Menu
blogid : 8093 postid : 706288

जमानत के बजाय नोटिस तामिला ?????????????

VISION FOR ALL

  • 271 Posts
  • 28 Comments

कल्याणपुर थाना उमेश राय को फिलहाल जमानत नहीं दे रही है।उमेश राय को मनरेगा के मजदूरोँ का जॉब कार्ड मुखिया द्वारा जबरन रखने का विरोध करने के कारण योजना पंजी फाड़ने,मारपीट व गाली गलौज करने और सरकारी कामकाज में बाधा डालने के फर्जी आरोप में फंसा दिया गया।थाना का कहना है कि SP जब तक धारा 427 और 353 की समीक्षा करके थाना को निर्देश नहीं देते,तब तक उमेश राय को जमानत नहीं मिल सकता।उनका कहना भी जायज है क्योँकि धारा 353 अजमानतीय है और SP के द्वारा इस धारा को हटाने के बाद ही जमानत मिल सकती है।IG श्री अरविंद पांडे ने SP को दिए आदेश में कहा है कि धारा 427 और 353 का कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीँ है और उक्त बिन्दुओँ पर SP 5 दिन के भीतर अन्तिम आदेश पारित करे लेकिन आज 40 दिन हो रहा है।हालाँकि योजना पंजी फाड़ने के आरोप को बिना साक्ष्य सही करार देने और उमेश राय के साथ नामजद अभियुक्त गुरुदयाल साह को बिना साक्ष्य गिरफ्तारी करने के कारण पुलिस निरीक्षक,थानाध्यक्ष और अनुसंधानकर्ता के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के विरुध्द इन सभी से स्पष्टीकरण मांगने का कार्य SP ने शुरु कर दिया है जिसका आदेश श्री अरविंद पांडे ने SP को दिया है।

मैं उमेश राय के साथ कल कल्याणपुर थाना गया था और ASI बता रहे थे कि SP का आदेश आ जाने के बाद उमेश राय को जमानत दे देँगे या CrPC का धारा 41(1) के तहत नोटिस तामिला करके छोड़ देँगे।जब धारा अजमानतीय और संज्ञेय हो,तभी नोटिस तामिला करके छोड़ा जाता है।जब धारा जमानतीय हो तो जमानत होना चाहिए।जमानत के बजाय नोटिस तामिला करके अभियुक्त को छोड़ने पर न्यायालय से जमानत लेने में परेशानी होती है।हालाँकि आग्रह करने पर जमानत देने के लिए ASI तैयार हो गए।गवाहोँ का विरोधाभासी बयान,FIR में गवाह के रुप में नाम नहीं होने के बावजूद पुलिस द्वारा एक का गवाही लिया जाना,FIR में गवाह के रुप में नाम होने के बावजूद कुछ लोगों द्वारा गवाही नहीं देना आदि से स्पष्ट होता है कि किसी भी धारा के तहत आरोप सत्य नहीं है,इसलिए आरोप-पत्र को असत्य करार देकर न्यायालय में समर्पित करना चाहिए।
…………………………..
आर्थिक दृष्णिकोण से देखने पर यह एक मिथक ही है कि यदि व्यक्ति के पास क्षमता हो तो वह जो चाहे,वैसा कर सकता है,विशेषकर युवा असहाय नहीँ हो सकता।आखिर एक युवा या क्षमतावान व्यक्ति असहाय क्योँ नहीँ हो सकता?अब जिस तरह की आर्थिक परिदृश्य का उदय हो रहा है,उसके परिप्रेक्ष्य में इसे सोच कर देखिए।रोजगार पाने की चाहत रखने वाले लोगोँ की संख्या की अपेक्षा रोजगार का अवसर काफी कम है।भले ही एक व्यक्ति मानव संसाधन और मानव पूँजी कहलाने के सारे कसौटी पर खड़ा उतरता हो लेकिन उसे रोजगार मिलेगी तो कैसे,क्योँकि रोजगार का अवसर इतनी सीमित है कि सभी को नहीँ मिल सकती।अंततः अपने फील्ड मेँ दक्ष व्यक्ति भी अपने फील्ड से हटकर कोई दूसरा स्वरोजगार करने के लिए मजबूर हो सकता है लेकिन यहाँ पर भी वहीँ स्थिति है।आखिर उस व्यक्ति से वस्तु या सेवा की मांग कौन करेगा?क्योँकि बाजार में वैसा सैकड़ो विक्रेता/उत्पादक हैं लेकिन क्रेता/उपभोक्ता है ही नहीँ।कुछ ऐसा ही आर्थिक परिदृश्य का निर्माण हो रहा है जिसे सरकार द्वारा रोजगार के अवसर को रोजगार पाने की चाहत रखने वाले लोगोँ की संख्या के बराबर करके रोका जा सकता है।
………………………………
सोशल मीडिया समानता आधारित एक नया समाज का रचना कर रहा है।कोई व्यक्ति भले ही आर्थिक और सामाजिक रुप से कितना भी कमजोर हो लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से उन लोगोँ से भी वह व्यक्ति जुड़ सकता है जो काफी समृध्द हो,उच्च पद पर बैठा हो।समाज में ऐसे लोगोँ के साथ जुड़ना मुश्किल है।लेकिन सोशल मीडिया पर सभी एक दूसरे के साथ जुड़ जाते हैँ।धीरे धीरे समाज मेँ इसका असर दिखेगा।सोशल मीडिया पर लोग सामंतवादी सामाजिक भेदभाव को तोड़ रहे हैँ,इसलिए समाज मेँ भी ये सामंतवादी सामाजिक भेदभाव टूटने लगेगा।
………………………….
ज्यादातर न्यायाधीश,पुलिस अधिकारी अंधे होते हैँ क्योँकि उन्हेँ गड़बड़ियाँ दिखती ही नहीँ।मैँ भी थोड़ा-सा अंधा हो गया था क्योँकि मैँने तीन बड़ी गड़बड़ियाँ को देखा ही नहीँ।
1.SDO के पास की गई दिनांक 21.9.2011 की कथित शिकायत जो RTI के माध्यम से SDO ने मुझे भेजा है,उस शिकायत पर SDO का मोहर नहीं है।SDO प्रिँसिपल के साथ मिलकर पूर्व की तारीख में मैनेज करने के चक्कर मेँ मोहर लगवाना भूल गए।
2.DM के पास की गई कथित शिकायत में मोहर के भीतर दिनांक 23 SEPT 2011 को भी मोहर से डाला गया है।लेकिन गौर करने वाली बात ये हैँ कि दिनांक को DM OFFICE में कलम से लिखा जाता है ना कि दिनांक का मोहर लगाया जाता है।ये दिखाने के लिए कि पूर्व की तारीख में मैनेज ना करके उसी तारीख में शिकायत की गई थी,दिनांक वाला फर्जी मोहर लगा दिया गया है।
3.भले ही दिनांक 13.9.2012 को SDM के पास की गई कथित शिकायत पर लगे Electronic Stamp पर भी दिनांक 13.9.2012 लिखा हो लेकिन इसे भी पूर्व की तारीख में बनाया गया है क्योँकि तीसरी बार RTI आवेदन भेजने के बाद इस दस्तावेज को मुझे भेजा गया और इस सन्दर्भ मेँ मेरे द्वारा भेजी गई अवमानना नोटिस का जवाब SDO ने नहीँ दिया।
……………..
लोकपाल,लोकायुक्त के नाम पर सारी सरकार ने कमोबेश भ्रष्टाचार के खिलाफ खुद को दिखाने का सिर्फ स्वांग रचा है क्योँकि ऐसा कोई भी लोकपाल,लोकायुक्त कानून नहीँ है जिसमेँ जांच के बाद मामला को गलत पाए जाने पर शिकायतकर्ता को जेल और जुर्माने का प्रावधान ना हो।चाहे केन्द्र का लोकपाल हो या दिल्ली का जनलोकपाल या बिहार का लोकायुक्त हो या गुजरात का लोकायुक्त,सभी में शिकायत को गलत पाए जाने पर जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
ऐसा भी तो हो सकता है कि ये लोकपाल,लोकायुक्त सही शिकायत को भी जांच करके गलत करार दे दे और शिकायतकर्ता को सजा हो जाए।जब कोई सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का महज नौटंकी नहीँ कर रही है तो शिकायतकर्ता को सजा क्यो?
घोटाले और आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का शिकायत प्रत्यक्ष मूल्यांकन के आधार पर किया जाता है।ऐसे शिकायत में कोई फर्जी गवाह नहीं होता जो इरादतन झूठ बोल रहा हो।CWG घोटाले में स्टेडियम का गुब्बारा 50 करोड़ का था लेकिन प्रत्यक्ष मूल्यांकन करने से 50 लाख का भी नहीं दिखता था और इस आधार पर घोटाले की शिकायत की जाती है जहाँ ऐसा कोई इरादतन फर्जी गवाह नहीं होता जो सजा पाने का हकदार हो।
…………………….

Read Comments

Post a comment

Leave a Reply