Menu
blogid : 28643 postid : 71

जौनपुर की कुछ कहानियां

डॉ. अंकिता राज
डॉ. अंकिता राज
  • 6 Posts
  • 1 Comment
Picture is clicked by Karan Singh

 

मैं सोचती थी कि इतिहास क्यूँ पढ़ते हैं। इतिहास पढ़ने से हमें खुद की, दूसरों की, समाज कि और पूरे संसार की बेहतर समझ हो जाती है। भारत के उत्तर प्रदेश में गोमती नदी के पवन तट पर स्थित है गौरवपूर्ण इतिहास वाला जनपद जौनपुर। आइये जानते हैं जौनपुर की कहानियाँ। पहले इसका भुगोल।

जौनपुर, वाराणसी मंडल के उत्तर पश्चिमी भाग में स्थित है। इसकी सीमा में हैं जनपद प्रयागराज, प्रतापगढ़, वाराणसी, भदोही, आज़मगढ़, अंबेडकरनगर, ग़ाज़ीपुर और सुल्तानपुर। इस जनपद से गोमती, सई, पीली, बसुही और वरुणा नदी बहतीं हैं। जिले में ग्यारह झीलें 48644 एकड़ में हैं। जनपद में 25000 तालाब हैं। यहाँ की जनसंख्या क़रीब 53 लाख है जिसमें महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या के तुलना में ज़्यादा है। ऋतु और महीनों के अनुसार जौनपुर का तापमान 9 से 41 डिग्री सेल्सीयस के बीच बदलता है। जौनपुर कृषि प्रधान जनपद है यहाँ रबी, ख़रीफ़ और ज़ायद तीन फसलें होती हैं। यहाँ सब्ज़ियों की पैदावार काफ़ी बढ़ गयी है और उसमें से मक्का और मूली प्रसिद्ध हैं। बिहार और नेपाल में 15 जनवरी 1934 में भूचाल आया था जिसका थोड़ा असर जौनपुर पर भी पड़ा था। जनपद में ना जंगल हैं और ना जंगली जानवर। जनपद ऊनी दरी के लिए आज पहचाना जाता है।

अब इतिहास पर नज़र डालते हैं। जौनपुर ऐतिहासिक रूप से शीराज-ए-हिंद के रूप में जाना जाता है, जिसकी ऐतिहासिक तिथियां 1359 से हैं। यह इत्र के लिए मशहूर है। बनारस के राजा ने अपनी पुत्री का विवाह अयोध्या के राजा देवकुमार से करवा दिया और अपने प्रभुत्व का कुछ हिस्सा भेंट कर दिया, जिसे डोभी क्षेत्र के रघुवंशियों ने बसाया। इसके ठीक बाद इस जिले में वात्सल्योत्री, दुर्गवंशी और व्यास क्षत्रियों का आगमन हुआ।

ग्यारहवीं शताब्दी में कन्नौज के गहरवार राजपूतों ने जफराबाद और यानापुर (जौनपुर) को समृद्ध और शक्तिशाली बनाना शुरू किया। राजा विजयचंद कन्नौज से यहां आए और उन्होने कई हवेली और किलों का निर्माण करा। आज भी जफराबाद के दक्षिण किले के खंडहर देखे जा सकते हैं। विजयचंद खालिस मुखलिस मस्जिद में रहते थे। 1194 ईस्वी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने मानदेव जो कि आज का जफराबाद है उस पर हमला किया। तत्कालीन राजा उदयपाल को हराने के बाद उन्होंने दीवानजीत सिंह को सत्ता सौंपी और तब के बनारस की ओर बढ़ गए।

शाही किला को वर्ष 1376-77 में फिरोज शाह तुगलक के मुखिया इब्राहिम नायब बारबाक ने खंगाला था। 1389 में फिरोज शाह के बेटे महमूद शाह गद्दी पर चढ़े। जब सड़कें नहीं थीं तब जौनपुर में आवागमन का साधन गोमती नदी थी। नाव पर बैठकर एक स्थान से दूसरे स्थान आते जाते थे। गौतमबुद्ध अपने भिक्षुओं के साथ पैदल यात्रा करते थे। इनकी सुरक्षा के लिये राजाओं ने कुछ पथ निर्मित करा दिये। सबसे पहले फ़िरोज़शाह ने यहाँ सड़कों की व्यवस्था करी। पुलों का निर्माण तथा सड़कों में सुधार के कार्य में बढ़ोतरी आयी और यहाँ सड़कों का जाल बिछ गया। उन्होंने सरबर ख्वाजा को मंत्री बनाया और बाद में 1393 ईस्वी में उन्हें मलिक-उल-शर्क का छोटा सा हिस्सा दे दिया और उन्हें कन्नौज से लेकर बिहार तक का क्षेत्र सौंपा। मलिक-उल-शर्क ने जौनपुर को अपनी राजधानी बनाया और इटावा से लेकर बंगाल और विंध्याचल से नेपाल तक अपना शासन स्थापित किया। कहा जाता है कि शहर बसाने के समय फ़िरोज़शाह ने अपने भांजे जूना खां को सपने में देखा जिसने उनसे प्रार्थना करी की उसी की स्मृति में इसका नामकरण किया जाये। इसलिए जौनपुर आज इस नाम से जाना जाता है। यह कथन सत्य ना मानने के कारण इस जनपद का नाम जवनपर बहुत दिनों तक चलता रहा।

झाँझरी मस्जिद गोमती के उत्तरी तट पर जौनपुर के सिपाह इलाके में है। इसे इब्राहिम शार्की ने बनवाया था। शर्क़ी राजवंश के संस्थापक मलिक-उल-शर्क का 1398 ईस्वी में निधन हो गया था, जिस पर उनके पालक बेटे सैयद मुरशाख जौनपुर के सिंहासन पर चढ़े। उनके छोटे भाई इब्राहिमशाह ने उन्हें कांटे की टक्कर देने में सफलता हासिल करी। इब्राहिमशाह एक निपुण और सक्षम शासक साबित हुए। शर्क़ी काल के दौरान, कई भव्य इमारतों, मस्जिदों और मकबरे का निर्माण किया गया था। फिरोजशाह ने 1393स्वी में अटाला मस्जिद की नींव

रखी थी जो इब्राहिम शाह ने 1408 में पूरा करी। इब्राहिमशाह ने जामा मस्जिद और बाड़ी मस्जिद का निर्माण शुरू कर दिया था, जिसे हुसैनशाह ने पूरा कर लिया था। जौनपुर जिले में शर्क़ी परिषद के दौरान मौजूद हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक संबंध एक मिसाल है जिसकी खुशबू आज भी मौजूद है।
1455 में लाल दरवाजा मस्जिद सुल्तान महमूद शर्क़ी की रानी बीबी रजनी ने बनवाया था। लोधे राजवंश ने 1484 ईस्वी से 1525 ईस्वी तक जौनपुर की गद्दी पर सत्ता की बागडोर संभाली। 1526 में बाबर ने पानीपत की लड़ाई में इब्राहिम लोधी को हराया और मार डाला। जौनपुर को फतह करने के लिए बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को भेजा, जिसने जौनपुर के शासक को हराया। 1556 में हुमायूं की मृत्यु पर उनका 18 वर्षीय पुत्र जलालुद्दीन अकबर गद्दी पर चढ़ा। 1567 में जब अली कुली खान ने विद्रोह किया तो फिर अकबर ने खुद हमला किया और इस लड़ाई में अली कुली खान मारे गए। अकबर जौनपुर में कई दिनों तक रहे। उनके समय में यह जनपद प्रांतीय राजधानी नहीं रह गया बल्कि एक सरकार के रूप मे देखा गया। इसके बाद सरदार मुनीम खान को शासक नियुक्त करने के बाद वह वापस चले गए। अकबर के शासनकाल में शाही पुल का निर्माण हुआ था।

ग्यारहवीं शताब्दी में यहां से मुहम्मद गजनबी हट गए। गयासुद्दीन तुगलक ने अपने पुत्र जफर खान तुगलक को जौनपुर दिया। 1722 में जौनपुर को अवध के नवाब के जिम्मा सौंपा गया। बाद में 1775 में जौनपुर राजा मनसाराम से अंग्रेजी के हाथों में चले गए। 1775 से 1788 तक जौनपुर कि गिनती बनारस में होती थी और तब यह रेजीमेंट डिकाना के हाथों में था। 1818 में पहली बार उप कलेक्ट्रेट की स्थापना हुई और बाद में यह एक अलग जिला बन गया। 1820 में आजमगढ़ जिले को भी जौनपुर के तहत लाया गया था लेकिन 1822 में आजमनगर का कुछ हिस्सा और 1830 में पूरा आजमगढ़ जौनपुर से अलग हो गया। 1857 में आंदोलन हुआ।

जौनपुर रियासत की स्थापना तीन नवंबर 1797 को हुई थी। इसके पहले राजा शिवलाल दत्त रहे तो वर्तमान में 12 वें राजा के रूप में कुंवर अवनींद्र दत्त दुबे हैं। वे हवेली में रहते दे। 224 वर्षों पुरानी इस हवेली को अब राज महल कहते हैं और व्यवसायी विनीत सेठ को किराए पर दे दी गयी। वह अब एक विवाह स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। माँ शीतला चौकिया देवी का मंदिर काफी पुराना है। शिव और शक्ति की पूजा अनादिकाल से चल रही है। इतिहास बताता है कि, हिंदू राजाओं के दौर में यह स्थापित हुआ। प्राचीन मंदिर, टीले, समाधि, मस्जिद, मकबरे मशहूर हैं और जिले में जगह-जगह पर दिखेंगे। इनको आज भी संभालकर रखा गया है।

जौनपुर विद्या का एक प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ पर्सियन, अरबी, उर्दू, संस्कृत और हिन्दी में कई रचनाएँ हुईं हैं। शिक्षा पहले घरों में दी जाती थी। उसके बाद गुरुकुल में आश्रम शिक्षा देने का दौर आया। जौनपुर में विराजे सभी राजा विद्याप्रेमी थे। शिक्षा के क्षेत्र में जौनपुर को ‘एलडोराडो’ नाम से संभोधित किया जाता है। संगीत-नृत्य और चित्र कला को पाठ्यक्रम का आवश्यक भाग था। बरसठी ब्लॉक सोनाई और खंडवा से 8वीं और 9वीं शताब्दी की मूर्तियाँ प्रकट हुई हैं। जौनपुर में दुर्गापूजा 1973 से मनाई जा रही है। 20 अक्टूबर 1987 को जौनपुर जनपद में वीर बहादुर सिंह पूर्वञ्चल विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

इस जनपद में घूमने के बाद एहसास होता है कि इतिहास की सुंदरता महसूस करना और जीवन में ज्ञान को बढ़ाना कितना आवश्यक है।

 

डिस्क्लेमर: उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी है। जागरण डॉट कॉम किसी भी तथ्य, दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

Read Comments

Post a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *