सुपौल के 100 साल पुराने दुर्गा मंदिर में आज भी जीवित है अनूठी परंपरा; कंधे पर सवार हो नगर भ्रमण करती हैं मां भगवती
सुपौल के सुखपुर गांव में स्थित 100 साल पुराना दुर्गा मंदिर अटूट आस्था और अनूठी परंपराओं का केंद्र है। यहां ...और पढ़ें

सुपौल के सुखपुर दुर्गा मंदिर का अनूठा इतिहास
HighLights
सुपौल का सुखपुर दुर्गा मंदिर 100 साल से अधिक पुराना।
शारदीय नवरात्र में उमड़ती है भक्तों की भारी भीड़।
मां की प्रतिमा कंधों पर नगर भ्रमण करती है।
संवाददाता, जागरण, सुपौल। कोसी अंचल की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विरासत को समेटे सुपौल जिले के सदर प्रखंड स्थित सुखपुर गांव की ड्योढ़ी का पुराना दुर्गा मंदिर आज भी अटूट जनआस्था, अनूठी परंपराओं और विशिष्ट पहचान का केंद्र बना हुआ है।
शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर यहां मां भगवती के दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब उमड़ता है। मान्यता है कि सच्चे मन से ड्योढ़ी स्थित इस दरबार में जो भी याचना की जाती है, मां भगवती उसे अवश्य पूर्ण करती हैं। करीब एक सदी के सफर में मंदिर का भौतिक स्वरूप भले ही खपरैल से भव्य पक्के भवन में बदल गया हो, लेकिन पूजा-अर्चना के विधान और शताब्दियों पुरानी परंपराएं आज भी उसी निष्ठा से जीवंत हैं।
1910 से 1920 के बीच स्थापित हुआ था आस्था का यह केंद्र
मंदिर की सटीक स्थापना तिथि का लिखित दस्तावेज तो नहीं मिलता, लेकिन गांव के प्रबुद्धजन हरि किशोर सिंह और डॉ. कन्हैया प्रसाद सिंह के अनुसार, भैरव प्रसाद सिंह, ईश्वरी प्रसाद सिंह एवं कृष्णमणि सिंह ने वर्ष 1910 से 1920 के बीच इस मंदिर की नींव रखी थी।
शुरुआती दौर में यह मंदिर मिट्टी और खपरैल की छत वाला हुआ करता था। समय के साथ ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के सहयोग से इसका कायाकल्प हुआ और आज यह एक भव्य व पक्के मंदिर का रूप ले चुका है, जिसकी आभा देखते ही बनती है।
स्वतः तय हैं जिम्मेदारियां, पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभा रहे दायित्व
सुखपुर की पुरानी दुर्गा मंदिर की सबसे बड़ी और प्रेरक विशेषता यहां की सामुदायिक सहभागिता है। नवरात्र के दौरान पूजा-अर्चना, साफ-सफाई, भोग-प्रसाद और व्यवस्था से जुड़े किसी भी कार्य के लिए किसी को कहना नहीं पड़ता। पूजा के विभिन्न कार्यों की जिम्मेदारी परिवारों के बीच पूर्वजों के समय से ही तय है।
संबंधित परिवारों के सदस्य समय से पूर्व पहुंचकर पूरी निष्ठा से अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं। यह व्यवस्था मंदिर के प्रति गहरी आस्था और सामाजिक एकजुटता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है।
बंगाल के मूर्तिकार के दिए सांचे से गढ़ी जाती है प्रतिमा
मंदिर में स्थापित होने वाली मां भगवती की प्रतिमा का स्वरूप भी अन्य स्थानों की मूर्तियों से पूरी तरह भिन्न और नयनाभिराम होता है। इतिहास बताता है कि प्रारंभिक दौर में बंगाल से पाल उपनाम के एक सिद्धहस्त मूर्तिकार यहां आकर प्रतिमा तैयार करते थे।
वृद्धावस्था में उन्होंने प्रतिमा निर्माण का वह विशेष पारंपरिक सांचा अपने एक स्थानीय शिष्य को सौंप दिया। वर्तमान में उसी शिष्य के वंशज उसी मूल सांचे से माता की दिव्य प्रतिमा का निर्माण करते हैं, जो इस मंदिर की विशिष्ट पहचान बन चुकी है।
कंधे पर सवार होकर नगर भ्रमण करती हैं मां, उमड़ता है जनसैलाब
सुखपुर दुर्गा मंदिर का सबसे भव्य और भावनात्मक आकर्षण विजयादशमी के दूसरे दिन होने वाला विसर्जन समारोह है। इस दिन मां भगवती की भारी प्रतिमा को वाहनों के बजाय श्रद्धालुओं द्वारा अपने कंधों पर उठाकर पूरे नगर का भ्रमण कराया जाता है।
कई घंटों तक चलने वाले इस नगर भ्रमण के दौरान मां को कंधा देने के लिए श्रद्धालुओं में भारी होड़ रहती है और लोग घंटों अपनी बारी का इंतजार करते हैं। इस अलौकिक विसर्जन दृश्य और मेले का साक्षी बनने के लिए जिले के कोने-कोने से लोग पहुंचते हैं, जिससे पूरा सुखपुर भक्तिमय हो उठता है।
