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गदहा जी कहिन (व्यंग)

सत्यम वद:
सत्यम वद:
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हाय रे ये बैरी मन ना जाने क्या क्या विचार देते रहता है , अब देखिये ना कल मेरे मन में एक विचार आया की क्यूँ ना किसी का साक्षात्कार लिया जाये …. एक सुबह जो घर से निकला तो शाम होने को आई, लेकिन कोई ऐसा नहीं मिला जो मुझे साक्षात्कार देने को तैयार हो | अचानक मेरा ध्यान सड़क की दूसरी तरफ आराम फरमा रहे गदहा जी पर गया | मेरे अन्दर से आवाज़ आई की क्यूँ ना आज गदहा जी का ही साक्षात्कार लिया जाये? आखिर एक गदहे का साक्षात्कार एक गदहा ही ले सकता है , इस विचार से ओत-प्रोत मन ही मन अपनी ही प्रशंसा करता हुआ गदगद हो गदहा जी के पास पहुंचा |

 

 

धुल धूसरित गदहा जी आराम फरमाने के मूड में थे ,अत: उन्होंने मेरी तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया | लेकिन मैं भी donkey_head_fsठहरा एक पत्रकार, गदहा जी को साष्टांग प्रणाम किया (आगे से ही , क्यूंकि पीछे से साष्टांग करना…. कहा जाता है की इनकी दुलत्ती मे इन्द्र के वज्र का सा प्रहार देखा जा सकता है..अब ..आप समझ ही सकते है.) और अपने आने का प्रयोजन बताया | गदहा जी बहुत खुश हुए .. अपने चार बड़े बड़े दांत दिखा कर उन्होंने मेरा स्वागत किया और मेरे प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार हो गये | आईये.. गदहा जी से मेरे लिए गये साक्षात्कार से आप भी रु -ब- रु होकर मुझे अनुगृहित करे | हाँ एक बात और…. इस साक्षात्कार के दौरान गदहा जी कई बार अत्यधिक उत्साह में ढेचु ढेचु भी करने लगते थे, अत: उनकी इन बातों को मैंने साक्षात्कार में शामिल नहीं किया है |

 

 

मैं -: गधा जी, सबसे पहले आपका परिचय क्या है ?
गदहा जी -: बन्धु, मेरा नाम गधा है , और मैं दुनिया के हर भाग में पाया जाता हूँ और आजकल मेरी पहुँच बहुत बड़े बड़े जगहों पर है |

 

 

मैं -: जी, बड़े बड़े जगहों पर पहुँच , मतलब ?
गदहा जी – : मतलब की आप मेरे गुण को संसद से लेके बाबा तक में और 5 स्टार होटल से लेकर ढाबा तक में देख सकते हैं |

 

 

मैं -: जी जी, पर क्या….. जरा आप विस्तार से इन बातो पर रौशनी डालेंगे ?
गदहा जी -: हाँ हाँ क्यूँ नहीं…देखिये, आप ने संसद का कार्यक्रम देखा होगा , मैं वहां रहता हूँ और जब कोई मसला मुझे समझ में नहीं आता है , तब मैं जोर जोर से ढेचु ढेचु करने लगता हूँ | बुरा हो उन नासपीटे मार्शलों का… हमें उठा कर ले जाते हैं और …. | अब क्या हमारी बात सुनने लायक नहीं होती है ?

 

 

मैं-: नहीं नहीं गधा जी ऐसे बात नहीं है , आप तो कमाल का बोलते हैं ..अब क्या करे सुनने वाले आपको समझ ही नहीं पाते… तो इसमें आप का क्या दोष | अच्छा ये बताये की बाबा का क्या चक्कर है ?
 गदहा जी (ख़ुशी में अपने चार दांत फिर से दिखाते हैं ) -: ही ही ही ही .. अरे कुछ नहीं मेरे भाई, आज कल तो कुछ लोग बेवजह मेरे पीछे पड़े हुए रहते हैं | आये दिन मुझ जैसे धार्मिक मन को सेक्स स्कैंडल में फंसा देते है

 

 

मैं-: अच्छा , तो आप सेक्स स्कैंडल में भी अपना स्थान रखते हैं?
गदहा जी -: अपना स्थान ? अरे भाई बिना हमारे सेक्स स्कैंडल हो ही नहीं सकता | देखो क्या है, की आज कल हम बाबाओं के रूप में भी पाए जाते है, अब अगर हमारी सेविका हमारी सेवा करती है तो इसमें बुरा क्या है ? अगर वो सेविका चलचित्र की नायिका हो तो इसमें मेरी क्या गलती है ….?? आखिर वो हमारी सेवा करती हैं ..तो इसका फल भी तो हम उन्हें देते हैं ..है की नहीं बोलो ?

 

 

मैं-: जी जी …सही कहा आपने ..अच्छा और आपने कहाँ कहाँ अपना प्रभाव छोड़ा है ?
गदहा जी -: देखो …रह रह कर मैं मुंबई में बड़ा प्रभावी हो जाता हूँ …..जब भी मेरा दिमाग सनकता है ..मैं मुंबई हमारी है का नारा देने लगता हूँ और जमकर उत्तर भारतियों पर दुलत्ती चलाता हूँ | और हाँ….आजकल मैंने महंगाई भी खूब बढ़ा दिया है ?

 

 

मैं-: जी…वो क्यूँ?
गदहा जी-: अरे बात समझो… आज हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या तो जनसँख्या विस्फोट ही है | मैंने महंगाई इसलिए बढ़ा दिया की इसके चपेट में आकर बहुत से लोग भूख से मर जायेंगे …और हमारे देश की आबादी काफी कम हो जाएगी ….है ना बढ़िया आईडिया ..ही ही ही ही ??

 

 

मैं-: हूँ ………..और कहाँ कहाँ आप अपना झंडा गाड़ रहे हैं ?
गदहा जी -: वैसे तो मैं अभी कई जगहों पर सक्रिय हूँ ..जैसे खेल में हाकी में मैं बहुत दिलचस्पी लेता हूँ …..वहां तुम मेरा प्रभाव देख सकते हो |

 

 

मैं -: और बिहार के बारे में आपके क्या विचार हैं ?
गदहा जी -: अरे भाई..क्यूँ मेरे दुखते रग पर हाथ रख देते हो …वहां तो मैं पंद्रह साल तक प्रभाव में रहा, मगर आज कल मुझे वहां कोई पूछता ही नहीं ? अब बताओ भला कही ऐसा भी होता है |

 

 

मैं-: सचमुच बड़ी दुःख की बात है | एक बात पर और प्रकाश डाले की आप जब से धरती पर आये है , तब से आपके ऊपर काफी मुहावरे बने है जैसे …खेत खायें गदहा, बांधें जायें कूकुर! अल्लाह मेंहरबान गदहा पहलवान ! गलती करे जोलहा मार खाए गदहा ! गदहा ना घर का ना घाट का ! कैसा लगता है आपको ? सुना है पहले आपके सर पर एक जोड़ा सींग भी हुआ करता था ?
गदहा जी -: बहुत अच्छा | ही ही ही ही (ख़ुशी में अपने चार दांत फिर से दिखाते हैं )| अरे भाई जब हमारे सर सींग होता था तब हम और भी बड़े बड़े कारनामे करते थे

 

 

मैं -: चलते चलते एक प्रश्न और मेरे दिमाग में आ रहा है… की आप तो स्वर्ग के प्राणी थे फिर धरती पर कैसे आना हुआ ?

गदहा जी -: अरे भाई क्या बताये….. मैं तो स्वर्ग में बड़ा मस्त था , मगर क्या करू एक बार वहां के मेरे मालिक ने गलती कर दी | उनकी नजरे इधर उधर की गतिविधियों पर गयी और सजा के तौर पर उनके साथ मेरा भी धरती पर आगमन हुआ |

 

 

मैं -: अच्छा गदहा जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने अपने बेहद कीमती समय में से समय निकाल कर मुझे सम्मान दिया |

गदहा जी- : आपको भी धन्यवाद ही ही ही ही (ख़ुशी में आखरी बार अपने चार दांत फिर से दिखाते हैं ) |

 

 

इस तरह से गदहा जी से साक्षात्कार समाप्त कर , मैं अपने घर की ओर चल पड़ा | रास्ते में एक ख्याल जो बार बार मेरे मन में आ रहा था की…. ज्ञानी सों ज्ञानी मिलें, होंय ज्ञान की बात । मूरख से मूरख मिलें चलिहें घूंसा लात | दो मूरख तो मिले मगर बिना घूंसा लात के ही सारी बात हो गयी | अब ये ज्ञान की बात थी या फिर ……चलिए ये फैसला आप ही करे

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