जागरण संवाददाता, सुपौल : सामाजिक सौहार्द के लिए पर्व-त्योहार की अपनी एक अलग भूमिका है। कई पर्व-त्योहार उमंग और उत्साह के बीच प्रकृति से संबंधित पाठ भी पढ़ा जाते हैं। नदियों व तालाबों की पूजा सदियों से होती चली आ रही है। छठ पर्व भी इसी से संबंधित एक पर्व है और छठ से ही संबंधित एक पर्व इसी दिन मनाया जाता है। जिसे कोसी (नदी नहीं) पूजा कहते हैं।

खासकर छपरा, सारण, भोजपुर, पटना, आरा, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण आदि के लोग जहां भी हों छठ के अवसर पर कोसी पूजा जरूर करते हैं। संध्याकालीन छठ घाट से आने के पश्चात छठ व्रतियों द्वारा घर पर कोसी की पूजा की जाती है। इस पूजा में पांच गन्ना के उपरी भाग को एक गमछा (चंदवा) में बांध कर आंगन में फैला दिया जाता है और उसके नीचे मिट्टी के बने हाथी पर कलश रखकर दीप जलाया जाता है। साथ ही तरह-तरह के पकवान मिट्टी के छोटे-छोटे ढक्कन में रखकर हाथी के इर्द-गिर्द रख दिया जाता है और इसकी पूजा की जाती है। पुन: प्रात:कालीन घाट के समय उक्त सभी पूजन सामग्री को घाट पर ले जाया जाता है, जहां पुन: पूजा की जाती है। तत्पश्चात सारी सामग्री को घर भेज दिया जाता है और इसके बाद भगवान भास्कर को अ‌र्घ्य दिया जाता है। छठ के दिन ही इस कोसी पूजा की अपनी एक अलग महत्ता है और लोग छठ के साथ-साथ कोसी की भी पूजा करते हैं। कहा जाता है कि कोसी पूजा के दौरान जो भी मन्नत मांगी जाती है, वह पूरी होती है।

Posted By: Jagran

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