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पंछी

Vision

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किसी पिंजरे में कैद पंछी की तरह
जैसे हमारा मन भी कैद हो गया है,
सामने खुली चांदनी नजर आती है
पर चार दिवारियों के बाहर नहीं निकल पाती,
कुछ रस्मों की दीवारें हैं
कुछ मर्यादाओं की रेखाएं हैं
और कुछ ऊसूलों की सलाखें हैं
जिनको तोड़कर जाने की उम्मीद नहीं
बस देखकर सुकून मिले अब वही सही,
ऐसा नहीं कि भीतर जोश या हिम्मत नहीं
पर यह सोचकर हूं मन को बांध लेती
कि जब इस पंछी का अंत निश्चित है ही
फिर क्यूं इसे खुले में छोड़ना कभी,
येे बावला तो देख लेता है कभी भी कुछ भी
और चाहता है कि सब मिल जाए उसे यहीं,
बेहतर है कि ये पिंजरे में बंद रहे यूं ही
पता नहीं फट पड़े कब कौन सी ज्वालामुखी।
©अनुपम मिश्र

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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