वैशाली। हरिहर क्षेत्र विश्व का एकमात्र ऐसा मेला है, जहां हाथियों का बाजार लगता है। ज्ञान-विज्ञान और प्राद्यौगिकी की निरंतर प्रगति के बावजूद आज भी हाथी ऐसा वन्य प्राणी है, जिसे देखने की कौतूहल और उत्सुकता सबको बनी रहती है। कहते हैं कि गज-ग्राह युद्ध के बाद से धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हरिहरक्षेत्र में हाथी पालकों का हाथी के साथ आने का सिलसिला शुरू हुआ। इसे विडंबना ही कहेंगे कि इस हरिहर क्षेत्र मेले में कभी सैकड़ों हाथी लाए जाते थे। आज वह घटकर मात्र 14 की न्यूनतम संख्या पर पहुंच गया है। हैरत ये कि इतने विश्वप्रसिद्ध मेले में इस बार मात्र 14 हाथी आए जबकि थियेटरों की संख्या मेले में 9 है। हाथियों की गिरती हुई यह संख्या मेले के भविष्य के लिए कतई शुभ संकेत नहीं।

पावन नारायणी नदी के तट पर अवस्थित हाथियों के दो अलग-अलग उत्तरी और दक्षिणी बाजार हैं। वर्ष 2015 में इन दोनों बाजारों को मिलाकर मात्र 13 हाथी मेले में आए थे, जबकि वर्ष 2014 में 27 और 2013 में यह संख्या 35 थी। यह इस बात का सीधा संकेत है कि वन्य प्राणियों से संबंधित जो नियम-कानून बनाए गए, उसका सीधा असर हाथी पालकों पर पड़ा और उन्होंने इन कानूनी अड़चनों को पार करने की बजाए मेले में हाथी लाए जाना ही बंद कर दिया। परिणाम स्वरूप यह संख्या घटती चली जा रही है। विभिन्न देशों से मेले में आने वाले सैलानियों के लिए हाथी बाजार आकर्षण का केंद्र रहता है। आश्चर्य ये कि पर्यटन विभाग अथवा सरकार के स्तर पर भी हाथियों के स्नान के लिए कोई बेहतर व्यवस्था घाटों पर नहीं की जा सकी।

70 के दशक में गुलाब बाई और नीलम संध्या की थी धूम

दूसरी ओर मेले में थियेटरों की संख्या प्रत्येक वर्ष बढ़ती ही जा रही है। वर्ष 1970-75 तक मात्र नखास क्षेत्र में ही तीन थियेटर लगा करते थे। जिसमें सबसे विख्यात गुलाब बाई के बाद नीलम संध्या और मून लाइट और इससे पहले अवतार थियेटर के पंडाल यहां लगा करते थे। समय के साथ नीलम संध्या, मून लाइट और अवतार थियेटर का मेले में आना बंद हो गए। भारत थियेटर का भी मेले में एक समय क्रेज था। यह वह दौर था जब मनोरंजन के नाम पर इन थियेटरों में एक से बढ़कर एक धार्मिक, ऐतिहासिक व सामाजिक नाटकों का मंचन हुआ करता था। इसके अतिरिक्त गजल, ठुमरी, दादरा, कजरी एवं कव्वाली का कार्यक्रम भी मंच पर चढ़ता था। धीरे-धीरे बदलते वक्त में इन थियेटरों का भी दृश्य बदल गया। भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा पीछे छूट गई और उसका स्थान पाश्चात्य धुनों ने ले लिया। वर्ष 1979-80 में थियेटरों के नाम पर जो अश्लीलता पड़ोसी गई, उससे हरिहर क्षेत्र का नाम न केवल देश में बल्कि विदेशों में कलंकित हुआ।

बाद में इसके स्वरूप में व्यापक तब्दीली आई और वर्ष 1981 में प्रशासनिक सख्ती ने ऐसा रूख अख्तियार किया कि थियेटर संचालकों द्वारा देश के जाने-माने ऑरकेस्ट्रा कंपनी बावला तथा योगेश ठक्कर जैसे म्यूजिकल ग्रुप को इस मेले में लाना हुआ। यह वही दौर था, जब फिल्म अभिनेत्री जयश्री टी ने भी अपना कार्यक्रम यहां थियेटर के मंच पर प्रस्तुत किया। धीरे-धीरे यह आमदनी का जरिया बनता गया। प्रत्येक साल थियेटरों की संख्या में होती गई वृद्धि ने ऐसा रंग लाया कि नखास की कौन कहे, नखास के बाहर भी विभिन्न जगहों पर एक ही नाम से अनेक थियेटर लगे हैं।

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