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सबके लिए मंगल है अंतरिक्ष अभियान?

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देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ‘विज्ञान से ही भूख और गरीबी की समस्या हल हो सकती है।‘ आज जब मंगलयान लाल ग्रह की कक्षा में प्रवेश करने जा रहा है और अमेरिका, चीन, जापान, रूस जैसे देश स्पेस मिशन्स पर अरबों रूपए खर्च कर रहे हैं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि इन अंतरिक्ष अभियानों की आम आदमी के लिए क्या उपयोगिता है?
भारत में अंतरिक्ष अभियान की शुरुआत करते समय डॉ. विक्रम साराभाई ने कहा था कि स्पेस साइंस और तकनीक का लाभ आम आदमी तक पहुंचना जरूरी है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) में स्पेस विभाग के सचिव डॉ. के. राधाकृष्णन ने अपनी किताब ‘स्पेस टेक्नोलॉजी – बेनेफिट्स टू कॉमन मैन’ में लिखा है कि अंतरिक्ष में इसरो के 20 सेटेलाइट्स हैं, जो संचार, प्रसारण, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन, पर्यावरण की निगरानी, मौसम का पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन में सहायक साबित हो रहे हैं।
उनके मुताबिक, इन अंतरिक्ष यानों से हर देशवासी के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक लाभ हुए हैं, सूचना तकनीक के माध्यम से त्वरित फैसले संभव हुए हैं, प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लाखों लोगों की जिंदगियां बचाई गई हैं।
भारत के लिए अंतरिक्ष अभियान की कामयाबी आर्थिक दृष्टि से भी अहम है। इस समय दुनिया का स्पेस बाजार करीब 300 अरब डॉलर का है। इसमें सैटेलाइट प्रक्षेपण, उपग्रह बनाना, जमीनी उपकरण बनाना और सैटेलाइट ट्रैकिंग शामिल हैं। टेलीकम्युनिकेशन के साथ-साथ यह दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता कारोबार है। भारत ने कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर में सही समय से प्रवेश किया और आज दुनिया के लीडर हैं। स्पेस टेक्नॉलजी में भी हम सफलता हासिल कर सकते हैं। हमारा पीएसएलवी रॉकेट दुनिया के सबसे सफलतम रॉकेटों में एक है और उससे प्रक्षेपण कराना सबसे सस्ता पड़ता है।
पीने के पानी से लेकर मनोरंजन तक में फायदा
अस्सी के दशक में चुनिंदा शहरों में टीवी थे। आज लगभग हर घर में टीवी है और डायरेक्ट टू होम (डीटीएच) तकनीक किसी क्रांति से कम नहीं है।
देश के करीब 70 हजार एटीएम इनसैट सैटेलाइट्स से कनेक्ट होकर ग्राहकों को बेहतर सेवाएं दे रहे हैं।
फिशिंग जोन में समय-समय पर एडवाइजरी जारी की जाती है। इससे हर जहाज हर साल औसतन पांच लाख रूपए का ईंधन बचाता है। देश में इस समय पचास हजार से ज्यादा मछली पकड़ने के जहाज संचालित हो रहे हैं।
सैटलाइट डेटा जमीन के अंदर पानी के संसाधनों का पता लगाने में बहुत कारगर साबित हुए हैं। राजीव गांधी पेयजल अभियान में इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। सैटेलाइट से मिले संकेतों के आधार पर तीन लाख कुएं खोदे गए। 95 फीसद में पानी निकला।
आज जीपीएस तकनीक आम बात हो चुकी है। जीपीएस की मदद से व्यक्ति तक राहत पहुंचाने के कई उदाहरण सामने हैं।
इनसान के स्पेस में जाने के बड़े कारण
अंतरिक्ष अभियानों की वकालत करने वालों से आमतौर पर पूछा जाता है कि जब धरती पर समस्याओं का अंबार लगा है तो दूसरे ग्रहों पर क्या चल रहा है, यह जानने के लिए हम अरबों रुपए क्यों खर्च करें? UniverseToday वेबसाइट ने यह सवाल अंतरिक्ष वैज्ञानिकों से पूछा, जो श्रेष्ठ जवाब मिले, वे इस प्रकार हैं:
धरती नष्ट हुई तो भी जिंदा रह सकेंगे : वर्तमान में जीवन सिर्फ धरती पर संभव है। यदि धरती को कुछ हो गया, मसलन- कोई विशाल ग्रह टकरा जाए, परमाणु युद्ध हो जाए, या प्राकृतिक आपदा सबकुछ बर्बाद कर जाए तो इनसान कहां जाएगा। दूसरे ग्रह पर जीवन तलाश लिया जाए, इसमें मानव जाति की भलाई है। चंद्रमा और मंगल पर जीवन मिलता है तो यह मानव जाति तथा धरती पर उसकी उपलब्धियों का बीमा होगा।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा : अपोलो मिशन की कामयाबी के बाद दुनियाभर के युवाओं में गणित तथा विज्ञान में करियर बनाने को लेकर जागरूकता बढ़ी है। समाज में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ऐसे में यह जरूरी है कि नई पीढ़ी हमेशा कुछ नया करने को लेकर सोचती रहे। अंतरिक्ष मिशन जारी रहेंगे तो यह प्रेरणा कायम रहेगी।
दुनिया को बेहतर ढंग से समझ पाएंगे : सभी अंतरिक्ष अभियानों का उद्देश्य ब्रह्मांड को समझना है। जीवन कैसे शुरू हुआ, ब्रह्मांड कैसे अस्तित्व में आया, क्या सिर्फ धरती पर ही जीवन संभव है…ऐसे सवालों के पुख्ता जवाब नई पीढ़ी को दे पाएंगे। बुध और मंगल ग्रह के अध्ययन से पता चलता है कि ग्रहों पर कितनी तेजी से परिस्थितियां बदल सकती हैं
धन की बर्बादी नहीं : एक बड़ा तबका मानता है कि स्पेस मिशन्स धन की बर्बादी है, लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि सरकार जो धन आवंटित करती है, उससे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का वेतन दिया जाता है। वे अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरे ग्रहों पर जाते हैं।
नई तकनीक : अंतरिक्ष अभियानों के तहत दुनिया भर के जानकार लोग साथ काम कर रहे हैं। इस तरह इनसानों से जुड़ी सामान्य समस्याओं पर किए गए शोध बहुत कामयाब रहे हैं। हेल्दी बेबी फूड से लेकर कैंसर का पता लगाने की नई तकनीक और दूर जा रही गोल्फ की बॉल पर नजर रखने तक की तकनीक का संबंध स्पेस टेक्नोलॉजी से है।
एकता का संदेश : दुनियाभर के अंतरिक्ष अभियानों से यह संदेश मिलता है कि मानव जाति की बेहतरी के लिए सभी को मिलकर कार्य करना चाहिए। आज विभिन्न देशों के अंतरिक्ष वैज्ञानिक साथ काम करते हैं, अपनी उपलब्धियों को एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं।
एक पहलू यह भी
भारत : हमारा उद्देश्य जीवन की तलाश अमेरिका का अंतरिक्ष यान मावेन मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश कर चुका है। इसका मुख्य उद्देश्य लाल ग्रह के ऊपरी पर्यावरण, आयनमंडल, सूर्य और वहां से आ रही गर्म हवाओं के संबंध का पता लगाना है। वहीं भारतीय यान लाल ग्रह पर मिथेन की मौजूदगी का पता भी लगाएगा। इसरो स्पेस एप्लिकेशन सेंटर के सहायक निदेशक एएस किरण कुमार के मुताबिक, यदि मंगल ग्रह पर मिथेन की मौजूदगी के प्रमाण मिलते हैं तो वहां जीवन की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। मंगलवाय पर जो मिथेन सेंसर लगा है जो किरण कुमार ने ही बनाया है। इस तरह वहां बस्तियां बसाने का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा।
अमेरिका : दुनिया पर राज करने की मंशा अमेरिका ने हाल में कुछ ऐसे प्रयोग किए हैं, जिन्हें भविष्य के अंतरिक्ष हथियार के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिकी वायुसेना के एक्स-37बी रोबोटिक स्पेस प्लेन के परीक्षण और डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी के प्रोटोटाइप एचटीवी-3 ग्लाइडर के असफल परीक्षण को इसी श्रेणी में रखा जा रहा है। अमेरिका ने उपग्रहों को नष्ट करने वाली मिसाइलों का भी परीक्षण किया है। इस तरह कुछ देश अमेरिका के स्पेस प्रोग्राम को शक की निगाहों से देखते हैं। उनका कहना है कि अमेरिका दुनिया पर राज करना चाहता है।
चीन : सब्जियों के बहाने चांद पर मिसाइल बेस! चीन ने दावा किया था कि वह अंतरिक्ष में सब्जियां उगाएगा। हालांकि डेली मेल में छपी एक खबर के मुताबिक, वह चंद्रमा पर मिसाइल बेस बनाने की कोशिश कर रहा है। चीन के लुनार एक्सप्लोरेशन सेंटर के एक विशेषज्ञ के मुताबिक, इस तरह धरती के किसी भी कौन में हमला किया जा सकेगा। चीन की इस कवायद को स्टार वार्स फिल्म के डेथ स्टार से जोड़कर देखा जा रहा है।

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