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कोरोना महामारी मज़दूरों पर भारी

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“कोरोना वायरस” एक विश्वव्यापी महामारी जिससे पूरा विश्व लड़ रहा हैं| भारत कोरोना से जंग के लिए तालाबंदी का प्रयोग कर रहा हैं| भले ही लॉकडाउन में धीरे धीरे कुछ ढील दी गई हो लेकिन गरीब व मजदूर के जीवन में कुछ नहीं बदला हैं|

 

 

 

ये बात साफ है कि पूरा विश्व कोरोना से जंग लड़ रहा हैं और भारत भी इस जंग में शामिल हैं| लेकिन भारत में मज़दूर वर्ग के हितों के लिए काम करना भी एक चुनौती बन गया हैं| देश भर से मज़दूरों के पलायन की ऐसी ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं जिसे देख किसी का भी दिल दुखी हो जाए| इन मज़दूरों के संघर्ष को देखकर एक सवाल उठता है कि भारत की कोरोना से जंग बड़ी है या इन मज़दूरों की अपनी भूख-प्यास से लड़ी जा रही जंग… ! इन मज़दूरों को सड़कों पर पैदल चलता देख यही लगता हैं कि मानो इंसान की शक्ल में सड़कों पर भूख-प्यास व बेबसी दौड़ी जा रही हैं फिर भी इनका लक्ष्य भूख-प्यास मिटाने से कई बढ़कर किसी भी तरह अपने घर पहुँचना हैं| मनुष्य का स्वभाव ही हैं मुसीबत में घर की याद आना और आए भी क्यों न? अब शहरों में इन्हें भूख-प्यास के अलावा मिल ही क्या रहा हैं??

 

 

 

इन मज़दूरों से सवाल हो तो जबाब यहीं हैं कि “जनाब खाने को नहीं, मकान मालिक पैसे माँग रहा हैं” ये सुनकर सरकार के फैसलों पर सवाल उठना जायज़ हैं “कोई भूखा नहीं सोएगा, कोई भी मकानमालिक किरायेदारों से किराया नहीं माँगेगा”…. | कुछ भी हो मजबूर तो मज़दूर ही हैं| लेकिन इतना मजबूर नहीं की वो लड़ न सकें| कोरोना से कहीं आगे मज़दूरों की जंग हैं वो लड़ रहा हैं भूख से, प्यास से, बेबसी से… | जब कुछ न दिखा तो मज़दूर निकल दिए सैकड़ों किलोमीटर लंबी सड़कों को अपने पैरों से नापने… इन्हें भरोसा हैं सड़कों से कई ज्यादा इनके हौसलें बड़े हैं| हो भी क्यों न? ये मज़दूर हैं… ! मज़दूर का राष्ट्र निर्माण में सबसे अधिक योगदान होता हैं|

 

 

 

लेकिन आज देश में मज़दूरों के पलायन की जो तस्वीरें दिख रही हैं वे अत्याधिक मार्मिक हैं| “मज़दूरों के सर पर रखा बोझा, महिलाएँ और उनकी गोंद में छोटे छोटे बच्चें, व चिलचिलाती धूप में सैंकड़ों किलोमीटर लंबी सड़कों को नाप देने की होड़” यहीं दुखद दृश्य हैं मज़दूरों के पलायन के… | और इससे भी दुखद हैं मज़दूरों के साथ हुए हादसें महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश जगह कोई भी हो लेकिन ये दुर्घटनाएँ दिल दहला देने वाली हैं|

 

 

 

मज़दूरों की मदद..? ये एक ऐसा सवाल हैं जिसका जबाब इनकी समस्याओं के समाधान जितना कठिन हैं…! आज देश की जो स्थिति हैं वह बहुत ही चिंतनीय हैं और उससे भी ज्यादा चिंतनीय हैं मज़दूरों को हो रही समस्याएँ| और अभी पलायन रोक पाना भी बहुत मुश्किल हैं| लेकिन इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह केंद्र सरकार पर छोड़ना कहाँ तक उचित हैं? ये एक बड़ी समस्या हैं और इसके लिए राज्य सरकारों को भी मिलकर काम करना होगा तभी मज़दूरों के हितों में काम हो सकतें हैं| वैसे तो सरकार इनके हितों के लिए बहुत से काम कर रही हैं लेकिन ये सुनने को मिलता हैं देखने को नहीं..! अर्थात कागजी व जमीनी स्तर पर कारवाई में जमीन व आसमान का अंतर हैं| अब सरकार को इस ओर ध्यान देना आवश्यक हैं की जल्द से जल्द जमीनी स्तर पर मज़दूरों के लिए काम हो व इनकी समस्याओं का समाधान हो|

 

 

 

नोट : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं।

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