मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

बगहा । एक बार फिर चुनावी मौसम आया है। वाल्मीकि नगर संसदीय क्षेत्र में सियासी बाजार गर्म होने लगा है। राजनीतिक मंचों पर गन्ने की मिठास पर कड़वी राजनीति भी शुरू हो चुकी है। गन्ना मूल्य भुगतान से लेकर दाम बढ़ोतरी तक के वादे किसानों को याद हैं। चुनाव खत्म होने के बाद राजनीतिक नुमाइंदों ने वादे पूरे करने की दिशा में कितनी कोशिश की यह जगजाहिर है। साल दर साल बीतते गए न पर्ची की दिक्कत खत्म हुई और न चीनी मिलों में मूल्य भुगतान की प्रक्रिया ठीक हुई। भुगतान व पर्ची मांगने वाले किसानों पर प्रशासन ने मुकदमा दर्ज करा दी। गन्ना किसानों की पीड़ा, मिल प्रबंधन की मजबूरी और सरकारी वायदों की पड़ताल करती रिपोर्ट-

रामनगर के किसान रामानंद यादव अपनी बेटी की शादी इसलिए लटकाए हुए हैं कि उनके पास सामान्य पर प्रभेद का गन्ना है। सामान्य प्रभेद के गन्ने के लिए पर्ची नहीं मिल रही थी। अब चीनी मिल का पेराई सीजन लगभग समाप्ति की ओर है । तब जाकर जनरल वेरायटी के गन्ना की आपूर्ति के लिए पर्ची निर्गत होने लगी है। अभी एक बड़ी समस्या यह उत्पन्न हो गई है कि गन्ने की छिलाई करने के लिए मजदूर नही मिल रहे हैं। जब मजदूर मिलते हैं तो गन्ने की लोडिग करने के लिए वाहन की समस्या उत्पन्न हो जाती है। उधर बेटी की शादी जिस घर में तय हुई है वे लोग लगातार विवाह का मुहूर्त निकालने के लिए दबाव बनाए हुए हैं। रामानंद अजीब धर्म संकट की स्थिति से गुजर रहे हैं। गन्ने की आपूर्ति और भुगतान पर ही बेटी की शादी निर्भर है और यहां तरह तरह की समस्याओं के मकड़जाल में वे उलझे हुए हैं। समझ में नहीं आता क्या करें? यह समस्या सिर्फ रामनगर के रामानंद यादव की नहीं है। जिले के प्राय: मध्यमवर्गीय किसान इस पीड़ा से व्यथित हैं। कई किसान राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं के माध्यम से विधायक और सांसद के दरबार में भी पहुंचे थे। वहां भी आरजू मिन्नत की। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इनके जैसे सैकड़ों किसान वाल्मीकि नगर संसदीय क्षेत्र में हैं जो सियासत की कोल्हू में पिस रहे हैं। किसानों का यह दर्द सिर्फ इसी वर्ष का नहीं है। किसान प्रत्येक वर्ष पेराई सीजन में परेशान होते हैं। इस वर्ष चुनावी सीजन होने के कारण गन्ना किसानों की पीड़ा नेताओं के जुबान पर जरूर चढ़ेगा। क्योंकि, किसानों का एक बड़ा तबका अभी गन्ना मूल्य भुगतान और पर्ची की किल्लत को लेकर संघर्ष कर रहा है। हालांकि किसानों के इस संघर्ष का सार्थक परिणाम भी सामने दिख रहा है। अभी गन्ना मूल्य भुगतान को लेकर तेजी आई है। लेकिन, समस्या का स्थाई समाधान यह नहीं है। इसके लिए सियासी तौर पर नीति निर्धारण करना होगा। किसानों की समस्या और मिल प्रबंधन की मजबूरियों को ध्यान में रखकर गन्ना विकास नीति तैयार करनी होगी तभी इस पीड़ा से किसानों को स्थाई तौर पर राहत मिलेगी। गन्ने का क्षेत्रफल बढ़ाना किसानों की मजबूरी गन्ना किसानों की मुश्किलों का अंत यही नहीं हो जाता। गन्ने का क्षेत्रफल बढ़ाना भी किसानों की मजबूरी है। क्योंकि सिचाई का कोई बेहतर साधन नहीं है। धान ,गेहूं आदि फसलों की बिक्री के लिए कोई मार्केट नहीं है। सरकारी स्तर पर धान और गेहूं की खरीद की घोषणा जरूर होती है लेकिन सरकार के गोदाम किसानों से खरीदी गई थान के बजाय व्यापारियों की धान से भर जाती है। अभी किसानों के खेत में गेहूं पक कर तैयार है। गेहूं की कटाई आरंभ हो चुकी है। लेकिन किसानों के भंडार में धान पड़ा हुआ है। धान का कोई खरीदार नहीं है। बिहार सरकार की ओर से पैक्सों के माध्यम से धान खरीद की घोषणा जरूर हुई है । लेकिन, पैक्सों को आवंटन नहीं दिया गया है जिससे वे धान की खरीद करें। लाखों की लागत से प्रत्येक पंचायत में पैक्स के गोदाम बनाए गए हैं सारे के सारे गोदाम यूं ही खाली पड़े हैं। ऐसे में किसान मजबूर है गन्ना की खेती करने के लिए। किसानों की इसी मजबूरी का लाभ मिल प्रबंधन की ओर से उठाया जा रहा है। पिछले वर्ष मार्च तक चीनी मिलों में गन्ने की पेराई हुई थी। इस वर्ष गन्ने का क्षेत्रफल बढ़ने के कारण पूरे अप्रैल तक चीनी मिलों के चलने की संभावना है। चीनी मिलों की मजबूरी भी कम नहीं गन्ना किसानों की तरह चीनी मिलों की मजबूरी भी कुछ कम नहीं है। कभी अनुदान को लेकर सरकार स्तर पर बहानेबाजी तो कभी चीनी के घटते दाम। इससे भी मन नहीं भरा तो शीरे के उठाव को लेकर सरकारी स्तर पर लापरवाही। शीरे के उठाव को लेकर एक बानगी पिछले वर्ष बगहा चीनी मिल में दिखा। मिल प्रबंधन पेराई सीजन 2018 -19 आरंभ करने की तैयारी कर चुका था। समस्या थी पेराई सीजन 2017 -18 के शीरे की उठाव की। मिल प्रबंधन की ओर से शीरे के उठाव को लेकर प्रशासन और शासन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा था। लेकिन सुनवाई कहीं नहीं थी। आखिरकार जब मिल प्रबंधन ने नए पेराई सीजन आरंभ करने से हाथ खड़ा कर दिया। उसके बाद शासन और प्रशासन की बेचैनी बढ़ी। आनन-फानन में शीरे के उठाव की अनुमति दी गई ।फिर चीनी मिल का पेराई सीजन 2018- 19 आरंभ हुआ। अगर इतनी तत्परता शासन प्रशासन के लोग पहले दिखाएं होते तो मिल प्रबंधन को इस हद तक निर्णय नहीं लेना पड़ता। पर्ची चाहिए तो जैविक खाद लीजिए हरिनगर चीनी मिल में जैविक खाद का भी उत्पादन होता है। इस वर्ष से मिल प्रबंधन ने एक नए फंडे का इजाद किया है। पर्ची के लिए बेचैन किसानों को चीनी मिल में निर्मित जैविक खाद लेने के लिए मजबूर किया जाता है। किसान नगीना प्रसाद का कहना है कि क्वालिटी बेहद घटिया है। फिर भी मजबूरी में जैविक खाद लेना पड़ता है। क्योंकि मिल प्रबंधन की ओर से पर्ची मांगने वाले किसानों को जैविक खाद लेने के लिए मजबूर किया जाता है। चूंकि गन्ने की आपूर्ति के लिए पर्ची जरूरी है। पर्ची चाहिए तो जैविक खाद लेना है। --145331.10 हेक्टेयर भूमि में वर्ष 2017- 18 में जिले के किसानों ने लगाया था गन्ना

-- 2014- 15 पेराई सीजन में गन्ना किसानों को सरकार की ओर से मिला था पांच रुपये प्रति क्विटल बोनस

-- 9252174.14 टन गन्ने का उत्पादन वर्ष 2016- 17 में जिले के किसानों ने किया वर्ष 2017- 18 जिले के चीनी मिलों में गन्ने की पेराई

चीनी मिल पेराई चीनी उत्पादन रिकवरी

बगहा 113.36 लाख क्विटल 10. 36 लाख क्विटल 9.11 फीसद

मझौलिया 60.51 लाख क्विटल 5.46 लाख क्विटल 9.00 फीसद

हरिनगर 175.55 लाख क्विटल 17 .67 लाख क्विटल 10.04 फीसद

लौरिया 35.80 लाख क्विटल 03.19 लाख क्विटल 09 .03 फीसद

नरकटियागंज 111.80 लाख क्विटल 12. 17 लाख क्विटल 10.31 फीसद

Posted By: Jagran

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