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सामाजिक-आर्थिक वृध्दि दर पर एक नया थ्योरी

VISION FOR ALL

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मैंने सामाजिक-आर्थिक वृध्दि दर पर एक नया थ्योरी दिया है जिसमेँ आर्थिक वृध्दि दर को उपयोगिता/अनुपयोगिता के आधार पर -1 से 1 के बीच मापने के लिए कहा गया है।गरीबी,बेरोजगारी,अशिक्षा,कुपोषण, भुखमरी,महंगाई,मंदी,जातिवाद,सांप्रदायिकता,भ्रष्टाचार,अपराध आदि का मूल्यांकन 0 से -1 के बीच होगा और इस आधार पर होगा कि ये तत्त्व सामाजिक-आर्थिक विकास में कितना प्रतिशत बाधक/अनुपयोगी है।वहीँ,आधारिक संरचना ,रोजगार,आय,उत्पादन,तकनीकी,शिक्षा के स्तर आदि में वृध्दि का मूल्यांकन 0 से 1 के बीच होगा और इस आधार पर होगा कि इन तत्त्वोँ का सामाजिक-आर्थिक विकास में कितनी उपयोगिता और वर्तमान भूमिका है।फिर इन सभी को जोड़कर(सकारात्मक और नकारात्मक मूल्यांकन दोनोँ को जोड़कर) औसत निकाला जाएगा और जो औसत आएगी वही सामाजिक-आर्थिक वृध्दि दर होगी।
वर्तमान में दुनियाभर की सरकारेँ जिस आर्थिक वृध्दि दर के आधार पर खुद का मूल्यांकन करती है,वह सिर्फ अमीरोँ का वृध्दि दर है क्योँकि अभी वस्तु और सेवा के उत्पादन में जो वृध्दि या कमी होती है,उसका सीधा संबंध अमीरोँ के आय का स्तर से है।सरकार मौजूदा आर्थिक वृध्दि दर के आधार पर विकास को मापकर गरीबोँ का मजाक उड़ाती है।
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लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा दिल्ली में सरकार बना लेगी।अभी दिल्ली मेँ राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की गई है।भाजपा के पास पहले से ही 32 विधायक है,एक निर्दलीय भाजपा का समर्थन कर देगा,आम आदमी पार्टी का तीन-चार विधायक को भाजपा कैसे भी पकड़ कर 36 का आकड़ा पूरा कर लेगी।भाजपा ने इस स्थिति को ‘स्वाभाविक गठबंधन’ का नाम दिया है लेकिन ये ‘धोखाधड़ी गठबंधन’ होगा क्योंकि आम आदमी पार्टी का तीन-चार विधायक अपने ही पार्टी से धोखाधड़ी कर भाजपा में मिल जाएँगे।लोग मोदी के पीछे क्यों परेशान है?मोदी के पीछे परेशान होना लोगोँ की बेवकूफी है।मोदी जब उतना ही सही है तो दिल्ली में भाजपा ने जनलोकपाल विधेयक का समर्थन क्योँ नहीं किया?गुजरात में मोदी ने लोकायुक्त को अपने अधीन क्योँ रखा है?प्रदीप शर्मा,संजीव भट्ट जैसे अफसरोँ को मोदी के खिलाफ बोलने के बाद निलंबित करके उनपर फर्जी मुकदमा क्योँ कर दिया गया?चाय पिलाकर जनता को लुभाना चुनाव में जनता को लुभाने के लिए धन का प्रयोग करना है,जो चुनाव आयोग के नियम विरुध्द है लेकिन चुनाव आयोग चुप है।
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मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी(CJM),दरभंगा ने दिनांक 12.2.2014 को बहेड़ी थाना काण्ड संख्या 426/13 में IPC का चार धाराओँ (354A,355,452 और 509) को जोड़ दिया है।इस सन्दर्भ में श्री अरविंद पांडे,पुलिस महानिरीक्षक(IG),दरभंगा प्रक्षेत्र ने दारोगा को CJM के समक्ष धारा जोड़ने के लिए आवेदन दायर करने कहा था।FIR की सूचक गायत्री देवी के कुछ रिश्तेदारों ने श्री अरविंद पांडे के कार्यालय के बाहर जल्दीबाजी में मुझसे मुलाकात किया था।मैंने पुलिस द्वारा धारा 509 और 448 नहीं लगाए जाने और धारा 325 के बदले 323 लगाए जाने का ब्यौरा एक पन्ने मेँ उन्हें लिखकर दिया था।श्री अरविंद पांडे ने धारा 509 और धारा 448 की जगह 452 लगाने का आदेश दिया।धारा 354A और 355 का साक्ष्य मौजूद रहने के कारण इन दो धाराओं को लगाने का भी आदेश दिया गया।पुलिस निरीक्षक द्वारा मामले का पर्यवेक्षण करने के बावजूद इन धाराओं को नहीँ लगाने और अभियुक्तों का गिरफ्तारी करने के बजाय CrPC का धारा 41(1) के तहत सिर्फ नोटिस तामिला करके छोड़ देने के कारण पुलिस निरीक्षक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के विरुध्द स्पष्टीकरण लेकर सूचित करने का आदेश वरीय पुलिस अधीक्षक(SSP),दरभंगा को दिया गया है। —
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क्या दिल्ली के उपराज्यपाल द्वारा विधेयक को विधानसभा में पेश होने से रोकने का कानूनी प्रावधान है?भारतीय संविधान या NCT ACT 1991 या TBR RULES 1993 में कहीं भी नहीं लिखा है कि यदि उप-राज्यपाल ने मंजूरी नहीं दिया हो तो विधेयक को पेश करने से रोक दिया जाए।NCT ACT का धारा 26 और अनुच्छेद 255 कहती है कि यदि मंजूरी लिए बगैर विधेयक को पारित कराया जाता है तो विधेयक को खारिज नहीं किया जा सकता बशर्तेँ कि पारित होने के बाद राष्ट्रपति विधेयक पर हस्ताक्षर कर दे।जब उपराज्यपाल और केन्द्र सरकार(केन्द्र सरकार से मंजूरी लेने का NCT ACT और भारतीय संविधान में कोई प्रावधान नहीं है) की मंजूरी के बगैर भी विधेयक को पारित कराकर सीधे राष्ट्रपति के पास भेजा जा सकता है,फिर उपराज्यपाल ने किस आधार पर विधेयक को पेश करने से मना किया?काँग्रेस और भाजपा के द्वारा ये कहना कि विधेयक को असंवैधानिक तरीके से पेश किया जाता इसलिए उन्होंने समर्थन नहीं किया,ये सिर्फ एक बहाना था।चूँकि ये लोग विधेयक को पारित होते नहीं देखना चाहते थे इसलिए विधेयक पर केन्द्र सरकार की मंजूरी लेने का एक चाल चला।लोगों को दिखाने का बहाना मिल गया कि विधेयक असंवैधानिक है।
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संसद में हंगामा करने वाले को बाहर क्योँ नहीं किया जाता?ज्यादा हंगामा करने पर तुरंत सदन में आने से निलंबित कर देना चाहिए।इस हंगामा के कारण कई सारी महत्वपूर्ण विधेयक पास नहीं हो पाती और वर्षोँ लंबित रह जाती है।इस मामले में सरकार,लोकसभाध्यक्ष और राज्य सभा के सभापति की भूमिका पर भी सवाल खड़ा होता है।लोकसभाध्यक्ष और राज्य सभा का सभापति हंगामे के बाद सदन को स्थगित करने के बजाय ऐसे सांसदोँ को निलंबित या सदन से बाहर क्यों नहीं करते?सरकार ने लोकसभाध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को सदन को स्थगित करने के लिए कह रखा है।विपक्षी विधेयक को पास कराने नहीं देकर सरकार को क्रेडिट लेने से रोकना चाहती है,वहीं सरकार भी विपक्षी पर सदन नहीं चलने देने का आरोप लगाकर अपनी भूमिका का इतिश्री कर लेती है क्योंकि सरकार को भी उस विधेयक को पास कराने का विशेष इरादा नहीं रहता।विधानसभा और वहाँ की राज्य सरकार और उसका विपक्षी दल का भी यही हाल है।कितनी विडंबना की बात है कि जो संसद और विधानसभा देश/राज्य भर के लिए सख्त कानून बनाती रहती है,उसी के संचालन के लिए कोई सख्त कानून नहीं है।हंगामा करने वाले को बाहर करना/निलंबित करना अनिवार्य हो।
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IPL:आधुनिक दास प्रथा

IPL और दास प्रथा में आप क्या समानता पाते हैँ?दास वो लोग होते थे जिन्हें बोलियाँ लगाकर मालिक अपना काम के लिए खरीदाता था और IPL में टीम का मालिक अपना पैसा बनाने का काम के लिए खिलाड़ियों का बोलियाँ लगाकर उसे खरीदते हैँ।जिस तरह से दास की नीलामी बोलियाँ लगाकर होती थी,वैसे ही खिलाड़ियों की नीलामी बोलियाँ लगाकर हो रही है।सुप्रीम कोर्ट पहले ये तय करे कि अनुच्छेद 23 (शोषण के विरुध्द मौलिक अधिकार) के तहत FORCED LABOUR (बंधुआ मजदूर) की परिभाषा क्या है?खिलाड़ियों का उसके इच्छा के विरुध्द मालिकों के द्वारा अपने मनमुताबिक टीम के लिए नीलामी करना भी FORCED LABOUR ही है क्योंकि खिलाड़ी मालिक की इच्छा के अनुसार बिकाने और उसके इच्छा के अनुसार खेलने के लिए बाध्य है।खिलाड़ियों का मानवीय गरिमा के साथ जीने का मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का भी हनन हो रहा है।खिलाड़ियों के पास ये तय करने का अधिकार होना चाहिए कि उसे न्यूनतम कितनी राशि चाहिए और वह किस टीम के लिए खेलना पसंद करता है।टीम के लिए खिलाड़ी का चयन Contract के आधार पर होना चाहिए ना कि नीलामी के आधार पर।जिस खिलाड़ी को अपने गरिमा का ख्याल है वह नीलाम होना बंद करे।
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धर्मग्रन्थों को कानूनी परिप्रेक्ष्य मेँ देखना चाहिए।इन धर्मग्रन्थों में महिलाओं और दलितों के साथ भयंकर भेदभाव किया गया है।ऋगवेद,अर्थववेद और मनुस्मृति में नियोग प्रथा का वर्णन किया गया है जिसमेँ एक निसंतान विधवा महिला को चार चार पुरुष के साथ नियोग कराकर 11 बच्चे तक पैदा करने की बात कही गई है लेकिन विधवा विवाह का विरोध किया गया है।विधवा के द्वारा नियोग प्रथा का विरोध किया जाने लगा,इसलिए सती कहकर पति के शव के साथ इन्हें जलाया जाने लगा।पुरुषार्थ के चार लक्षण हैँ।महिलार्थ जैसा कोई शब्द क्यों नहीं है?पैगम्बर मोहम्मद ने खुद कई महिला रिश्तेदार के साथ यौन संबंध बनाकर शादी कर लिया इसलिए इन्होँने रिश्तोदारों से और अधिकतम चार शादी करने का नियम बना दिया।इस्लाम धर्म में अभी भी महिला USE AND THROW है,इसलिए महज तीन बार तलाक कह देने से ही महिला से रिश्ता खत्म हो जाती है।…………..
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जिन्हें कानून से,मानवता से वास्ता न रहा
वो भी संविधान की रक्षा का शपथ लेते हैँ।

कभी कोर्ट में,कभी संसद में
कभी जज,कभी जनप्रतिनिधि का स्वांग रचते हैँ।
हर एक जज,जो बना है न्याय के हित मेँ
जरुरी तो नहीं कि वह बंधा हो कानून मेँ।
बस कानून के चक्कर में
हमने देखा है कि इंसाफ की ताक में
यहाँ अक्सर निर्दोष भी फंसा करते हैँI

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