सुपौल। भले ही सड़कें गांव के बीचोबीच चौड़ी गुजरने लगीं और उन्हें मान्यता राजमार्ग की दे दी गई, लेकिन गंवई संस्कृति नहीं बदली जा सकी है। सड़कों पर पहले की तरह ही अपनी मस्ती में चलना, सड़क से बिल्कुल सटाकर अपनी सीमा मानना आज भी लोगों की आदतों में शुमार है जो दुर्घटना का मुख्य कारण बन जाता है। सुरक्षित यातायात व्यवस्था को लेकर आमलोगों में जागरूकता फैलाने की जरूरत है। विकास की रफ्तार जिस तेजी से भाग रही है लोगों की मानसिकता बदलने की जरूरत भी महसूस की जा रही है। वहीं नियम कायदे कहते हैं कि जो गाड़ियां तकनीकी रूप से पूरी तरह फिट हैं वही सड़कों पर चल सकती है। परिवहन कार्यालय का हाल है कि एक सिस्टम पूर्व से डेवलप है उसके तहत सबकुछ एक व्यवस्था के अनुरूप सुचारू ढंग से चला करता है। ड्राइविग लाइसेंस बनने की अपनी प्रक्रिया है तो फिटनेस लेने की अपनी। सिस्टम का आदर कीजिये अपना काम आराम से कराइये। वैसे भी मोटर यान निरीक्षक कहते हैं कि यहां फिटनेस जांचने की तकनीकि सुविधा नहीं है। बस नजरों से देखकर व कागजों की पड़ताल कर ही फिटनेस दिया जाता है। भले ही वाहनों के फिटनेस के लिये सरकार ने कड़े नियम बना दिये हों लेकिन सड़क पर तो अपनी आजादी है। फिटनेस की चली संस्कृति ने एक परंपरा का रूप ले लिया है। और परंपरागत जुगाड़ से दिया जाता है गाड़ियों का फिटनेस। न कोई जांच की व्यवस्था और ना ही कोई पैमाना बस एक मात्र भरोसा। आज भी सड़कों पर दौड़ती हैं कबाड़ गाड़ियां भले ही विकास के पहिये के साथ सडकें चिकनी व चौड़ी होती जा रही है। हाल के वर्षो में बड़े व नये वाहनों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। नये.नये माडल की तरह-तरह की गाड़ियां सड़कों पर दौड़ती दिख जाती है। लेकिन अब भी सड़कों पर दौड़ती दिखती है कबाड़ गाड़ियां। धुआं उगलती विभिन्न सुरों में आवाज लगाती। लेकिन हाकिमों की नजर नहीं पड़ती इन गाड़ियों पर जो आमलोगों की परेशानियों का कारण होता है।

सड़कों पर बेधड़क चलती हैंअनफिट गाड़ियां सड़कों पर दौड़ती है अनफिट गाड़ियां। जब राजस्व पूर्ति की बात होती है तो ट्रैक्टर, ट्राली आदि की सघन जांच की जाती है। अन्यथा बेरोकटोक सड़कों पर दौड़ा करती है अनफिट गाड़ियां। हाइवे पर पेट्रोलिग के मामले में स्टेट हाइवे व नेशनल हाइवे के उन हिस्सों में जो जिस थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता है। स्थानीय पुलिस की पेट्रोलिग देखी जाती है। लेकिन हाइवे पर गाड़ियों के फिटनेस वगैरह की जांच यदा-कदा होती है।

ट्रैक्टर ट्रॉली और जुगाड़ का अपना अंदाज ट्रैक्टर ट्रॉली और जुगाड़ गाड़ियों का अपना अंदाज है। यदि राजस्व के टारगेट की बात नहीं हो तो कभी इन गाड़ियों की ओर नजर भी नहीं जाती अधिकारियों की। वैसे भी ट्रैक्टर ट्राली पर करों का ही बकाया होता है उसे ही वसूलने की कवायद की जाती है। गाड़ियों के फिटनेस अथवा चालक के लाइसेंस पर नजर देने की नहीं होती फुर्सत। वहीं जुगाड़ गाड़ी को तो लगता है जैसे विधिवत मान्यता सी मिल गई हो। माल ढुलाई हो तो भी और सवारी मिल जाये तो भी। छोटी सड़कें हों या फिर फोरलेन सड़क कहीं भी फर्राटे भरने से बाज नहीं आती जुगाड़ गाड़ियां।

नियम से कहां जलती है लाइटें भले ही नियमों में तरह-तरह के लाईट का प्रावधान हो लेकिन सड़कों पर यहां अपने हिसाब से लाइटों का उपयोग किया जाता है। नियमों के विपरीत अब लेजर लाइटों और एलईडी लाइटों तक लगाये जा रहे हैं जो सामने वाले को काफी परेशानी में डाल देते हैं। वैसे हेड लाईट, ब्रेक लाईट, पार्किंग लाइट, बैक लाइट, कलर रिफलेक्टर आदि तो गाड़ी के साथ ही लगे होते हैं। बाकी अन्य लाइट जो गाड़ी के साथ लगकर नहीं आते लोग सुविधाओं के ख्याल से लगाते हैं नियमों के अनुकूल नहीं माना जाता। निजी वाहनों की 15 साल बाद फिटनेस जांच सूबे के नियम कायदे के अनुसार व्यावसायिक वाहनों को प्रत्येक साल अपनी फिटनेस करानी है। जबकि निजी वाहनों के लिये रजिस्ट्रेशन के साथ ही फिटनेस दिया जाता है, और फिर पंद्रह साल बाद जब दोबारा रजिस्ट्रेशन होता है तो फिर फिटनेस कराई जाती है।

सड़कों पर नहीं हो पाती फिटनेस की जांच अधिकारियों व कर्मियों की कमी के कारण सड़कों पर अमूमन नहीं हो पाती है फिटनेस की जांच। अन्य कार्यों की भी व्यस्तता होती है अधिकारियों की, बहुत कुछ देखना है तो फिर कौन करता है फिटनेस की जांच। नतीजा है कि रूटीन वर्क में ही अधिकांश समय गुजर जाता है।

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