-आखिरकार किसे माना जाए गुनहगार

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फोटो नंबर-17 एसयूपी-1,2

भरत कुमार झा,सुपौल: कोसी के कारनामों से त्रस्त सुदूर इलाके में भी विकास की किरण पहुंची। बदलाव दिखा, नित्य नये आयाम गढ़े जा रहे हैं। निरंतर प्रक्रिया के तहत हमेशा कुछ न कुछ नया देखने को मिलता रहा है। लेकिन कोसी के कर्णधारों को सेहत की चिता नहीं सता रही। बड़े-बड़े भवन तो बना दिए गए लेकिन सुविधाएं नदारद। सुपौल का अस्पताल अंग्रेजों के जमाने में वाल्स हास्पीटल हुआ करता था। लोगों को उस वक्त के लिहाज से तमाम सुविधाएं मिला करती थी। जब अनुमंडल अस्पताल हुआ तो भी वर्षों तक लोगों का इस पर भरोसा हुआ करता था। लोग भरोसे के साथ अस्पताल आते और स्वस्थ होकर लौटते थे। लेकिन समय के अंतराल में

सबकुछ उलटता चला गया। सरकारें बदली अस्पताल का कायाकल्प हुआ। लेकिन व्यवस्था अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकी। अभी देखने में एक बड़ा अस्पताल का स्वरूप और सुविधाएं आज भी रेफरल वाली। अन्य अनुमंडलीय अस्पतालों के भी रंगरूप बदले,राजकीय औषधालय,कम्युनिटी हेल्थ सेंटर,स्वास्थ्य केंद्रों का स्वरूप भी बड़ा हुआ लेकिन कहीं नया भवन खंडहर हो गया और अस्पताल शिफ्ट नहीं हुआ तो कहीं भवन सुंदर बनने के बाद भी सुविधाएं नदारद। सरकारी फाइलों में तो अस्पताल बन गए लेकिन सरजमीन पर स्थिति कुछ और ही है। अब यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि आखिरकार इन परिस्थितियों के लिए किसे गुनहगार माना जाए। यहां कुछ नमूने प्रस्तुत किए जा रहे हैं जहां सरकारी राशि तो करोड़ों में खर्च कर दी गई है लेकिन इसका कोई लाभ आमलोगों को नहीं मिल पा रहा है।

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ये है लालगंज राजकीय औषधालय

सरायगढ़-भपटियाही प्रखंड के लालगंज गांव में बना राजकीय औषधालय उद्घाटन से पहले जर्जर होने लगा है। इस औषधालय के भवन निर्माण का कार्य 5 वर्ष पूर्व ही पूरा हो चुका है। भवन बनने के बाद से लालगंज सहित आसपास के दर्जनों गांव के लोगों को आस जगी कि अब वहां बड़े-बड़े डॉक्टरों की नियुक्ति होगी तथा मरीजों के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध रहेगी। लेकिन भवन निर्माण कार्य पूरा होने के बाद जो आशा का संचार लोगों में हुआ था वह अब बिल्कुल ही धूमिल होता जा रहा है। इस राजकीय औषधालय में अब तक कोई डॉक्टर तो नहीं आए लेकिन यह क्षतिग्रस्त होने लगा है। रखरखाव के अभाव में यह औषधालय मवेशियों का बसेरा बन चुका है।

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खंडहर में तब्दील भगवानपुर स्वास्थ्य केंद्र

बसंतपुर प्रखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित स्वास्थ्य सेवा उपेक्षा की शिकार है। इस क्षेत्र की बदहाल स्वास्थ्य सेवा को संजीवनी की दरकार है। क्षेत्र के लोग बदहाल स्वास्थ्य सेवा को लेकर चितित हैं। समय पर इलाज न मिलने से कई लोग बेमौत काल का ग्रास हो जाते हैं। हालात ये है कि सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों को हजारों रुपये खर्च कर नेपाल या निजी क्लिनिक का रुख करना पड़ता है। बसन्तपुर प्रखंड के भगवानपुर पंचायत के साहेवान स्थित स्वास्थ्य केंद्र का भवन अब खंडहर का रूप ले चुका है। स्थानीय लोगों की मानें तो वर्ष 1994 में इसकी नींव रखी गई थी। लेकिन आजतक लोगों को स्वास्थ्य सुविधा नसीब नहीं हो सकी है। इतना ही नहीं भगवानपुर पंचायत में ही स्थित होम्योपैथिक अस्पताल लंबे समय से बंद पड़ा है। चिकित्सक एवं अन्य कर्मियों के अभाव में यह अस्पताल बंद है। इसके चलते इस क्षेत्र के लोगों को सुलभ एवं सस्ता होम्योपैथिक चिकित्सा से वंचित होना पड़ रहा है। मालूम हो कि बिहार प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष स्व. राजेंद्र मिश्र एवं सहरसा जिला परिषद के चेयरमैन भूषण प्रसाद गुप्ता के कार्यकाल में यह अस्पताल शुरू हुआ था। उस समय लोगों को यहां सुलभ चिकित्सा मिल रही थी। लेकिन धीरे-धीरे चिकित्सक एवं कर्मियों के अभाव में यह अस्पताल बंद हो गया। यही स्थिति रतनपुर पंचायत में भी देखने को मिलती है। पंचायत के वार्ड नंबर 10 में स्थित स्वास्थ्य उपकेंद्र अपनी बदहाली पर आंसू बहाने को मजबूर है। कभी यह उपकेंद्र आसपास के कई गांवों के मरीजों से गुलजार रहता था। लेकिन व्यवस्था के डंक से यह भी अब बदहाल है। वर्षों से चिकित्सक की यहां दरकार है। एएनएम के भरोसे लोगों को स्वास्थ्य सुविधा की खानापूर्ति की जा रही है। स्वास्थ्य उपकेंद्र का भवन भी जर्जर हाल हो चुका है।

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निर्मली अनुमंडलीय अस्पताल

12 अक्टूबर 2014 को अस्पताल के उद्घाटन की औपचारिकता पूरी की गई थी। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र निर्मली के कार्यरत चिकित्सक व कर्मियों की ड्यूटी अनुमंडल अस्पताल में की गई थी किन्तु उद्घाटन के दूसरे दिन से ही सरकारी उदासीनता व चिकित्सक की कमी के चलते अस्पताल को बंद कर दिया गया। एक तरफ सरकार आम जन तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने के लिए कटिबद्ध होकर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है तो दूसरी तरफ अनुमंडल मुख्यालय में करोड़ों की लागत से 100 बेड वाला तैयार अनुमंडल अस्पताल से आमजनों को स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल पा रही है। अब तो स्थिति यह है कि अस्पताल के कमरे के शीशे व दरवाजे भी टूटने लगे हैं। फिलहाल अस्पताल रैन बसेरा बना हुआ है।

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प्रतापगंज का हेल्थ कम्युनिटी सेंटर

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की बढ़ोतरी की ²ष्टि से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में तब्दील करने की योजना के तहत प्रखंड मुख्यालय में करोड़ों की लागत से भवन बनकर तैयार है। जो बीते कई महीने से अपनी सुविधाओं से लैस होकर क्षेत्र के लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं देने की बाट जोह रहा है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रखंड मुख्यालयों में स्थापित होने वाले सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों को कम्युनिटी हेल्थ सेंटर नाम दिए जाने का प्रावधान किया गया है। इस सेंटर में 30 बेड की सुविधाएं सहित अन्य आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएगी। यानि उक्त अस्पताल या सेंटर 6 बेड से बढ़ कर 30 बेड वाला हो जाएगा। जाहिर है कि इसके लिए संसाधनों में बढोतरी की आवश्यकता होगी। लेकिन पता नहीं इसके लिए कौन हैं जिम्मेवार?

Posted By: Jagran