Menu
blogid : 28001 postid : 24

मृगतृष्णा

Vision

  • 11 Posts
  • 1 Comment

रेत सी है अपनी ज़िन्दगी
रेगिस्तान है ये दुनिया,
रेत सी ढलती मचलती ज़िन्दगी
कभी कुछ पैरों के निशान बनाती
और फिर उसे स्वयं ही मिटा देती,
कांटों को आसानी से पनाह देती
फूलों को ये रेत हमेशा नकार देती,
जो रह सकता है प्यासा उसे रखती,
बाकियों को मृगतृष्णा में उलझा देती।
दूर तक भी कोई नहीं नजर आता
रेत ही रेत में सब ओझल हो जाता,
प्यास से जब मन बावला होता है,
हर मृगतृष्णा उसे अपना पराव लगता है,
और एक कोने से दूसरे कोने भागते हुए
रेत में ही रेत दफन हो जाता है,
रेगिस्तान राज यूं ही चलता है
हर रोज़ कई कहानियों को रेत में कैद कर
अपने राज्य की शान बनाए रखता है।
©अनुपम मिश्र

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

Read Comments

Post a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *