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भारत या कोई देश मिश्रित अर्थव्यवस्था नहीँ है।

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भारत या कोई देश मिश्रित अर्थव्यवस्था नहीँ है।

मिश्रित अर्थव्यवस्था का मैं चार मॉडल प्रस्तुत करता हूँ।आप तुलना करके देखे कि,क्या भारत या दुनिया का कोई भी देश मिश्रित अर्थव्यवस्था कहलाने के लायक है?

1.जीविका निर्वाह और मूलभूत सुविधाओँ के न्यूनतम स्तर तक मुफ्त में सरकार के द्वारा पैसा दिया जाए-हालाँकि ये विचार पूँजीवादी और समाजवादी अर्थव्यवस्था में भी लागू होना चाहिए।जन्म लेने के साथ ही जीविका निर्वहन और मूलभूत सुविधाओँ के न्यूनतम स्तर तक हरेक व्यक्ति को मुफ्त में पैसा मिलना उसका मौलिक अधिकार बना देना चाहिए।आधार कार्ड का इस्तेमाल करके ऐसा किया जा सकता है जिससे जीविका निर्वहन और मूलभूत सुविधाओँ के न्यूनतम स्तर की राशि सरकार द्वारा हरेक व्यक्ति के बैँक खाता में सीधे डाल दी जाएगी।आप कहेंगे कि जीविका निर्वहन और मूलभूत सुविधाओँ के लिए न्यूनतम राशि मिल ही जाएगी,तो लोग काम करना बंद कर देंगे।लेकिन लोग ऐसा नहीं करेँगे।क्योँकि लोग सिर्फ न्यूनतम स्तर का जीवन जीना नहीं चाहते और वह समाज में अपना हैसियत दिखाना चाहते हैँ,इसलिए लोग काम करेंगे ही।इससे बेरोजगार और गरीब लोग मूलभूत सुविधाओं से वंचित नहीं रह पाएँगे।इसे मैंने मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल इसलिए कहा है क्योँकि हरेक व्यक्ति को मूलभूत सुविधा देने में सरकार की भी भूमिका होगी और वह व्यक्ति अपने मेहनत से भी आगे बढ़ेगा।इस प्रकार से,सरकार की मदद और उस व्यक्ति की मेहनत का मिश्रण होगा।

2.आर्थिक शक्ति का पृथक्करण और विकेन्द्रीकरण-महात्मा गाँधी ने लघु उद्योग के बारे में कहा कि इसमें कोई मजदूर होता ही नहीँ है।वहीँ,पूँजीपतियोँ को संरक्षण देते हुए पूँजीपतियोँ द्वारा लगायी जाने वाली बड़े उद्योगोँ के बारे में महात्मा गाँधी ने कह डाला कि इसमें मजदूर को मजदूर ही बने रहना चाहिए।मैं एक ऐसा मॉडल के बारे में सोच रहा हूँ जहाँ एक साथ सरकार,पूँजीपति और आमलोग सभी मिलकर मालिक की तरह काम करेंगे।सही मायने में यही मिश्रित अर्थव्यवस्था होगा।लघु उद्योगोँ को छोटे उत्पादकोँ,आम लोगोँ,पूँजीपतियोँ और सरकार की आर्थिक सहयोग से सामूहीकरण करके स्थापित किया जाएगा और आर्थिक रुप से अक्षम व्यक्ति को सरकार इसमेँ मदद करेगी।उत्पादन की प्रकिया में पूँजीपति सबसे ज्यादा,फिर आम लोग और फिर सरकार मदद करेगी।उत्पाद की मारकेटिँग का कार्य पूँजीपति का होगा और उत्पाद की मूल्य-निर्धारण का कार्य सरकार का होगा।इससे जो फायदा होगी उसका एक बड़ा हिस्सा आगे की उत्पादन,सामूहिक लघु उद्योगोँ का विस्तार और तकनीकि विकास के लिए रख लिया जाएगा और शेष हिस्सा को जिसने उत्पादन में जितना निवेश किया,उसका समानुपातिक बांट दिया जाएगा।इस तरह से सभी एक साथ काम करेंगे और मजदूर से लेकर पूँजीपति तक सभी मालिक होँगे।सरकार और पूँजीपति द्वारा मदद करने के कारण सामूहिक रुप से स्थापित लघु उद्योग तकनीकि रुप से उन्नत होगा और उसका उत्पाद गुणवत्ता युक्त और बाजार में प्रतिस्पर्ध्दा के लायक होगा।उत्पादन की प्रक्रिया में सरकार और पूँजीपति के द्वारा मदद करने और लघु उद्योगोँ का सामूहीकरण होने के कारण COST OF PRODUCTION (उत्पादन करने में लगा लागत) अपेक्षाकृत कम होगा,इसलिए PRICE OF PRODUCT (वस्तु का कीमत) भी अपेक्षाकृत कम होगा।इससे काफी लोगोँ को रोजगार मिलेगा,पूजीपतियोँ का प्रभुत्व कम होगा,लघु उद्योगोँ का पुर्नविकास होगा और वैश्विक बाजार पूँजीवादी उद्योगोँ के बजाय सामूहिक लघु उद्योगोँ के द्वारा चलेगी।इस प्रकार से आर्थिक शक्ति का पृथक्करण और विकेन्द्रीकरण हो जाएगा।

3.सेवा क्षेत्र का मिश्रित अर्थव्यवस्था-उद्योग क्षेत्र की तरह सेवा क्षेत्र मेँ भी मिश्रित अर्थव्यवस्था की एक नया मॉडल की जरुरत है।सरकार जब हरेक व्यक्ति को जीविका निर्वहन और मूलभूत सुविधाओँ के लिए न्यूनतम खर्च देगी तो लोगोँ के पास न्यूनतम स्तर का जीवन जीने के लिए पहले से ही पैसा रहेगा।इस स्थिति में हम हरेक सेवा की कीमत को एक निश्चित स्तर पर फिक्स कर सकते हैँ।चाहे स्कूल,कोचिँग का फीस हो या डॉक्टर,वकील का चार्ज हो या रुम,बस का किराया हो,सभी को एक न्यूनतम स्तर पर फिक्स किया जा सकता है क्योँकि हरेक व्यक्ति को जीवन निर्वाह और मूलभूत सुविधाओँ के लिए पहले से ही सरकारी खर्च मिल रहा होगा।इस प्रकार से महंगाई काफी कम हो जाएगी।अर्थशास्त्र की मांग व पूर्ति का नियम फेल हो जाएगा क्योकि सेवाओँ की पूर्ति कम और इन सेवाओँ का मांग ज्यादा होने के बावजूद इन सेवाओँ का कीमत नहीं बढ़ेगा।अर्थशास्त्र की मांग व पूर्ति का नियम सिर्फ पूँजीपतियोँ और सेवा प्रदाताओँ को फायदा पहुँचाने के लिए बना है।इस प्रकार से,सेवा क्षेत्र में पूँजीपतियोँ,सेवा प्रदाताओँ के साथ साथ सरकार की भी दो-स्तरीय भूमिका मूल्य-निर्धारण मेँ कार्य करेगी।

4.कृषि क्षेत्र में मिश्रित अर्थव्यवस्था-जब सारे किसानोँ को जीविका निर्वहन और मूलभूत सुविधाओँ के लिए न्यूनतम सरकारी खर्च मिलने लगेगा तो जमीन का समान वितरण करना आसान होगा क्योँकि जमीन को बराबर हिस्से मेँ बांट देने के बाद जिन्हें पहले से अब कम जमीन रह जाएगा ,उन्हें पहले की तरह जमीन से आय प्राप्त नहीं होने के बावजूद जीविका निर्वहन और मूलभूत सुविधाओँ के लिए सरकारी खर्चा मिलने के कारण विशेष परेशानी नहीँ होगी।इस प्रकार से,सरकार और किसानोँ की परस्पर भूमिका से कृषि क्षेत्र मेँ एक नया मिश्रित अर्थव्यवस्था का विकास होगा।कार्ल मार्क्स ने संपत्ति के समान वितरण का बात तो किया,लेकिन उसका कोई SUSTAINABLE AND ADOPTABLE उपाय नहीं बताया।

इन मॉडलोँ को लागू करने के लिए सरकार के पास पैसा कैसे आएगा?

इन मॉडलोँ को लागू करने के लिए पैसा तीन स्त्रोत से आएगा।

1.पूँजीपतियोँ के द्वारा जो मुनाफा कमायी जाती है उसका काफी बड़ा हिस्सा का प्रयोग सामूहिक लघु उद्योगोँ की स्थापना,उसमें उत्पादन की प्रक्रिया और उसका उत्पादोँ की मारकेटिँग के लिए किया जाएगा।

2.प्रत्येक व्यक्ति को जीविका निर्वहन और मूलभूत सुविधाओँ के लिए न्यूनतम राशि गैर-जरुरी सरकारी खर्चोँ को रोककर और मोटे वेतनों मेँ कटौती करके जुटाया जाएगा।सरकार विधायकों,सांसदोँ,अधिकारियोँ,नामचीन हस्तियोँ आदि के पीछे काफी ज्यादा गैर-जरुरी खर्च करती है,जिसे रोकना जरुरी है।अभी जिन्हें 90 हजार का मासिक वेतन मिलता है,वह 30 हजार के मासिक वेतन पर भी सही ढ़ँग से जी सकते हैँ।इसलिए ऐसे वेतनोँ में कटौती करना जरुरी है।फिर सरकारी खजाने में काफी पैसा को जुटाया जा सकता है।

3.भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाकर और काला धन को वापस लाकर भी सरकारी खजाना में काफी पैसा जुटाया जा सकता है।
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