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मातु करुणा हस्त निज इस भाल पर धर दो

Achyutam keshvam

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माँ मुझे निस्सीमता दो
नील नभ कर दो
काल दिशि निरपेक्ष चिंतन
हो यही वर दो


वैष्णवी विश्वास अक्षय
ही रहें मति दो
पग न हारें पंथ भर ये
वह अजय गति दो
उर्ध्वरेता कर मनस को
ज्योति से भर दो


तोड़ दो सब अर्ग्लायें
छिन्न हों बंधन
हों सुवासित भाव उर के
शब्द हों चन्दन
स्रष्टि के स्र्ष्टित्व तक
संजीव निर्झर हो


अनुभवित कर लें तुम्हारी
हम कृपामयता
हो अमिट प्रतिकूलता में
भी सदाशयता
मातु करुणा हस्त निज
इस भाल पर धर दो

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