जागरण संवाददाता, सुपौल: दीपावली पर्व 27 नवंबर को है। पर्व को लेकर लोग घर की साफ-सफाई में लगे हैं। इधर मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार दीए बनाने में लगे हैं। अक्सर दीया बनाने का काम कुम्हार जाति के लोग भी करते हैं। इन गरीबों के हाथ से बने दीए दीपावली के दिन लोगों के घर रोशन करते हैं, लेकिन विडंबना है कि अब युवा वर्ग इस पेशे में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। जिससे या धंधा मंदी की ओर बढ़ रहा है, ऐसे लोगों का मानना है कि दीया का व्यवसाय में मेहनताना भी नहीं निकल पाता है। जिससे लोग इस व्यवसाय से मुंह मोड़ने लगे हैं।

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बुजुर्ग लोग ही चला रहे व्यवसाय

जहां तक युवा वर्ग का सवाल है वे इस व्यवसाय से अलग हट रहे हैं। वहीं बुजुर्ग को ही यह व्यवसाय अभी भी रास आ रहा है। व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि यह धंधा पर्व विशेष होने के कारण आसपास के लोग दीया लेने आते हैं। जिन्हें ना तो नहीं कहा जाता जिसके कारण किसी तरह इस व्यवसाय को चला रहे हैं। उनका कहना है कि यह व्यवसाय तो अब फायदा का नहीं रहा। लेकिन लोगों का दिल रखने के लिए इनसे जुड़े हैं। व्यवसाय से जुड़े कालेश्वर पंडित बताते हैं कि उन्हें दो पुत्र हैं। यह सभी बाहर में काम करते हैं। बताया कि अब पहले जैसा यह व्यवसाय नहीं रहा। मिट्टी से लेकर अन्य सामग्री आसानी से नहीं मिल पाता है। यहां तक कि इसे पकाने में भी खर्च वहन करना पड़ता है। दीए को पकाने में लगभग 10 से 12 दिन का समय लग जाता है। इसके बावजूद 100 रुपये सैकड़ा बमुश्किल बिक पाता है। उन्होंने बताया सरकार या अन्य विभाग द्वारा भी इस कार्य के लिए न कोई प्रशिक्षण दिया जाता है और ना ही कला को संरक्षित रखने के लिए प्रोत्साहन ही, जिसके कारण युवा वर्ग इस व्यवसाय को करना ही नहीं चाहते हैं।

Posted By: Jagran

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