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अब की गेहूं मा रोइ दिहिन।

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कुलि हमसे विधाता छीन लिहिन, अबकी गेहूं मा रोइ दिहिन।

ई जाने कवन बयार चली, एकै झोंका मां खतम कीन
गेहूं मा फूल लगा जइसे, जइसे वहिमा बाली आइल
करिया करिया करिया होइगै, दुख कै बदरा जब मडराइल
बिजुरी चमकी गरजा बदरा, आंखी कै सब बहिगै कजरा।
अंसुवन कै धार रुकै नाही, दइवो नाही जानी मजरा
बरखा रिमझिम रिमझिम भा शुरू, अउ हवा पुरबिया डोलि गइल।
जउन फसल खड़ी रही हिम्मत से, आंधी पानी पा लोटि गइल
ई दशा देखि सब चकरावा, मन ही मन भा खुब पछतावा
फसल देखि अइसन लागे, की गइल हो जइसे लतियावा
हे इन्द्र देव तनी ध्यान करी, ई चइत महीना दिहा तरी।
कइला अइसन तू हे भगवन कि पेट पीठ दूनौ ही जरी
कुछ बचा जवन वै पानी से, जरिगा खम्भा के आगी से।
पी के अखियन के आंसू का, हम दूर भा रोटी सागी से
भूखी से रोवैला लइका, भाई रोटी कहिकै छोटका।
हमरौ मनवा मा कष्ट भइल, जब फांसी पे कलुआ लटका
तावा केहू कै जरै नहीं, देखें का रोटी मिलै नहीं
सूखल जाता सबके शरीर, चेहरा केहू कै खिलै नहीं।
सरकारी पिट्ठू आवैले, कागज पे कलम चलावैले
एक बिगहा सत्यानाश भइल, सौ रुपिया कै चेक देखावैले।
सरकारी नौकर कोसैले, कुतवा अस हमका नोचैले
छः छः लइका कै बात करै, तिरिया दिलवा मां कोचैले।
हम हाय विधाता करी काव, कुछ समझ मां नाही आवत बा
खेती ता अपने राह गइल ,सरकारौ आंख देखावत बा
हम कइसै सम्हारी किसानी का, अखियां से बहै वाले पानी का
एहसास करावा से भगवन!, कुर्सी वाले अभिमानी का।।
– अजय एहसास
सुलेमपुर परसावां
अम्बेडकर नगर

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