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400 साल से ताड़पत्र पर सुरक्षित है दुर्गा सप्तशती; मिथिलाक्षर लिपि में जड़ी-बूटियों की स्याही से लिखी दुर्लभ पांडुलिपि

Published: Mon, 12 Oct 2026 11:25 AM (GMT+05:30)

Palm Leaf Durga Saptashati: सुपौल में हरि किशोर सिंह का परिवार 400 साल पुरानी ताड़पत्र पर लिखी दुर्गा सप्तशती पांडुलिपि ...और पढ़ें

Palm Leaf Durga Saptashati: मिथिलाक्षर लिपि में जड़ी-बूटियों की स्याही से लिखी दुर्लभ पांडुलिपि।

Palm Leaf Durga Saptashati: मिथिलाक्षर लिपि में जड़ी-बूटियों की स्याही से लिखी दुर्लभ पांडुलिपि।

HighLights

  1. सुपौल में 400 साल पुरानी दुर्गा सप्तशती पांडुलिपि सुरक्षित।

  2. मिथिलाक्षर लिपि में जड़ी-बूटियों की स्याही से लिखित।

  3. हरि किशोर सिंह परिवार द्वारा संरक्षित, डीएम ने सराहा।

जागरण संवाददाता, सुपौल। Palm Leaf Durga Saptashati: सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों को संजोकर रखना हर पीढ़ी का नैतिक व सामाजिक दायित्व होता है। हालांकि, भागदौड़ और आधुनिकता के इस दौर में अधिकांश लोग अपनी प्राचीन विरासत के अमूल्य मोल को भूलते जा रहे हैं, लेकिन सुपौल जिले में एक ऐसा परिवार है जो चार शताब्दियों से अपनी जड़ों को सीने से लगाए हुए है।

सदर प्रखंड के सुखपुर गांव निवासी 90 वर्षीय बुजुर्ग हरि किशोर सिंह (जिन्हें क्षेत्र में लोग आदर से 'बांके बाबू' कहते हैं) ने अपने पूर्वजों की उस अमूल्य निधि को आज भी पूरी आस्था के साथ सुरक्षित रखा है, जिसे देखकर इतिहासकार और शोधकर्ता भी विस्मय में पड़ जाते हैं। उनके पास ताड़ के पत्तों (ताड़पत्र) पर लिखी सैकड़ों वर्ष पुरानी 'दुर्गा सप्तशती' आज भी मूल स्वरूप में सुरक्षित है।

मिथिलाक्षर में जड़ी-बूटियों की स्याही से उकेरे गए हैं श्लोक

ताड़ के पत्तों पर हस्तलिखित यह दुर्गा सप्तशती मिथिला की प्राचीन और समृद्ध 'मिथिलाक्षर' लिपि में रचित है। हरि किशोर सिंह बताते हैं कि उनकी उम्र अब लगभग 90 वर्ष हो चुकी है और उनके होश संभालने से पहले ही यह ग्रंथ उनके घर में पूजा-अर्चना के साथ सुरक्षित रखा गया था। पारिवारिक परंपरा के अनुसार यह पांडुलिपि करीब चार सौ वर्ष पुरानी है।

Supaul 400 Year Old Durga Saptashati Palm Leaf Manuscript (1)

बांके बाबू याद करते हुए बताते हैं कि जब वे युवावस्था में थे, तब गांव में रहने वाले एक विद्वान बंगाली परिवार के बुजुर्ग व्यक्ति को उन्होंने यह पांडुलिपि दिखाई थी। उस वक्त उन्होंने ही स्पष्ट किया था कि यह अत्यंत दुर्लभ मिथिलाक्षर लिपि में लिखी गई संपूर्ण दुर्गा सप्तशती है।

इस पांडुलिपि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे लिखने के लिए किसी रासायनिक रंग का नहीं, बल्कि प्राकृतिक जड़ी-बूटियों के रस से तैयार विशेष स्याही का प्रयोग किया गया था, जिसके कारण 400 साल बीत जाने के बाद भी इसके अक्षर आज भी बिल्कुल स्पष्ट और कलात्मक दिखाई देते हैं।

ताड़पत्र की माप और अनूठी बनावट

यह पांडुलिपि प्राचीन भारतीय ग्रंथ निर्माण शैली का अद्भुत नमूना है।

  • इसके प्रत्येक ताड़पत्र की लंबाई लगभग 24 सेंटीमीटर और चौड़ाई 3 सेंटीमीटर है।

  • सभी ताड़पत्रों के बीच में छिद्र कर उन्हें एक विशेष धागे की सहायता से आपस में पिरोया गया है।

  • पांडुलिपि को सुरक्षित रखने के लिए इसके सबसे ऊपर और नीचे मजबूत लकड़ी की विशेष पट्टियां लगाई गई हैं, जिन्हें उसी धागे से बांधा गया है।

  • इस संपूर्ण ग्रंथ की मोटाई करीब 4 सेंटीमीटर है।

समय-समय पर पारंपरिक विधियों से इसका रखरखाव किया जाता है, जिससे कीड़े या नमी से यह दुर्लभ पांडुलिपि पूरी तरह सुरक्षित बची हुई है।

Supaul 400 Year Old Durga Saptashati Palm Leaf Manuscript (2)

स्वतंत्रता दिवस पर सुपौल के डीएम ने किया सम्मानित

पांडुलिपियां हमारे पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, संस्कृति और इतिहास का जीवंत प्रमाण होती हैं। चार सौ साल पुरानी इस अमूल्य धरोहर को बिना किसी सरकारी सहायता के इतने जतन से सहेजने के लिए सुपौल जिला प्रशासन ने भी उनके प्रयासों को सलाम किया।

इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर सुपौल के जिलाधिकारी ने हरि किशोर सिंह को विशेष रूप से मंच पर आमंत्रित कर प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। हरि किशोर सिंह गर्व से कहते हैं कि अपनी प्राचीन धरोहर को सहेजना अपनी जड़ों और अस्मिता को बचाए रखने जैसा है। शारदीय नवरात्र के मौके पर उनके घर में मौजूद इस ताड़पत्र वाली दुर्गा सप्तशती के प्रति स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की श्रद्धा और बढ़ जाती है।