जागरण संवाददाता, सुपौल: मकर संक्राति का मौका है और दही चूड़ा की बात न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। यह पर्व ही दही-चूड़ा के पर्व के नाम से जाना जाता है। लोग मकर संक्रांति के मौके पर दही-चूड़ा के साथ-साथ तिलकुट, घेवर आदि का लुत्फ उठाते हैं। पर अब तो इलाके में दही के भी लाले हैं। दही के इलाके में अब डिब्बे की दही से काम चल रहा है। एक जमाना था कोसी का दही खाने के लिए लोग लालायित थे। यहां दही के बारे में मशहूर था कि अगर इसे दीवार पर फेंक दिया जाए तो यह गिरेगा नहीं। उस जमाने में दही की इतनी प्रचुरता थी कि लोग दही-चूड़ा खाते थे, चूड़ा-दही नहीं। मकर संक्रांति हो या फिर बारात का स्वरूचि भोज या श्राद्ध-कर्म का भोज लोग भर पेट दही खाते थे। अब तो थाली में एक-दो चम्मच भी मिल जाए तो समझें कि आप भाग्यशाली हैं। न वो दूध रहा और न वो दही। बदलते समय में खर-पतवार और घास की कमी से पशुपालकों का अब पशुपालन से मोह भंग होता रहा है। अब लोग डिब्बाबंद प्रोबायोटिक दही खाने लगे हैं।

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खत्म हो रही कोसी की जैव विविधता

कोसी इलाके की जैव विविधता खत्म होती जा रही है। कोसी द्वारा हिमालय के हजारों वर्ग किलोमीटर से लगाई वनस्पतियां अब इलाके से गायब हो चुकी है। कास-पटेर के इस वन-प्रांतर में अब जंगली घास दूर-दूर तक नजर नहीं आते हैं। यह वही कास-पटेर था जिस वजह से दही ऐसी जमती थी कि दही को दिवार पर फेंक दिया जाता था तो वह दिवार से गिरता नहीं था। गाय को खाने के लिए पर्याप्त मात्रा में कास-पटेर मिलता था। कास-पटेर से न सिर्फ दूध गाढ़ी होती थी बल्कि दही पोरने के क्रम में बर्तन में कास-पटेर की लत्ती भी रख दी जाती थी। कास-पटेर और करजैनी कोसी इलाके की एक जंगली लत्तीनुमा घास थी। जंगली झाड़ियों में यह अपने आप उग जाती थी। बरसात के बाद इसमें फूल उगते थे।

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पशुपालकों की व्यथा

सदर प्रखंड के पशुपालक मुरारी मंडल बताते हैं कि अब गाय पालना काफी मंहगा हो गया है। चारे के लिए न खड़-पतवार मिलता है और न ही चरने के लिए कहीं घास नजर आते हैं। बाजार में चारे की कीमत आसमान छू रही है। एक बोझा लार की कीमत 100 से 200 में आती है।

Posted By: Jagran

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