वैशाली। विश्व विख्यात हरिहरक्षेत्र मेला इस समय भिन्न-भिन्न प्रकार के झूलों की राजधानी बनी हुई है। झूला किसी भी मेले की पहचान और प्रतीक होती है। बहुत पहले मेला के नखास चौक के दोनों तरफ मात्र दो झूले लगा करते थे। घीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती गई। इस बार सर्वाधिक झूले चिड़ियां बाजार मार्ग में लगे हुए हैं। कहीं खिलौना गाड़ी तो कहीं गोलाकर वर्तुल में घूमने वाले और कहीं हाथों से नचाए जाने वाला पारंपरिक झूला। बच्चों की कौन कहे बड़े भी अपने आपको नहीं रोक पा रहे हैं। नई नवेली दुल्हन के साथ इधर दुल्हे राजा झूले का आनंद उठा रहे हैं, तो उधर चोरी चुपके घर से मेले घूमने आई प्रेमिका अपने प्रेमी के संग मेले के साथ झूले का आनंद ले रही है।

इधर मेला जैसे-जैसे तय सरकारी समापन की अवधि के करीब पहुंच रहा है, वैसे ही और रंगीन होते जा रहा। इसके निखार तथा आकर्षण का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मेले में उमड़ती भीड से तिल धरने की जगह नहीं। सबसे ज्यादा भीड़ नखास एरिया एवं मेले के मीना बाजार में लगी हुई है। सुबह से देर रात तक भीड़ की यही स्थिति बनी हुई है। ग्राम श्री मंडप, पीएचईडी का नीर मंडप, हस्तशिल्प ग्राम हो अथवा रेलवे का रेल ग्राम प्रदर्शनी सभी प्रदर्शनियों में दर्शकों का आवागमन हो रहा है।

प्रदर्शनी सह बिक्री केन्द्र में कृषि कार्य में काम आने वाले खुरपी, कुदाल, हसुआ सहित अनेक प्रकार के कृषि यंत्रों की खरीदारी किसान वर्ग कर रहा है। उधर कोई चाट, भेलपुरी और पिज्जा का स्वाद ले रहा है तो कोई मशाल डोसा तथा कोई गुड़ही जबेली का रसास्वादन कर रहा है। मेले में खाने-पीने की एक से बढकर एक वस्तुएं उपलब्ध हैं। गरीब और अमीर सबों के लिए उनकी मन पसंद वस्तुओं का केन्द्र बना हुआ है यह विराट मेला।

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