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वह नदी माँ है

Achyutam keshvam

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पदाघातों से शिलाएं तोड़ती है.

जो हिमालय को उदधि से जोड़ती है .

स्वयं ही स्वछन्द अपना पथ बनाती है.

और अपने आप अपने तट बनाती है.

वह नदी माँ है ,

उस अमित विक्रम नदी की धार मैं हूँ.

वह नदी जो उच्च शिखरों पर पली है .

पर धरा की प्यास पीने को चली है .

जो भगीरथ यत्न को देती सदा वर है

कल्यानमय शिव की जटाओं में किये घर है .

वह नदी माँ है ,

उस अमित बोधा नदी की धार मैं हूँ.

वह नदी मृदु सिन्धु निज उर में समेटे .

जो अटल आशीष दे विधिलेख मैटे.

है उसी का ऋण कभी जो चुक नहीं सकता .

वह दुखी होगी अगर सुख रुक नहीं सकता.

वह नदी माँ है,

उस अमित प्रेमिल नदी की धार मैं हूँ.

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