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RTI में झूठ बोलना DSP को पड़ा भारी, बिहार में सूचना आयोग ने लगाया 25000 का जुर्माना

Published: Fri, 04 Sep 2026 05:17 PM (IST)

बिहार राज्य सूचना आयोग ने आरटीआई में गलत जानकारी देने पर एक पुलिस अधिकारी वासुदेव राय पर 25 हजार रुपये ...और पढ़ें

RTI में झूठ बोलना DSP को पड़ा भारी, बिहार में सूचना आयोग ने लगाया 25000 का जुर्माना (AI Generated Image)

RTI में झूठ बोलना DSP को पड़ा भारी, बिहार में सूचना आयोग ने लगाया 25000 का जुर्माना (AI Generated Image)

HighLights

  1. पुलिस अधिकारी पर आरटीआई में गलत जानकारी देने का आरोप।

  2. बिहार राज्य सूचना आयोग ने 25 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया।

  3. अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई और आवेदक की सुरक्षा के निर्देश।

जागरण संवाददाता, सुपौल। सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी में कथित तौर पर गलत तथ्य प्रस्तुत करना एक पुलिस अधिकारी को भारी पड़ा है।

बिहार राज्य सूचना आयोग के राज्य सूचना आयुक्त प्रकाश कुमार ने न्यायालय के वाद संख्या ए9897/2022 में सुनवाई के बाद तत्कालीन लोक सूचना पदाधिकारी सह वर्तमान में निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, पटना में पुलिस उपाधीक्षक के पद पर कार्यरत वासुदेव राय पर आरटीआई अधिनियम की धारा 20(1) के तहत 25 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया है।

आयोग ने अर्थदंड की राशि संबंधित लोक सूचना पदाधिकारी से वसूलने के लिए डीजी, निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, डीजीपी बिहार, कोषागार पदाधिकारी सिंचाई भवन पटना, कोषागार पदाधिकारी विश्वेश्वरैया भवन पटना तथा महालेखाकार पटना को सूचना देने का निर्देश दिया है।

अनुशासनिक कार्रवाई शुरू करने का निर्देश

मामले में आयोग ने केवल आर्थिक दंड तक ही कार्रवाई सीमित नहीं रखी है। आदेश में आरटीआई अधिनियम की धारा 20(2) के तहत संबंधित लोक सूचना पदाधिकारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई शुरू करने के लिए डीजीपी बिहार को निर्देश दिया गया है।

आयोग ने इस मामले में पदाधिकारी के आचरण को गंभीरता से लेते हुए भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति रोकने की आवश्यकता भी जताई है।

दी गई गलत जानकारी

मामला सदर अंचल के ग्राम बभनी निवासी निकेश कुमार झा उर्फ राघवजी ने 27 दिसंबर 2021 को तत्कालीन लोक सूचना पदाधिकारी से आरटीआई के तहत सूचना मांगी थी।

आरोप है कि सूचना के जवाब में पहले गलत जानकारी दी गई। बाद में आयोग की सुनवाई के दौरान संबंधित पदाधिकारी ने यह पक्ष रखा कि उनके कार्यालय में ई-मेल की सुविधा ही कार्यरत नहीं थी।

मामले की सच्चाई जानने के लिए आयोग ने सुपौल के एसपी से सत्यापन प्रतिवेदन मांगा। एसपी की ओर से आयोग को दिए गए प्रतिवेदन में कार्यालय में ई-मेल सुविधा कार्यरत होने की पुष्टि किए जाने की बात सामने आई।

इसके बाद आयोग ने पदाधिकारी के कथित बयान को गंभीरता से लिया और इसे आयोग को गुमराह करने वाला आचरण माना। सुनवाई के दौरान लोक सूचना पदाधिकारी की ओर से कथित रूप से अधूरी पेशी प्रस्तुत किए जाने पर भी आवेदक ने आपत्ति जताई।

आयोग ने आवेदक की आपत्ति को गंभीरता से लेते हुए इस बिंदु पर भी संबंधित पदाधिकारी के विरुद्ध आवश्यक कार्रवाई के लिए डीजीपी बिहार को निर्देशित किया।

आवेदक की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश

आदेश पारित होने के दौरान लोक सूचना पदाधिकारी द्वारा आवेदक से कथित तौर पर उलझने के मामले को भी आयोग ने गंभीरता से लिया। आयोग ने अपने आदेश में संबंधित पदाधिकारी को कड़ी चेतावनी देते हुए भविष्य में इस प्रकार के आचरण की पुनरावृत्ति नहीं करने का निर्देश दिया।

आवेदक की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि आयोग की सुनवाई के बाद न्यायालय परिसर से बाहर निकलने पर निगरानी के पुलिस उपाधीक्षक वासुदेव राय तथा सदर के पुलिस निरीक्षक संजय कुमार ने उसे धमकाया और गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी।

मामले को गंभीर मानते हुए आयोग ने आवेदक की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए डीजीपी बिहार को निर्देश दिए हैं।

पूर्व में भी हुआ था 25 हजार का अर्थदंड

मामले को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि आवेदक की ओर से पूर्व में भी इसी लोक सूचना पदाधिकारी के विरुद्ध बिहार राज्य सूचना आयोग में वाद संख्या ए9900/2022 दायर किया गया था।

आवेदक के अनुसार, उस मामले में भी 30 जनवरी 2026 को 25 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया जा चुका है।

आरटीआई मामलों में एक ही अधिकारी के विरुद्ध बार-बार दंडात्मक कार्रवाई और अनुशासनिक कार्रवाई के निर्देश सामने आने से सूचना के अधिकार के तहत सूचना उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।