Menu
blogid : 28261 postid : 116

धृतराष्ट्र का अंधापन

AJAY AMITABH SUMAN UVACH

AJAY AMITABH SUMAN UVACH

  • 18 Posts
  • 0 Comment

 

जब अर्जुन के शिष्य सात्यकि और भूरिश्रवा के बीच युद्ध चल रहा था और युद्ध में भूरिश्रवा सात्यकि पर भारी पड़ रहा था तब अपने शिष्य सात्यकि की जान बचाने के लिए अर्जुन ने बिना कोई चेतावनी दिए अपने तीक्ष्ण बाण से भूरिश्रवा के हाथ को काट डाला। तत्पश्चात सात्यकि ने भूरिश्रवा का सर धड़ से अलग कर दिया। अगर शिष्य मोह में सात्यकि के जान बचाने हेतु भूरिश्रवा के अर्जुन द्वारा हाथ काटने और महाभारत के युद्ध के नियमों का उल्लंघन करने को पांडव अनुचित नहीं मानते तो धृतराष्ट्र द्वारा पुत्रमोह में किये गए कुकर्म अनुचित कैसे हो सकते थे ? 

महा  युद्ध  होने   से   पहले   कतिपय नियम बने पड़े थे,
हरि भीष्म ने खिंची रेखा उसमें योद्धा युद्ध लड़े थे।
एक योद्धा योद्धा से लड़ता हो प्रतिपक्ष पे गर अड़ता हो,
हस्तक्षेप वर्जित था बेशक निजपक्ष का योद्धा मरता हो।

पर स्वार्थ सिद्धि की बात चले स्व प्रज्ञा चित्त बाहिर था,
निरपराध का वध करने में पार्थ निपुण जग जाहिर था।
सव्यसाची का शिष्य सात्यकि एक योद्धा से लड़ता था,
भूरिश्रवा प्रतिपक्ष प्रहर्ता उसपे हावी पड़ता था।

भूरिश्रवा यौधेय विकट था पार्थ शिष्य शीर्ष हरने को,
दुर्भाग्य प्रतीति परिलक्षित थी पार्थ शिष्य था मरने को।
बिना चेताए उस योधक पर अर्जुन ने प्रहार किया,
युद्ध में नियमचार बचे जो उनका सर्व संहार किया।

रण के नियमों का उल्लंघन कर अर्जुन ने प्राण लिया ,
हाथ काटकर उद्भट का कैसा अनुचित दुष्काम किया।
अर्जुन से दुष्कर्म फलाकर उभयहस्त से हस्त गवांकर,
बैठ गया था भू पर रण में एक हस्त योद्धा पछताकर।

पछताता था नियमों का नाहक उसने सम्मान किया ,
पछतावा कुछ और बढ़ा जब सात्यकि ने दुष्काम किया।
जो कुछ बचा हुआ अर्जुन से वो दुष्कर्म रचाया था,
शस्त्रहीन हस्तहीन योद्धा के सर तलवार चलाया था ।

कटा सिर शूर का भू पर विस्मय में था वो पड़ा हुआ,
ये कैसा दुष्कर्म फला था धर्म पतित हो गड़ा हुआ?
शिष्य मोह में गर अर्जुन का रचा कर्म ना कलुसित था,
पुत्र मोह में धृतराष्ट्र का अंधापन कब अनुचित था?

अजय अमिताभ सुमन: सर्वाधिकार सुरक्षित

Read Comments

Post a comment

Leave a Reply