहर निकलते वक्त बच्चों को हिदायत देते थे कि जरूरत पड़ने पर वे पुलिस की सहायता लें। पर आज वे रक्षक नहीं भक्षक प्रतीत होते हैं। सामान्य जनता उनका सामना करने से कतराती है—पता नहीं वे किस केस में किसे फँसा दें ,व्यर्थ डंडे लगा दें। साक्षात प्रमाण है वह आरूषि हत्याकांड का केस जिसमें बलात मनगढंत कहानियाँ बना निर्दोष तलवार दम्पति को हत्यारा सिद्ध कर वर्षों जेल मे रहने को विवश कर दिया। मृतका का व्यर्थ ही चरित्र हनन किया। जाने कितने फेक एन्काउन्टर हुआ करते हैं। भ्रष्टाचार से मुक्ति में इनकी सहायता लेना नहीं चाहते लोग।अभी भी जिस घटना ने मन को विशेष उद्वेलित किया है,वह है रेयान के मासूम प्रद्युम्न के हत्याकांड का सी बीआई द्वारा रहस्यो द्घाटन। पुलिस ने उनके अनुसार एक निर्दोष बस कन्डक्टर को अपराधी साबित करने की कोशिश की। उसपर अनैतिक आचरण का भी दोषारोपण किया। अभी यद्यपि दोष पूरी तरह प्रमाणित नहीं हुआ पर विद्यालय के ही ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थी ने अपराध स्वीकार किया है। वह छात्र विद्यालय बन्द करवाना चाहता था ताकि पैरेंट टीचर्स मीट नहो सके ओर परीक्षा टल सके।क्या विद्यार्थियों से पुलिस पूछताछ नहीं कर सकती थी।घटनास्थल की ठीक से जाँच नहीं कर सकती थी।? इसप्रकार की स्थितियों से इस महकमें पर से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है।
तब फिर अपराधों से कैसे मुक्त हुआ जाए और भ्रष्टाचारियों पर कैसे लगाम लगायी जाय –यह एक बड़ा प्रश्न है।

आशा सहाय 9-11-2017–।

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