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दामिनी का जवाब

यायावर
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घने -अँधेरे जंगल से गुजरते हुए
भला कौन है जो, सहम नहीं जाता?
खूंखार भेडिये , शेर, चीते ……उफ़ !
सोच के भी रोम खड़े हो जाते हैं
घने -अँधेरे जंगल से गुजरते हुए
भला कौन है जो, सहम नहीं जाता?
खूंखार भेडिये , शेर, चीते ……उफ़ !
सोच के भी रोम खड़े हो जाते हैं
इनका सामना हो जाये तो
बेचारा इन्सान क्या करेगा?
फिर इनसे बचा तो जहरीले
सांप, बिच्छू, कनखजूरे, छिपकलियाँ
स्पर्श मात्र से इन्सान का शरीर
नीला पड़ जाये।
इतना ही नहीं, कंकरीला-पथरीला
दुर्गम रास्ता
अगल-बगल कांटे-झाड़ियाँ
बहरहाल, मुसीबतें कितनी भी बड़ी हों
आखिर ख़त्म तो होती ही हैं
जंगल कितना भी दुर्गम हो
खतरनाक हो
सफ़र जारी रहे तो आखिर में
इन्सान उसे पार कर ही लेता है
और फिर मिलता है चमचमाता
राजमार्ग
सभ्यता और संस्कृति के नगर से
गुजरता हुआ
इन्सान राहत की सांस लेता है
खुद की तरह आदमजाद देखता है तो
सुकून की साँस लेता है।
लेकिन …………….
उस रात, सभ्यता-संस्कृति की
राजधानी दिल्ली में
चौड़े चमचमाते राजमार्ग पर
तेज गति से सरपट दौड़ती
बस के अन्दर काले शीशों के पीछे
इसी समाज के सदस्यों ने
‘पौरुष’ का जैसा परिचय दिया
क्या ऐसा किसी खतरनाक से
खतरनाक जंगल में
खूंखार से खूंखार पशु द्वारा मुमकिन है?
अगर इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए
‘वो’ हमारे बीच होती कि ‘वो’
‘सुरक्षित कहाँ महसूस करती है?’
‘सभ्य-सुसंस्कृत, आधुनिक,
जीवों में श्रेष्ठतम मनुष्य के समाज में?’ या
‘जंगल’ में?
तो इस प्रश्न का आखिर,
दामिनी क्या जवाब देती?

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