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सुशांत की मौत की असली वजह

ankitvaishnavblogs

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बात करेंगे नेपोटिज्म या भाई भतीजावाद की। सुशांत सिंह राजपूत के जाने के बाद सब लोग स्टार किड्स को गालियां दे रहे हैं। सोशल मीडिया साइट्स पर उन्हें ट्रोल किया जा रहा है व अनफॉलो किया जा रहा है, पर मुझे उनसे कोई दिक्कत नहीं है। पूछो क्यों ? क्योंकि हम सब नेपोटिस्ट हैं। एक्चुअली नेपोटिस्म एक बेसिक ह्यूमन टेन्डेन्सी है। अगर यह नहीं है तो कोई तार्किक व्यक्ति यही पूछेगा की भाई आपको सवा अरब की आबादी के होते हुए भी बच्चा पैदा करने की आवश्यकता ही कहाँ है? हालांकि इसे कुतर्क कहा जा सकता है, क्योंकि बच्चा पैदा करना एक प्राकृतिक क्रिया है और मानवता की सस्टेनेबिलिटी अर्थार्त निरंतरता के लिए संयमित प्रजनन आवश्यक है। पर हम इस चेतना के साथ बच्चा पैदा नहीं करते।

 

 

 

बच्चा पैदा करते वक्त हर एक को लगता है कि दुनिया का सबसे महान बच्चा वही प्रोड्यूस करेगा पेरेंट्स चाहते है कि बच्चा उनका नाम रोशन करे, हर जगह आगे रहे, कक्षा में अव्वल आए। पर अव्वल तो एक ही आता है पर इसका दबाव सारे बच्चो को झेलना पड़ता है। फिर हम कहते हैं कि सुशांत ने सुसाइड क्यों किया? बच्चा पैदा करने की उपरोक्त सोच भी नेपोटिस्म ही है। मेरे पेरेंट्स ने भी सोचा था कि एक अव्वल दर्जे का बच्चा पैदा करना है पर हुआ मैं, मेने तो ऐसा कोई विशेष काम नहीं किया पर इस बात का थोड़ा दबाव जरूर झेला। आप स्वयं पर ले कर देखिए, क्या आप अपने बच्चों को अवसर नहीं देंगे? क्या आप अपने परिजनों व अपनों का हित नहीं करेंगे? मैं यहां नेपोटिस्म को डिफेंड नहीं कर रहा, बस यह बताना चाह रहा हूं कि यह बेसिक ह्यूमन टेन्डेन्सी है। क्या राजनीति में ऐसा नहीं है? कोई भी पार्टी इससे अछूती नहीं है।

 

 

 

हमने आरक्षण की व्यवस्था की, पर क्या आरक्षण प्राप्त व्यक्ति ने अपने बच्चे को आरक्षण लेने से मना किया? बेटे ने भी इसका लाभ उठाया। आज एससी एसटी आरक्षण में तो इसे साफ देखा जा सकता है, जहाँ गरीब ऐससी ऐसटी बच्चा ऊपर उठ नहीं पाता,आरक्षण से लाभ उठा सफल हुआ पिता अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा तो देता है पर आरक्षण का लाभ बेटे के उठाने से मना नहीं करता है। इसीलिए आज आरक्षण के भीतर आरक्षण कि बात कि जा रही है। कोई मुझे यहां आरक्षण के सामाजिक कारण का दर्शन समझा सकता है और मैं वह समझता भी हूँ। पर यहां नेपोटिस्म तो है इसमें कोई दो राय नहीं है, चाहे कितनी भी सफाई दी जाए। यह देखने की बात है कि हम कितने डांवाडोल और हवागामी है। हावगामी से मेरा मतलब है हवा के साथ चल देने वाल।

 

 

 

सुशांत के सुसाइड से पहले क्या नेपोटिस्म नहीं था? उसके जाने के बाद हमें इस समस्या का एहसास हुआ और यह एहसास भी बस स्टारकिड्स को गालिया और उलाहना देने तक सीमित रहा। इससे पहले तो हम उन स्टार्किड्स के भक्त बने हुए थे। अचानक नफरत, यह क्या था? एक बात सोचिये कि क्या स्टारकिड्स को डिप्रेशन नहीं होता? अगर इस मामले में डिप्रेशन से जान दे डालने की वजह नेपोटिस्म ही है, तो फिर नेपोटिस्ट डिप्रेशन में क्यों है। उनके ट्रोल भी कम नहीं है और अभी तो हम यही कर रहे हैं, उन्हें डिप्रेशन में धकेल रहे हैं। वस्तुतः बात यह है की हमने इस समस्या को समझा ही नहीं। इस मामले में मूल समस्या सुसाइड व अवसाद से निपटने की है। नेपोटिज्म की समस्या का निवारण तो सीधा है हमें करना बस यह है कि अगर कोई सच में टैलेंट और लायक है तो उसे तवज्जो दीजिए और जो नहीं है उसे तवज्जो मत दीजिए।

 

 

 

दो-तीन फिल्में करके और चुनाव लड़के खुद ही बैठ जाएगा, पर नहीं तब तो हम नाम सुनते ही फिल्म देखने भागते हैं,वोट दे डालते है। और अब सुसाइड के बाद सब को विलेन बना दिया। ऐसा करके हम बस अवसाद को बढ़ा रहे हैं, बस अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। हमें इस सामाजिक समस्या पर गौर करना होगा, जो मूल में है। वह है सुसाइड व अवसाद से निपटने की समस्या। सुशांत जैसी स्तिथि में बहुत लोग हैं पर सबने तो ऐसा नहीं किया, कई लोग उससे भी बुरे दौर से गुजरने के बाद जीवन को चुनते हैं, मौत को नहीं। यह एक व्यक्तिगत चयन है और यह व्यक्ति की सामाजिक इम्यूनिटी या प्रतिरक्षा पर निर्भर करता है।

 

 

 

अवसाद किसी वायरस से कम नहीं है, इससे मुकाबला इस पर निर्भर करता है कि आपकी इम्युनिटी कितनी है। इससे लड़ने के लिए कुछ इम्युनिटी आप खुद बना सकते हैं और कुछ बाहरी सहयोग से तैयार की जा सकती है। यह वैसे ही काम करता है जैसे किसी वायरस से लड़ाई में खुद की और डॉक्टर के ट्रीटमेंट से बनी इम्युनिटी की आवश्यकता होती है। बाहरी सहयोग से इम्युनिटी बनाने के लिए कई उपाय हैं और यह हम सब को सामान्यतया पता भी है जैसे परिवार का सपोर्ट, दोस्त बनाना, किसी साइक्लोजिस्ट की सहायता आदि, पर इन सब में किसी अन्य व्यक्ति की आवश्यकता होती है। खुद इम्युनिटी डेवेलोप करने के भी कई नुस्खे हैं। जैसे नेगेटिव लोगों से दूर रहना, योगा करना, किसी खेल में रुचि आदि पर मैं आपको एक आयुर्वेदिक नुस्खा देता हूँ। जो इसका 100% इलाज है, हालांकि मैंने इस आयुर्वेदिक दवा का क्लीनिकल ट्रायल नहीं किया है।

 

 

 

इस इलाज में किसी अन्य की आवश्यकता नहीं है। यह बड़ा सिंपल है। जब भी आप अवसाद की स्थिति में हो तो आप अकेले मत रहिए। कोई कहेगा इसमें नया क्या है? पर साथ में करना यह है की आप किसी असहाय की सहायता कीजिए। आप किसी गरीब की सहायता कर सकते हैं। किसी जरूरतमंद की जरुरत पूरी कर सकते हैं। और कुछ नहीं अगर आप अपने गली के कुत्तों को भी खाना खिलाएंगे तो आप अपने मूल्य का एहसास करने लगेंगे। आपके अस्तित्व की उपयोगिता, उन लोगो के चेहरे पर आप साफ़ देख पाएंगे और यह इस स्थिति से निकलने के लिए एक एसेंशियल चीज है। हमें अपने मूल्य का एहसास होना। नेपोटिस्म अवसाद बढ़ाने के कई कारणों में से एक जरूर हो सकता है पर अगर हम अपनी सामाजिक इम्युनिटी पर काम करे तो इससे ही नहीं किसी भी वजह से हुए अवसाद या डिप्रेशन को आसानी से झेल सकते है।

 

 

 

डिस्कलेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी है। जागरण जंक्शन किसी भी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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