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उपयोगिता या अनुपयोगिता का गणना करके सामाजिक-आर्थिक वृध्दि दर

VISION FOR ALL

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मैंने जीविका निर्वहन और मूलभूत सुविधा की न्यूनतम राशि मुफ्त में उपलब्ध कराने का बात कहा है।न्यूनतम राशि उपलब्ध कराने के बाद लोगों के FRUSTRATION में भी कमी आएगी।आज लोग आर्थिक रुप से असुरक्षित पाकर FRUSTRATED रहते हैं और यह असुरक्षा ही लोगों को गलत करने के लिए प्रेरित करती है,भ्रष्ट माध्यमोँ का सहारा लेकर नौकरी पाने,नामांकन पाने या कोई काम करवाने के लिए प्रेरित करती है।आर्थिक सुरक्षा मिल जाने के बाद लोगोँ का FRUSTRATION में कमी आएगी और फलत: भ्रष्टाचार में भी कमी आएगी।अर्थशास्त्र को भौतिक वस्तु के साथ साथ मानसिक विकास से जोड़कर अध्ययन करने के लिए मैंने सामाजिक-आर्थिक वृध्दि दर पर एक नया अवधारणा प्रस्तुत किया है जिसमें जातिवाद,सांप्रदायिकता,झूठे मुकदमा,भ्रष्टाचार,फिजूल खर्ची,फिजूल समय बर्बादी आदि सभी की उपयोगिता या अनुपयोगिता का गणना करके सामाजिक-आर्थिक वृध्दि दर निकाला जाएगा।रोजगार की सुरक्षा देने के लिए सामूहिक लघु उद्योगोँ का एक नया मॉडल प्रस्तुत किया है जो पूँजीपतियोँ,सरकार और आम लोगोँ की एक साथ भागीदारी से चलेगी,जिससे भी भ्रष्टाचार घटेगा और मानसिक विकास होगा।

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After independence,Indian economy was more focused on industrialization than agriculture in the first and second five year plans.Why it was so and what it proves?

1.The main reason behind focusing industrialization rather agriculture was to give benifit to capitalist class.It raises question against Nehru’s socialism and his model of mixed economy?Was Nehru socialist and pioneer of mixed economy or he was protector of Capitalist?

2.As govt,leaders and officers could get more undue corrupt advantages by such industries whether it may be public or private industry,so industrialization was more focused.

3.In the purchasing of raw materials for manufacturing,importing tools and techniques for industry,allocation of budget etc,there could be more scams and thus leaders and officers could be more corruptly benifited.

4.Govt was mainly focused to public sector in the name of socialism,but focusing idustrialization increased the influence of private industry and capitalist also which govt wanted.
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मुझे हाल फिलहाल कुछ और सबूत प्राप्त हुई है जो बिन्दुवार प्रस्तुत है-

1.पत्रांक 4285,दिनांक 29/9/2011 के माध्यम से प्रभारी पदाधिकारी,जिला जन शिकायत कोषांग,समस्तीपुर द्वारा प्राचार्य,जवाहर नवोदय विद्यालय,बिरौली,समस्तीपुर को जवाब भेजने के लिए कथित पत्र भेजा गया है लेकिन प्रभारी पदाधिकारी ने दिनांक 25/9/2011 का हस्ताक्षर इस पत्र पर किया है।इससे जाहिर होता है कि पूर्व की तारीख में इस पत्र को बनाया गया है,इसलिए ऐसी गड़बड़ियाँ आई है।25/9/2011 लिखा गया है लेकिन खुद को बचाने के लिए प्रभारी पदाधिकारी कह सकते हैं कि 29/9/2011 लिखा गया है।इसलिए ये देखना चाहिए कि क्या महीना में लिखा गया 9 से दिनांक में लिखा गया 9 मिलता है?

2.जिलाधिकारी,समस्तीपुर को दी गई कथित आवेदन पर पहले आवेदन संख्या 492 डाला गया था,फिर चालाकी से उसे काट कर 793 डाला गया है।ऐसा क्योँ किया गया?ऐसा करने के पीछे 5 ASSUMPTIONS हो सकते हैँ,जिसमें एक ASSUMPTION सत्य है।मैंने जिला जन शिकायत कोषांग जाकर रजिस्टर देखा और रजिस्टर पर आवेदन संख्या 793 से संबंधित सभी ब्यौरा दर्ज है।पूर्व की तारीख में शिकायत बनाए जाने के बावजूद रजिस्टर पर ब्यौरा दर्ज रहने के पीछे भी ये सभी Assumptions हैँ,जिसमें एक सत्य है।

i.आवेदन संख्या 492 डालकर,उसे काटकर 793 क्यों बनाया गया?यह संभव है कि आवेदन संख्या 492 किसी ऐसे आवेदक का हो,जो काफी सक्रिय हो और इसलिए उस आवेदन संख्या पर किसी फर्जी आवेदन को मैनेज करना कठिन हो।

ii.संभव है कि वास्तविक आवेदन संख्या 793 के आसपास का पन्ना रजिस्टर में खाली हो और इसलिए आवेदन संख्या 793 पर फर्जी आवेदन मैनेज करना सरल हो और इसके आगे-पीछे क्रम संख्या के आवेदन को आवेदन संख्या 793 के आगे-पीछे लिख देना सरल हो।

iii.संभव है कि वास्तविक आवेदन संख्या 793 रजिस्टर के जिस पन्ने पर दर्ज था,उसे हटाकर फर्जी आवेदन संख्या 793 और इसके आगे-पीछे के आवेदन को क्रमानुसार एक नया पन्ना पर लिखकर उसे रजिस्टर में सेट कर दिया गया हो।

iv.संभव है कि आवेदन संख्या 793 का रजिस्टर में पुनरावृति किया गया हो और इस प्रकार से वास्तविक आवेदन संख्या 793 अपने आगे-पीछे के आवेदन संख्या के साथ रजिस्टर में क्रमानुसार दर्ज हो और साथ में फर्जी आवेदन संख्या 793 भी अपने आगे-पीछे के आवेदन संख्या के साथ रजिस्टर में क्रमानुसार दर्ज हो।आवेदन संख्या 492 के आवेदक का सक्रिय रहने के कारण फर्जी आवेदन संख्या 492 बनाकर पुनरावृति करना कठिन हो।

v.संभव है कि जिस रजिस्टर को मुझे दिखाया गया था वह रजिस्टर ही फर्जी हो और उस रजिस्टर पर फर्जी आवेदन का ही ब्यौरा आगे-पीछे के वास्तविक आवेदन संख्या के साथ क्रमानुसार लिखा जाता हो या हो सकता है कि प्रिँसिपल ने पैसे देकर आवेदन संख्या 793 को दिखाने के लिए फर्जी रजिस्टर बनवा दिया हो।

3.मैंने सारे संबंधित रजिस्टरोँ का निरीक्षण करने और संबंधित आवेदन संख्या से संबंधित रजिस्टर के पन्ने में दर्ज ब्यौरा का छायाप्रति सूचना का अधिकार आवेदन दिनांक 20.1.2014 के माध्यम से जिलाधिकारी,समस्तीपुर और अनुमंडलाधिकारी,दलसिंहसराय से मांगा था।दिनांक 10/2/2014 को अनमंडलाधिकारी द्वारा भेजे गए पत्र के माध्यम से मुझे पुनः मेरे खिलाफ दायर शिकायतोँ की छायाप्रति को भेज दिया गया जिनकी मैंने मांग भी नहीं की थी क्योंकि मैं सूचना का अधिकार आवेदन लगाकर पहले ही इन शिकायतोँ की छायाप्रति प्राप्त कर चुका हूँ।इससे जाहिर होता है कि या तो रजिस्टर में ब्यौरा दर्ज ही नहीं किया गया है या यदि ब्यौरा दर्ज किया गया है तो उसमें काफी खामियाँ है जिसे अभिलेख का निरीक्षण करने के क्रम में मेरे द्वारा पकड़ा जा सकता है।इसलिए मुझे अभिलेख का निरीक्षण करने के लिए नहीं बुलाया गया।जिलाधिकारी को भेजे गए सूचना का अधिकार आवेदन का जवाब अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है।जब मैं जिला जन शिकायत कोषांग रजिस्टर देखने गया था तो वहाँ एक कर्मचारी ने जल्दीबाजी में मुझे रजिस्टर का वह पन्ना दिखाया था।यदि मुझे रजिस्टर का निरीक्षण करने दिया जाएगा तो मैं गड़बड़ियाँ को पकड़ लूँगा।

4.प्राचार्य ने जिला जन शिकायत कोषांग द्वारा दिनांक 29/9/2011 को उन्हें भेजे गए कथित पत्र पर लिखा है कि एक विस्तृत रिपोर्ट जमा किया गया और एक दिन पहले का दिनांक 18.10.2011 का हस्ताक्षर कर दिया।दिनांक 19.10.2011 को जिला प्रशासन को भेजा गया कथित रिपोर्ट मात्र एक पन्ने का है।फिर किस आधार पर इसे विस्तृत रिपोर्ट कहा गया?इससे जाहिर होता है कि ऐसी कोई रिपोर्ट भेजी ही नहीं गई थी,लेकिन जब मैंने प्राचार्य से सूचना का अधिकार आवेदन लगाकर उस रिपोर्ट को मांगा तो एक पन्ना का रिपोर्ट बनाकर मुझे भेज दिया गया और फिर जिला जन शिकायत कोषांग से मैनेज करके इस रिपोर्ट का ब्यौरा रजिस्टर में चढ़वा दिया गया।

5. अनुमंडलाधिकारी के पास की गई दिनांक 21.9.2011 की कथित शिकायत जो RTI के माध्यम से SDO ने मुझे भेजा है,उस शिकायत पर SDO का मोहर नहीं है।SDO प्रिँसिपल के साथ मिलकर पूर्व की तारीख में मैनेज करने के चक्कर मेँ मोहर लगवाना भूल गए।

6.DM के पास की गई कथित शिकायत में मोहर के भीतर दिनांक 23 SEPT 2011 को भी मोहर से डाला गया है।लेकिन गौर करने वाली बात ये हैँ कि दिनांक को DM OFFICE में कलम से लिखा जाता है ना कि दिनांक का मोहर लगाया जाता है।ये दिखाने के लिए कि पूर्व की तारीख में मैनेज ना करके उसी तारीख में शिकायत की गई थी,दिनांक वाला फर्जी मोहर लगा दिया गया है।

7.भले ही दिनांक 13.9.2012 को SDO के पास की गई कथित शिकायत पर लगे Electronic Stamp पर भी दिनांक 13.9.2012 लिखा हो लेकिन इसे भी पूर्व की तारीख में बनाया गया है क्योँकि तीसरी बार RTI आवेदन भेजने के बाद इस दस्तावेज को मुझे भेजा गया और इस सन्दर्भ मेँ मेरे द्वारा भेजी गई अवमानना नोटिस का जवाब SDO ने नहीँ दिया।

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