Menu
blogid : 9493 postid : 174

घर के जोगी जोग न बाहर के जोगी सिद्ध ( बिहार -दिवस के सन्दर्भ में )

kavita
kavita
  • 66 Posts
  • 1620 Comments

कभी-कभी सोचता हूँ -अन्य विषयों पर तो काफी कुछ लिखा और पढ़ा , अब थोड़ा अपनी मिट्टी का क़र्ज़ भी उतार लूँ ! ऐसी बात नहीं कि कुछ लिखा ही नहीं ,कवितायेँ – गीत-ग़ज़ल व काव्य की अन्य अभिव्यक्ति के माध्यम जैसे -कुण्डलिया-घनाक्षरी और दोहों के माध्यम से छिटपुट छींटाकसी , हास्य-व्यंग्य तथा वर्तमान के यथार्थ को जन-मानस के समक्ष रखा पर मन में कहीं न कहीं कुछ कमी और असंतोष बने रहे ! सोचता हूँ आज इस आलेख के माध्यम से मन की भड़ास निकाल ही लूँ ! खासकर जिस मिट्टी में लोटपोटकर पला -बढ़ा और बड़ा हुआ ,जिसकी आंचलिकता की सोंधी-सोंधी गंधों में तराबोर होता रहा , जहां की विविध वर्णी छटाओं और जीवन के रंगों में घुलमिलकर अपने रंगों में लोगों को रँगना चाहा उसके विषय में कुछ कहने या लिखने वक्त नितांत वैयक्तिक हो जाता हूँ ! ऐसी स्थिति में क्या कहूं और क्या लिखूं ? किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ ! पर आज जब लिखने का मन हो ही गया है तो कुछ न कुछ बात बनेगी ही और वह दूर तक जाएगी !
वस्तुतः बात अस्मिता ,गौरव – गरिमा , पहचान और मान-पतिष्ठा की नहीं यह सब तो भूख-भय -त्रास पीड़ा और पेट की भाषा से ऊपर की चीजें हैं | जब तक देश-राज्य और समाज में विषमता के अंग – भूख-भय-त्रास -पक्षपात और पीड़ाएँ बनी रहेंगी ऊपर की बाते बेअर्थ और बेमानी सी प्रतीत होंगी ! आज हम जाति-धर्म -गोत्र- सम्प्रदायों और समुद्दायों में बंटे हैं ! एक जाति के लोग भी एक नहीं हैं| यहाँ तक कि जातियां पुराणों की तरह उप और औप्य में बंटती और बांटती चली जा रही हैं | आये दिन राजनैतिक पार्टियों की रैलियाँ इनमे नित नए रंग भरने में लगीं हैं | घर टूटा , लोग टूटे , समाज टूटा , देश बंटा , राज्य बंटे | टूटते-टूटते , बँटते और बाँटते लोग नप रहे हैं , कुछ नप गए और अभी भी टूटने-बँटने ,नपने-नापने का क्रम जारी है , जारी रहेगा ! यही आप की , हमारी और देश तथा समाज की नियति बन चुकी है |
हाँ ,- तो मैं मिट्टी के क़र्ज़ की बात कर रहा था -हम जिस राज्य में रहते हैं वह देश और -दुनिया में विहार ( बिहार ) के नाम से ख्यात है |इसने देश ही को नहीं वरन हर क्षेत्र में पूरी दुनिया को दिशा और रौशनी दी है जिसकी चर्चा यहाँ प्रासंगिक नहीं !यहाँ के लोगों में अदम्य साहस-धैर्य-पराक्रम और कर्म के प्रति निष्ठां कूट-कूट कर भरी है ! ज्ञान और विज्ञानं तो इसकी प्रकृति में है | निजता का त्याग और परता का वरण तो कोई इनसे सीखे | अतिथि -धर्म के पालन में तो अद्वितीय !
“अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम , उदारचरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम ” की चेतना तो इसकी रग-रग को सुवासित कर पल-पल रोमांचित और पुलकित करती रहती है | कोई थोड़ा पोंछ और पुचकार दे तो ये अपनी जान तक न्यौछावर करने से बाज नहीं आते ! किसी को इसके आँगन में किसी की आव-भगत या हो रहे स्वागत का दृश्य देखना हो तो सीधे यहाँ ( बिहार ) आ जाएं ! विश्वाश करें आप अभिभूत हो जायेंगे |हाँ, अगर कुछ नहीं आता है तो वह है – अपनों का सम्मान करना क्यों कि अपनों के सम्मान से इन्हें स्वयं के सम्मान पर ख़तरा होने की आशंका मन को सताने लगती है , तो भला ऐसा कोई क्यों करेगा ? संशय में जीना बड़ा ही कठिन और दुसह होता है ! जहां तक ऐसी प्रवृत्ति या अवधारणा का प्रश्न उठता है तो उसके लिए वह व्यक्ति दोषी नहीं है ,दोषी तो वह स्वार्थ साधना है जो ऐसा करने के लिए उसे प्रेरित करती है | अपने तो अपने हैं हीं उन्हें क्या सम्मान देना ?अगर उन्हें सम्मान देंगे तो उनकी सिद्धि और प्रसिद्धि बढ़ेगी और वे ही बाहर में भी प्रतिष्ठा -सम्मान और पुरस्कारों के हकदार हो जायेंगे , फिर उनका क्या होगा जो पुरस्कार और सम्मान बांटने वाले पद पर बैठे हैं ?अतः वह बाहरी ऐसे लोगों को तलाशता है जो वहां पर बांटे जा रहे सम्मान और पुरस्कार प्रदान करनेवाले पद पर बैठे हों |यहाँ के लोगों को पहले बाहर में सिद्धि-प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा की जगह अपनी लेखिनी के बल पर बनानी होती है तब जाकर यहाँ थोड़ी-बहुत पूछ होती है | यहाँ के पत्र-पत्रिकावाले आप को तभी पूछेंगे जब बाहर के पत्र-पत्रिकावाले आप को छाप रहे होते हैं | ये सारी शर्तें सिर्फ प्रतिभासंपन्न साधकों के लिए ही हैं |प्रतिभाविहीनों के यहाँ तो पौ वारह हैं | यहाँ के राज्य-गीत व राज्य-प्रार्थना उपर्युक्त स्थिति के दो नमूनें हैं | इसको लेकर माननीय पटना उच्च न्यायालय में केस भी चल रहा है | यहाँ के सर्वोच्च सम्मान अबतक अधिकतर बाहरी रचनाकारों को ही प्राप्त हुआ है, यह अपने आप में अद्वितीय और उदारवादी प्रवृत्ति का द्योतक है पर इसके पीछे की जो अवधारणा है वह घातक और निकृष्ट है ! यहाँ तो चयन समिति के सदस्य ही अपने मूल नामों को पुरस्कारार्थ नामित कर देते हैं या फिर अपने दूरस्थ सम्बन्धियों को अनुगृहीत करते हैं |विगत दो वर्ष पूर्व एक नामचीन आलोचक जो चयन समिति के प्रमुख थे, वे अपने ही छोटे भाई को सर्वोच्च पुरस्कार के लिए नामित कर बैठे | हल्ला-गुल्ला होने पर माननीय मुख्यमंत्री जी के निर्देशानुसार उस वर्ष के सारे पुरस्कारों को निरस्त कर दिया गया सो अबतक तथावत है | निःसंदेह माननीय मुख्यमंत्री नीतीश जी एक कर्मनिष्ठ व ईमानदार व्यक्ति हैं पर उन्हें अपने चारों ओर बिछी बेईमानी और पक्षपात की बिसात को गहराई से समझना होगा | आज बिहारी कलाकारों में नाराजगी है क्यों कि इस वर्ष के बिहार – दिवस के अवसर पर आयोजित समारोहों में वे स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं | इस मौके पर आयोजित कवि -सम्मेलनों व मुशायरे में अधिकतर आमंत्रित लोग बाहर के हैं जबकि कुछ लोग यहाँ के भी हैं जो मनन-चयन के जोड़-तोड़ की चक्करघिन्नी को फानकर पहुंचे हैं | राज्य के बाहर के चर्चित-प्रतिष्ठित और श्रेष्ठ रचनाकारों व साहित्यसाधकों में मेरी पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा है , कुछ तो मेरे आदर्श भी हैं पर यहाँ की परिस्थितियों पर विहंगम दृष्टिपात के उपरान्त मुहावरे के तौर पर प्रचलित निम्न काव्यात्मक कथन “घर के जोगी जोग न बाहर के जोगी सिद्ध ” | शत-प्रतिशत प्रासंगिक लगता है |

Read Comments

Post a comment

Leave a Reply