सुपौल [विमल भारती]। कोसी नदी से घिरे सरायगढ़- भपटियाही प्रखंड के दो दर्जन से अधिक गांवों के लोग आज भी एक अस्पताल के लिए तरस रहे हैं। स्थिति यह है कि किसी के बीमार पड़ने पर लोग मरीज को कंधे पर लाद कर या खाट पर लेकर 10 से 15 किलोमीटर की दूरी तय कर अस्पताल पहुंचाते हैं।

कोसी के इन गांवों में चिकित्सक की कमी लोगों को खासा परेशान करती है। औरही, बनैनियां, बलथरबा, कटैया, भुलिया, ढोली, झखराही, सियानी, कबियाही, कड़हरी, बाजदारी, लौकहा-पलार, कोढ़ली पलार, उग्रीपट्टी आदि गांवों की यह स्थिति है। यहां सुरक्षित प्रसव की तो बात ही बेमानी है।

तटबंध के बीच बसे इन गांवों में ना तो कोई अस्पताल है और ना ही कोई चिकित्सक यहां आते हैं। पोलियो ड्रॉप पिलाने के अलावा इस इलाके के बच्चों को डीपीटी, खसरा आदि के टीके भी नहीं लग पाते। इलाके में अभी भी आधे से अधिक लोग अंधविश्वास में फंसे हैं। किसी बच्चे के बीमार होने, सर्पदंश की घटना या फिर अन्य रोगों से ग्रसित होने पर लोग पहले ओझा-गुनी के पास जाते हैं।

राहत नहीं मिलने पर ग्रामीण चिकित्सकों का सहारा लेते हैं। इस पर भी यदि बीमारी ठीक नहीं होती है तो मरीज को कंधे या खाट पर लादकर सरकारी अस्पताल पहुंचाते हैं। इलाके के मो. कलीम व राम प्रसाद मंडल बताते हैं कि सामान्य दिनों में तो किसी तरह लोग अस्पताल तक पहुंच भी जाते हैं लेकिन बारिश के मौसम में परेशानी और बढ़ जाती है।

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पहले मरीजों को कंधे पर लादकर घाट तक ले जाना होता है और बाद में नाव का इंतजार करना होता है। इसकी कोई गारंटी नहीं कि नाव मिल ही जाएगी। अगर समय पर नाव न मिली तो ऐसे में मरीजों की हालत और बिगड़ जाती है। फिर ऊपरवाले का ही आसरा रह जाता है।

ग्रामीणों का कहना है कि इलाके की भौगोलिक स्थिति भी कुछ ऐसी है कि चुनाव के दिनों के बाद कोई राजनेता इधर झांकना भी मुनासिब नहीं समझता। सुपौल के सिविल सर्जन डॉ. रामेश्र्वर साफी ने इस संबंध में पूछे जाने पर कहा कि इस इलाके में अस्पताल के लिए अबतक कोई आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है, जिस आधार पर सरकार को लिखा जा सके। चिकित्सकों की ड्यूटी तो अस्पताल स्तर पर ही लगाई जाएगी। वहां अस्पताल नहीं है तो चिकित्सक कै से पहुंचेंगे।

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Posted By: Kajal Kumari

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