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आत्महत्या की घटनाएं चिंताजनक

अभिनव त्रिपाठी

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अभिनव त्रिपाठी

 

इनदिनों आत्महत्याओं की श्रृंखला लगातार बढती जा रही है। गौरतलब बात ये है कि संख्या उनकी अधिक है जो किसी एक बड़े पद और समाज से ताल्लुकात रखतें हैं। लगातार इस प्रकार की घटनाओं का सामने आना कहीं न कहीं समाज के भीतर कुछ हद तक नकारात्मकता भरने के उत्तरदायी है।

 

 

एकांतवाश के इस परिवेश में देश और दुनियां की जनसँख्या में इजाफा तो निरंतर होता चला जा रहा है लेकिन विचार करें तो व्यक्ति एक सीमित जीवनशैली और सीमित संगत के साथ अपने कार्यकाल का निर्वहन कर रहा है। एक तरफ तकनीकी की इस दुनिया नें हजारों लोगों को मात्र ऊँगली भर की दुरी पर लाकर खड़ा कर दिया है तो वहीँ दुसरी ओर वास्तविक दोस्त मित्र,रिश्तेदारों से सबकी इतनी दुरी बना कर रख दी है कि चाहते हुए भी नजदीकियां लाना जल्दी संभव नहीं है।

 

 

नए दौर में पुरानी परम्पराओं का लोप होता चला जा रहा है,जो इस प्रकार की घटनाओं को बढ़ावा देने वाली मूल कारणों में शामिल है। शहरीकरण नें आम जन को जितना भौतिक सुख संसाधन से परिचित कराया है ठीक उसी रफ़्तार से अपनों से,मित्रों से,समाज से दूर होने में विवश कर के रख दिया है।

 

 

आज का परिवेश ग्लैमर से युक्त है हर युवा इसी के तरफ अग्रसर है,जल्दी की चाह में गलत निर्णय व्यक्ति के ऊपर हावी हो जाता है और बिना किसी प्रकार के विचार मन में लाये और बिना कुछ सोचे समझे स्वयं को मृत्यु की आगोश में झोक देता है। युग बदल चुका है पहले कठिन समय में हौसला देने के लिए परिवार के बुजुर्ग सदस्य हुआ करते थे, एकल परिवार होने के बाद से अनेक पारिवारिक सदस्यों के स्थान अब घर हैं नहीं।

 

 

परिणामस्वरुप इन दिनों की घटना सामने आ रहीं हैं। आधुनिक दिनचर्या में भौतिकता, साज सज्जा नें एक तरफ तो वाह्य तौर से समाज के हर व्यक्ति को मजबूत और प्रतिष्ठित बना दिया, लेकिन अपनत्व की कमी, एकांतवास का जीवन ने आतंरिक तौर पर बहुत कमजोर कर के रख दिया है। यही कारण है थोडा सा ही दबाव बनने के बाद व्यक्ति ये भूल जाता है कि उसके एक निर्णय से आगे और पीछे जुड़े लोगों के ऊपर क्या गुजरेगी?

 

 

एक प्रकार से देखें तो आत्महत्या केवल एक घटना मात्र नहीं रह गयी है। अब इसने एक बीमारी का रूप ले रखा है। जिसका केवल एक इलाज है अपनों का साथ। इन दिनों बड़े बड़े कलाकार, अधिकारी, उद्योग से सम्बंधित लोग अवसाद के बीच फंस जा रहें हैं और इस प्रकार के निर्णय ले ले रहें है, जिससे सामान्य जनमानस पर बुरा प्रकोप पड़ रहा है। अब इससे लड़ने की बारी है और इसे हराना ही होगा।

 

 

डिस्क्लेमर : उपरोक्त विचारों के लिए लेखक स्वयं उत्तरदायी हैं। जागरण जंक्शन किसी दावे या आंकड़े की पुष्टि नहीं करता है।

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