जागरण संवाददाता, सुपौल: जंग कोई भी हो उसे जीतने की जिम्मेदारी योद्धाओं पर होती है। चाहे वह जंग किसी बीमारी के ही खिलाफ क्यों न हो। पिछले साल कोरोना के खिलाफ छिड़ी जंग कोरोना योद्धाओं द्वारा जिस क‌र्त्तव्यनिष्ठा व निडरता के साथ लड़ी गई वह काबिले तारीफ है। ऐसे ही कोरोना योद्धाओं में से एक सदर प्रखंड के बैरो पंचायत में पदस्थापित एएनएम आशा है, जिन्होंने कोरोना की जंग में अहम भूमिका निभाई। आशा का कहना है कि कोरोना अपने चरम पर था। स्पेशल ट्रेन द्वारा बाहर से यात्री आ रहे थे। ऐसे यात्रियों का स्टेशन पर थर्मल स्क्रीनिग का कार्य उन्हें सौंपा गया था। कब ट्रेन आती कहना मुश्किल था। स्टेशन पर थर्मल स्क्रीनिग के बाद क्षेत्र में भी अन्य टीकाकरण के लिए जाना पड़ता था। उस समय लॉक डाउन के चलते कोई गाड़ी नहीं चलती थी। भाड़े की गाड़ी से किसी तरह क्षेत्र जाती थी। क्वारंटाइन के तहत घर-घर भी जाना पड़ता था। पन्द्रह दिनों तक सो नहीं पाई थी। एक साल के बेटे को मम्मी के पास छोड़ कर ड्यूटी जाती थी। ड्यूटी से कब लौटती इसका कोई निश्चित समय नहीं था। उस समय हम सबों पर अहम जिम्मेवारी थी। आशा उस समय एक मिसाल बनी जिन्होंने कोरोना काल के दौरान अपनी जान दांव पर लगाकर अपनी ड्यूटी बखूबी निभायी। आशा का कहना है कि मैं खुद से ज्यादा अहमियत अपने काम व मरीजों को देती हूं। उस समय हर कीमत पर सब के साथ मिलकर जंग जीतना चाहती थी। यह पूछने पर कि क्या खुद के संक्रमित होने का डर नहीं लगता था तो वे बड़े ही सहज भाव से जवाब दी कि मेरी पेशा ही मानवता की सेवा करना है। हम डर जाएंगे तो फिर मरीजों की सेवा कौन करेगा। आशा की फिलहाल ड्यूटी सदर अस्पताल के वैक्सीनेशन सेंटर में लगी है जहां वह बिना कोई परेशानी काम कर रही है। उसका कहना है कि कोरोना फिर से चुनौती बनकर खड़ी है। पिछले साल की तरह इस बार भी हम सब मिलकर डटकर इस वायरस का मुकाबला करेंगे और देश जंग जीतेगा।

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