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मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा

Anuradha Dhyani

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ऑफिस से वापसी में गाडी के ड्राप पॉइंट से पैदल चल कर अपने वोर्किंग वीमेन हॉस्टल तक आती थी… सड़क के दोनों ओर पेड़ …आराम से अपनी ही धुन में हर दिन हरे-भरे रास्तों को देखते हुए बड़ा अच्छा लगता. सब कुछ ठीक चल रहा था.. पर एक दिन पता लगा कि थोड़ी ही दूरी पर बॉयज हॉस्टल भी है…. बस अगले दिन मेरी निगाहें बस उस हॉस्टल को खोज रही थी. जैसे ही बोर्ड पर देखा तो अचानक पैरों की गति तेज हो गयी और कुछ दिन ये क्रम चलता रहा जब तक कि मैंने नहीं सुना –

कुछ लड़कियां हॉस्टल मेस में बात कर रही थी कि यहाँ पास में ही बॉयज हॉस्टल है पर पहली बार ऐसा हुआ कि किसी ने कोई कमेंट नहीं किया.मैंने भी एक दम से सोचा – ” हां, ये बात तो सच है ” तभी पास में दूसरी हंसती हुई बोली – ” शुरू में मुझे भी डर लगा पर एक साल हो गया इस
हॉस्टल में ..मुझे भी कोई ख़राब अनुभव नहीं हुआ.

फिर वो बोली बनारस में तो ….एक दिन ऐसा नहीं जाता था जब हमने कमेंट न सुनी हो…इंदौर , दिल्ली …सबकी वही कहानी जो हर शहर कि लड़की को झेलनी पड़ती है, जिसे वो अपने जीवन का हिस्सा बना लेती है क्योंकि ये आम बात है … मै भी सोचती रही कि हम लोग कितना सुनते रहते है, कभी धक्के खाते है.

कभी समझ भी नहीं आता कि कोई भीड़ में गिरा या जानबूझ कर …पर कॉलेज दिनों में कई घटनाएं सुन कर डरते भी थे. जब कोई कहता था तो अन्दर से आग लग जाती थी और आज हम इस बात पर बात कर रहे थे क्यों किसी ने कुछ कहा नहीं ? हर दिन बॉयज हॉस्टल के सामने से गुजरते हुए लगता था- ” शायद कोई कुछ बोलेगा ”

कुछ दिनों के बाद मेरे तेज कदम फिर सामान्य हो गये क्योंकि कभी बुरा अनुभव नहीं हुआ. मैं नहीं जानती औरों का सत्य और अनुभव पर पुणे शहर में मैंने अपने आपको सुरक्षित पाया. मेरे कभी कदम भागे नहीं बल्कि शांत से चले चाहे वो दिन का समय या शाम का. बस में कभी गये भी तो मैंने लोगों को किनारे करके बैठा हुआ ही पाया. ये किसी शहर या समाज की संस्कृति कह सकते है…

इस घटना को आज पंद्रह साल से ज्यादा बीत गये पर हाथरस प्रकरण के बाद याद आया कि किस तरह एक समाज अपनी बेटियों के लिए कडवे या सुखद अनुभव दे सकता है. हम सभी ने कहीं न कहीं उस मानसिक शोषण को सहा है बस अंतर इतना है किसी को समझ ही नहीं आया या फिर किसी को उसके परिवार , मित्रो का सहयोग मिल गया और उसने उन बातों को किनार कर आगे बढ़ लिया…

हर दर्दनाक घटना…माँ-पिता को डराती भी है पर क्या आपको नहीं लगता कि केवल मानसिक रूप से भी यदि उत्पीडन हो तो क्या आत्मविश्वास रह पाता है….कुछ न भी हो पर भय ….कितनी घटनाएं हर दिन होती है …कोई पीछे से मार देता था , कोई कमेंट …कोई कुछ….क़ानून बन भी जाए
तो सही गलत में झूलता रहेगा…मानवाधिकार की बाते होंगी…जो प्रमाणित था फिर भी वकील उनका केस खिसकाते जाएंगे….कौन सा न्याय ?

हम कैंडल मार्च की बजाय उन लोगों का बहिष्कार करना क्यों नहीं शुरू करते जिनकी आँखे मजाक में भी स्त्रियों की अस्मिता पर प्रहार करती है…क्या उन सभी आखों को बंद कर दिया जाएगा जो लड़कियों को घूरती है और लड़कियां नीचे सर झुका कर आगे बढ़ जाती है…क्या उन
हाथो को आप रोक पायेगे जो बस में धक्के के बहाने अक्सर स्त्रियों को झेलने पड़ते है…

क्यों नहीं हम उस सिनेमा , उस काव्य, उस हर चीज का बहिष्कार करते जिससे ये घटनाएं बढती है….पर ये भी सोचती हूँ कि क्यों करते है हम ऐसी कल्पना ….जबकि हर दल में कुछ या बहुधा लोग की नजर में महिला एक वस्तु है. सत्ता पर हम ऊँगली उठा रहे है. उठाना हमारा अधिकार है पर क्या ये सब भी उस सड़े समाज का भाग नहीं जहाँ स्त्रियों को या तो देवी माना मूर्तियोंमें और साक्षात् रूप में शोषण किया जाता है.

निराश नहीं हूँ क्योंकि हर बार बुरा नहीं होता और पुरुष आपके सहयोगी भी होते है लेकिन इन घटनाओं के बाद सड़क चलते किसी व्यक्ति से मदद लेने में भय तो होगा ही …चाहे वो व्यक्ति सही हो या गलत….. नहीं जानते…लेकिन दुखी हूँ , चिंतित हूँ …जब हम अपने साथ हुई विकृतघटना या कमेंट से परेशान हो जाते है तो जिस के साथ ये अन्याय होते है.अकल्पनीय.

ऐसा न्यूज़ चैनल में सुना और अक्सर सुनते है -” लड़कियों को अच्छे संस्कार रखने चाहिए. सही संस्कार मिलने चाहिए ” आखिर कोई ये क्यों नहीं कहता कि हमारे समाज को ही अच्छे संस्कार और अच्छी सोच को अपनाने की जरुरत है.

नारों से हम,लिखकर हम दबाव बना सकते है, सत्ता या कानून में परिवर्तन हो सकता है.  पर विकृत सोच का क्या ?..उन्हीं पर अत्याचार भी करेंगे और उन्हीं से अच्छे, सही संस्कारों की कल्पना भी. आखिर इन घटनाओं को हम समाज की एक बड़ी समस्या क्यों नहीं मानते ? आखिर कब हम स्त्रियों के प्रति अपनी मानसिकता बदलेंगे ,ये प्रश्न हमेशा रहेगा ही…

अनुराधा नौटियाल ध्यानी

डिस्क्लेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण डॉट कॉम किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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