संवाद सूत्र, करजाईन बाजार (सुपौल) : नवरात्र में कन्या पूजन से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। चैती नवरात्र के अवसर पर कन्या पूजन का महत्व समझाते हुए आचार्य पंडित धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि कन्या पूजन में एक वर्ष वाली कन्या को कदापि ग्रहण नहीं करना चाहिए। क्योंकि गंध और भोग आदि वस्तुओं के स्वाद से वह बिल्कुल अनभिज्ञ रहती है। कुमारी वही कहलाती है जो कम-से-कम दो वर्ष की हो चुकी है। कन्या पूजन, उनसे होनेवाले फल की प्राप्ति तथा विभिन्न उम्र की कन्याओं को किस नाम से जाना जाता है, इस बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए आचार्य ने कहा कि तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति तथा चार वर्ष की कन्या को कल्याणी कहते हैं। पांच वर्ष वाली रोहिणी, छह वर्ष की कालिका तथा सात वर्ष वाली चंडिका कहलाती है। आठ वर्ष वाली को शाम्भवी, नौ वर्ष वाली को दुर्गा और दस वर्ष वाली कन्या को सुभद्रा कहा गया है। शास्त्रों में इस से ऊपर की अवस्थावाली कुमारी कन्या का पूजन नवदुर्गा उपासना में निषेध माना गया है। आचार्य ने बताया कि इन नौ कन्याओं के पूजन से अलग-अलग फलों की प्राप्ति होती है। दुख व दारिद्रय के शमन के लिए दो वर्षवाली कुमारी कन्या की पूजा करनी चाहिए। त्रिमूर्ति की पूजन से धर्म, अर्थ व कामना की सिद्धि होती है। साथ ही धन-धान्य का आगमन एवं पुत्र-पुत्रों का संवर्धन भी होता है। जिसको विद्या, विजय, राज्य व सुख पाने की अभिलाषा हो वह संपूर्ण कामना पूर्ण करने वाली कुमारी कल्याणी की पूजा करें। शत्रु का शमन करने के लिए कालिका की भक्तिपूर्वक आराधना करनी चाहिए। कुमारी कन्या चंडिका की पूजा से ऐश्वर्य एवं धन की प्राप्ति होती है। किसी को मोहित करने के लिए, दुख-दारिद्रय को हटाने तथा संग्राम युद्ध में विजय पाने के लिए भगवती शाम्भवी की पूजा करनी चाहिए। किसी कठिन कार्य को पूरा करने के लिए या दुष्टों का संहार करना हो तो दुर्गा की पूजा करें। इनकी भक्तिपूर्वक पूजा करने से परलौकिक सुख भी सुलभ हो जाता है। संपूर्ण मनोकामना की सफलता के लिए कुमारी कन्या सुभद्रा की उपासना करनी चाहिए। रोग नाश के लिए रोहणी की आराधना करें।

Posted By: Jagran

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