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बेल,बेल बांड,बेलर और कानूनी गुंडागर्दी

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बेल,बेल बांड,बेलर और कानूनी गुंडागर्दी

1.दोहरी बेल प्रथा का खात्मा हो
क्या आपने कभी देखा है कि पुलिस द्वारा बेल देने के बाद न्यायालय से भी दोबारा बेल लेना पड़ता है?पुलिस द्वारा बेल देने के बाद न्यायालय द्वारा दोबारा बेल देना असंवैधानिक है।CrPC का धारा 436 जिसके तहत जमानतीय मामलोँ में बेल मिलती है और CrPC का धारा 437 जिसके तहत अजमानतीय मामलोँ में बेल मिलती है,में कहीँ भी नहीं लिखा है कि यदि पुलिस बेल दे दे तो दोबारा न्यायालय से बेल लेना पड़ेगा।फिर न्यायालय किस आधार पर दोबारा बेल देती है?सबकुछ लोगोँ को शोषित करने और लोगोँ का पैसा लूटने से जुड़ा है।न्यायालय असंवैधानिक रुप से दोबारा बेल इसलिए देती है ताकि बेल देने में जजोँ को भी घूस मिले और वकीलोँ को भी कमाई हो।जमानतीय मामले में CrPC का धारा 436 में संशोधन करके पुलिस द्वारा बेल देना अनिवार्य कर देना चाहिए और कोर्ट से बेल लेने का प्रावधान हटा देना चाहिए।अजमानतीय मामले में पुलिस द्वारा बेल नहीं देना चाहिए लेकिन पुलिस को यदि लगता है कि अभियुक्त की गिरफ्तारी की जरुरत नहीं है और इसे बेल दिया जा सकता है तो अभियुक्त को एक नोटिस थमाकर उसे दो सप्ताह के भीतर न्यायालय से बेल करा लेने का निर्देश देना चाहिए।इसके लिए CrPC का धारा 437 में संशोधन करना पड़ेगा।इस प्रकार से दोहरी बेल प्रथा को समाप्त किया जा सकता है।

2.नोटिस तामिला प्रथा का खात्मा हो
पुलिस जमानतीय मामले मेँ भी कभी कभी CrPC का धारा 41(1) के तहत नोटिस तामिला करके अभियुक्त को छोड़ती है।जब धारा अजमानतीय और संज्ञेय हो,तभी नोटिस तामिला करके छोड़ा जाता है।जब धारा जमानतीय हो तो जमानत होना चाहिए।जमानत के बजाय नोटिस तामिला करके अभियुक्त को छोड़ने पर न्यायालय से जमानत लेने में परेशानी होती है।जमानतीय मामले में कानूनी रुप से जमानत होना चाहिए फिर पुलिस नोटिस तामिला करके अभियुक्त को किस आधार पर छोड़ती है?जमानतीय मामले मेँ पुलिस द्वारा जमानत देना अनिवार्य कर देना चाहिए और अजमानतीय मामले मेँ CrPC का धारा 41(1) का प्रयोग करके नोटिस तामिला करके अभियुक्त को छोड़ने की प्रथा को समाप्त कर देना चाहिए।यदि पुलिस को लगता है कि गिरफ्तार करने की जरुरत नहीं है तो अजमानतीय मामले में नोटिस तामिला करके छोड़ने के बजाय दो सप्ताह के भीतर न्यायालय से बेल करा लेने की हिदायत देते हुए एक नोटिस अभियुक्त को पुलिस द्वारा देना चाहिए।इसके लिए जरुरी है कि CrPC का धारा 41 और 41A को समाप्त करके नोटिस तामिला की प्रथा को समाप्त किया जाए और धारा 436 और 437 में उक्त बिंदुओँ पर संशोधन हो।तब फिर ना ही दोहरी जमानत लेनी पड़ेगी,ना ही अजमानतीय मामले में पुलिस द्वारा घूस लेकर नोटिस तामिला करके अभियुक्त को छोड़ा जा सकेगा और ना ही जमानतीय मामले में पुलिस गुंडागर्दी करके अभियुक्त को जेल भेज सकेगी।

3.बेलर प्रथा का खात्मा हो
आपने देखा होगा कि चाहे मामला जमानतीय हो या अजमानतीय,बेल देने के लिए पुलिस और कोर्ट एक -दो बेलर का भी बांड बनाती है।मान लीजिए,आप गरीब हैं या आप अलग थलग रहते हैं या आपका कोई साथ नहीं देता तो फिर आप एक-दो व्यक्ति को बेलर कहाँ से बना पाएँगे?बेलर के अभाव में आपको बेल नहीं मिलेगी।हालाँकि CrPC का धारा 436 में वर्ष 2005 में संशोधन करके इसका प्रावधान किया गया है कि जमानतीय मामले में यदि कोई अभियुक्त बेलर रखने में अक्षम हो तो भी उसे जमानत दे दी जाएगी और एक सप्ताह तक उस अभियुक्त के लिए कोई बेलर नहीं मिल पाने की अवस्था में ये समझा जाएगा कि वह व्यक्ति बेलर रखने में अक्षम है।लेकिन CrPC की धारा 437 के तहत अजमानतीय मामले में बेलर नहीं होने पर बेल नहीं मिलेगा।यदि कोई व्यक्ति बेलर बन जाए तो अजमानतीय मामले मेँ बेल मिल जाएगा और कोई व्यक्ति बेलर नहीं बन पाता है तो बेल नहीँ।ऐसा क्यो?CrPC का धारा 436 के तहत बेलर नहीं होने के बावजूद जमानतीय मामले में जमानत देने का प्रावधान वर्ष 2005 से हो गया है लेकिन पुलिस और कोर्ट बगैर बेलर का जमानतीय मामले में भी जमानत नहीं देती।ये पुलिस और कोर्ट की मनमानी और गुंडागर्दी है।
CrPC का धारा 441 के तहत अभियुक्त और बेलर का बांड बनाया जाता है और इस धारा में संशोधन करके बेलर का बांड बनाने की प्रथा को हटाया जाए।यदि बेलर अक्षम साबित होता है तो CrPC का धारा 443 और यदि बेलर अपना नाम वापस ले लेता है तो CrPC का धारा 444 के तहत अभियुक्त का बेल बांड खारिज हो जाएगा और उसे जेल भेज दिया जाएगा बशर्तेँ कि वह अभियुक्त उस बेलर के जगह पर किसी दूसरे बेलर को रखने में अक्षम हो जाए।इसलिए,बेलर प्रथा को समाप्त करना चाहिए।CrPC का धारा 443 और 444 को हटा देना चाहिए।यदि बेलर अक्षम हो जाए या अपना नाम वापस ले ले तो जमानतीय मामले में भी दूसरा बेलर को नहीं रख पाने पर जमानत खारिज हो जाती है जबकि इसके इसके विपरीत CrPC का धारा 436 कहती है कि जमानतीय मामले में बगैर बेलर का भी जमानत हो सकता है।फिर जमानतीय मामले में यदि बेलर अक्षम हो जाए या नाम वापस ले ले तो दूसरा बेलर रखने किस आधार पर कहा जाता है क्योँकि बगैर बेलर का भी जमानत देने का प्रावधान है?

4 .वर्ष 2005 में CrPC में 436A एक नया धारा जुड़ा।इस धारा के तहत किसी भी विचाराधीन कैदी को उसे जितनी अधिकतम सजा दी जा सकती है,उसका आधा से ज्यादा समय तक जेल में हिरासत में नहीं रखा जा सकता है।मतलब जितनी अधिकतम सजा उसे मिलेगी,उसका यदि आधा समय जेल में बिता लिया है तो उसे जमानत देकर या बांड बनाकर जेल से रिहा कर देना चाहिए।इसी धारा में आगे प्रावधान किया गया है कि कोई भी विचाराधीन कैदी उसे जितनी अधिकतम सजा दी जा सकती है ,उससे ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में किसी भी परिस्थिति मेँ जेल में नहीं रह सकता है।लेकिन सच्चाई ये हैं कि यदि किसी विचाराधीन कैदी को अधिकतम 3 साल की सजा मिल सकती है तो उसके खिलाफ फैसला आने में 5 साल लग जाते हैं और वह व्यक्ति 3 साल के बजाय 5 साल जेल में बिताता है।धारा 436A का कोई फायदा नहीं मिल रहा है।उस अभियुक्त पर लगे धाराओं के आधार पर न्यायालय पहली सुनवाई मेँ ये तय कर दे कि अधिकतम सजा की अवधि पूरी होने पर अभियुक्त को स्वतः रिहा कर दिया जाएगा और आधा समय पूरा होने के बाद जमानत पर विचार होगा।

5.CrPC का धारा 437(6) में प्रावधान किया गया है कि ऐसे अजमानतीय मामला जो किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट के कोर्ट में चलता हो तो मजिस्ट्रेट की कोर्ट में सुनवाई शुरु होने के 60 दिनोँ के भीतर यदि फैसला नहीं आता है तो अभियुक्त को जमानत देकर रिहा कर देना चाहिए।चोरी,छीना झपटी और धमकी जैसे अजमानतीय मामले न्यायिक मजिस्ट्रेट के कोर्ट में ही चलते हैं लेकिन 60 दिनोँ के भीतर फैसला नहीं आने के बावजूद अभियुक्त को जमानत देकर रिहा नहीं किया जाता।यदि अभियुक्त को जेल भेज दिया जाता है तो मजिस्ट्रेट के कोर्ट में सुनवाई शुरु होते ही मजिस्ट्रेट द्वारा जेल प्रशासन को एक आदेश देना चाहिए कि यदि 60 दिनोँ के भीतर फैसला नहीं आ पाती है तो अभियुक्त को 60वाँ दिन कोर्ट में हाजिर किया जाए और 60वाँ दिन अभियुक्त को जमानत देकर रिहा करने पर विचार किया जाएगा।इसके लिए CrPC का धारा 437(6) में संशोधन करना चाहिए।

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