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कठोपनिषद और हमारा मस्तिष्क

darpan

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कठोपनिषद में यम ने नचिकेता को गूढ़ ज्ञान देते हुए कहा है कि मनुष्य के शरीर की तुलना एक रथ से की जा सकती है , जिसमें इन्द्रियां इसके घोडें हैं . हमारा मन इन घोड़ों की लगाम कसे रहता है और सारथी को बताता है कि इन घोड़े रूपी ज्ञानेन्द्रियों को कैसे नियंत्रित रखा जाय. हमारी आत्मा इस रथ की सारथी है, मालिक है और यह सारी दुनिया, भौतिक जगत वह सड़क मार्ग है जिस पर रथ चलता है. अगर लगाम को सख्ती और बुद्धिमतापूर्ण तरीके से न पकड़ा जाय तो ज्ञानेन्द्रियों के ये घोड़े बेकाबू होकर दिशा विहीन हो जाते हैं फलस्वरूप हमारा रथ लक्ष्य अथवा गंतव्य तक नहीं पहुँचता. कठोपनिषद के अनुसार जन्म- मृत्यु के चक्र में बारम्बार फसे रहना इसी कारण से होता है. लेकिन, अगर मनुष्य बुद्धिमान और विवेकी है तथा मन का नियंत्रण करना जानता है तब वह किसी मंजे हुए घुड़सवार की भांति चंचल इन्द्रियों को भी परम आज्ञाकारी बना लेता है.
हमारे मस्तिष्क या दिमाग की पेचीदा बनावट और कार्यप्रणाली इस तथ्य का समर्थन करती प्रतीत होती है. इस बात में किसी को संदेह नहीं कि आदमी का मस्तिष्क सभी जीवधारियों में अव्वल है और दिमाग के जीव विकासीय इतिहास में मनुष्य ने सभी जीवों को पीछे छोड़ दिया है. मोटे रूप में देखें तो आदमी के मस्तिष्क के कुछ हिस्से ऐसे हैं जो उसे विरासत में रीढ़ वाले पूर्वजों से प्राप्त हुए है. हिप्पोकैम्पस आदि से बना लिम्बिक तंत्र दिमाग का वह पुराना हिस्सा है जो खाना खाने , भावनात्मक व्यवहार , इच्छाओं , चेष्टाओं , प्रेरणाओं, जनन प्रवृत्ति राग -द्वेष आदि से सम्बंधित होता हैं. यह सभी कार्य किसी भी विकसित जीव की स्वाभाविक जंतु प्रकृति हैं , जंतु के जीवित रहने के लिए आवश्यक भी है . लेकिन मस्तिष्क का एक भाग ऐसा है जो विशेषरूप से स्तनधारियों में ही अधिक विकसित हुआ है. आदमी में तो इस नए भाग ” नियोकोर्टेक्स ” का गजब का व अप्रत्याशित विकास हुआ है. इस भाग ने ही आदमी को इंसान बनाया है.
हमारी इन्द्रियां पर्यावरण की घटनाओं से दिमाग को अवगत कराती हैं . मस्तिष्क का पुराना भाग अपनी जंतु प्रकृति के अनुसार उन पर क्रिया करना चाहता है लेकिन मनुष्य का यह खास ” नियोकार्टेक्स ” हमारी हर क्रिया को इंसानी चोला पहनाने का भरसक प्रयत्न करता है. मस्तिष्क का पुरातन भाग बड़ा ही शक्तिशाली होता है तथा किसी भी इच्छा के उपजने पर यह अपनी स्वाभाविक जंतु प्रकृति के अनुसार उस हेतु कार्य करने का खूब प्रयास करता है . इसे दबा पाना आसान नहीं होता. लेकिन यह इच्छा सही है या गलत इसका फैसला नियोकार्टेक्स में स्तिथ उच्च तंत्रिकीय केंद्र करते हैं. वह पुरजोर कोशिश करता है कि सही ही किया जाय. लेकिन आदिम लिम्बिक तंत्र के जोर और इंसानी नियोकार्टेक्स की इस जद्दोजहद में कभी आदिम तंत्र की जंतु प्रवृति जीतती है तो कभी नियोकार्टेक्स का इंसानी जज्बा .
यूँ भी कहा जा सकता है कि हमारा लिम्बिक तंत्र बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ना चाहता है और नियोकार्टेक्स उस पर लगाम लगाने का काम करता है. कठोपनिषद में यम द्वारा बताये मन से नियोकार्टेक्स की तुलना करना गलत नहीं जान पड़ता. नियोकार्टेक्स को प्रारंभ से ही संस्कार देकर उसे हमारी जंतु प्रवृतियों के नियंत्रण का प्रशिक्षण दिया जाय तो अनेक जटिल परिस्थितियों में भी इंसानियत की ही जीत होती है. यही सब हमारी शिक्षा के मूल में है जो आज कहीं विस्मृत हो गया है.

विनोद भारद्वाज

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