सुपौल: 4 मासूम बच्चों के सिर से उठा पिता का साया, हरियाणा से घर पहुंचा उमेश का शव
हरियाणा में काम करने गए 32 वर्षीय उमेश ऋषिदेव का शव सुपौल स्थित उनके घर पहुंचते ही पूरे गांव में ...और पढ़ें

बच्चों के साथ पत्नी सुनीला। जागरण
HighLights
हरियाणा में काम करने गए उमेश ऋषिदेव की असमय मौत।
शव सुपौल पहुंचा, गांव और परिवार में गहरा मातम।
चार मासूम बच्चों के भविष्य पर उठे गंभीर सवाल।
संवाद सूत्र, जदिया (सुपौल)। रोजी-रोटी की तलाश में हरियाणा गए 32 वर्षीय उमेश ऋषिदेव का शव रविवार की रात जैसे ही जदिया थाना क्षेत्र की परसागढ़ी दक्षिण पंचायत के वार्ड संख्या-3 स्थित उनके घर पहुंचा, पूरे गांव में मातम छा गया।
घर के बाहर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी और हर किसी की जुबान पर एक ही सवाल था, अब इन चार मासूम बच्चों का सहारा कौन बनेगा।
जानकारी के अनुसार, वे करीब 20 दिन पहले गांव के कुछ साथियों के साथ हरियाणा के रोहतक जिले के लाखनमाजरा में मजदूरी करने गए थे। 11 जुलाई की रात अचानक उन्हें पेट और सीने में तेज दर्द के साथ गला जाम होने की शिकायत हुई।
साथियों ने उन्हें तत्काल नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, जहां इलाज के दौरान चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इसके बाद साथी मजदूर उनके शव को लेकर गांव पहुंचे। रविवार की रात शव के घर पहुंचते ही परिवार में चीख-पुकार मच गई।
माता-पिता, पत्नी सुनीला देवी और स्वजन का रो-रोकर बुरा हाल है। रातभर गांव और आसपास के लोग अंतिम दर्शन के लिए उमड़ते रहे। हर आंख नम थी और हर चेहरा एक मेहनतकश मजदूर की असमय मौत पर गमगीन दिखा। सबसे मार्मिक दृश्य उमेश के चार मासूम बच्चों का था।
सबसे बड़ी बेटी पांच वर्षीय शिवानी कुमारी अपने पिता के शव के पास चुपचाप बैठी लोगों को निहारती रही। उसके तीन छोटे भाई अभी इतने छोटे हैं कि उन्हें यह भी समझ नहीं है कि उनके पिता अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। घर में जुटी भीड़ और मातम का कारण भी वे नहीं समझ पा रहे थे। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों की आंखें नम कर गया।
गौरतलब है कि इसी महीने इससे पहले बघेली पंचायत निवासी मु. सलमान की भी तमिलनाडु के तिरुप्पुर में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। उनका शव एक गड्ढे से बरामद हुआ था। लगातार दूसरे प्रवासी मजदूर की मौत ने पूरे इलाके को झकझोर दिया है।
ग्रामीणों का कहना है कि बेहतर रोजी-रोटी की उम्मीद में क्षेत्र के युवा हजारों किलोमीटर दूर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने जाते हैं, लेकिन जब उनमें से कोई शव बनकर घर लौटता है तो सिर्फ एक परिवार ही नहीं, पूरा गांव शोक में डूब जाता है। उ
मेश की मौत ने एक बार फिर प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और उनके परिवारों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
