भरत कुमार झा,सुपौल: एक लंबे अंतराल तक कोसी के थपेड़े सहते तहस-नहस हो चुके इलाके की तस्वीर भी अब बदलने लगी है। कल तक आवागमन एक बड़ी समस्या थी और कोसकान्हा को लोग काला पानी के रूप में देखते थे। लेकिन ईस्ट-वेस्ट कॉरीडोर एनएच 57 ने तो इलाके की सूरत ही बदल डाली है। पोरबंदर से सिल्चर तक की गाड़ी इस रास्ते फर्राटे भरती है। माहौल बदला है, रहन-सहन में भी बदलाव आया है और सोच के तरीके भी बदलने लगे हैं। कोसी तटबंधों के बीच रहने वाली आबादी में भी अपने देश अपने अधिकार के प्रति जागरूकता आई है। कल तक पिछड़ों में गिने जाने वाले, किसी खास दल अथवा रहनुमा के वोट बैंक माने जाने वाले अब अपने अधिकार की बात करने लगे हैं,आज चुनावी परिचर्चाओं में भी शामिल होने लगे हैं। फोरलेन 57 से नीचे उतरते सुपौल की ओर आती सड़क में आईबी के पास का यह चौराहा है। राजनीतिक रूप से काफी सजग और सचेत। कड़ी धूप है इसलिए विशाल वृक्ष की छांव में काफी संख्या में एकत्रित लोग। बस चुनाव का पर्व सामने है इसीलिए चुनावी चर्चा में मशगूल। मैं भी रुका और उसी चर्चा का हिस्सा बन गया।

गिरधारी गांव के मो. अनवारूल ने कहा कि देश में वर्तमान में स्थिर सरकार है। हर तबके के लिए कुछ न कुछ किया है। उसकी जो आगामी योजना है उसके लिए एक मौका तो इसे दिया ही जाना चाहिए। भले ही लोग जाति जमात और कुनबे की बात करे लेकिन सच्चाई तो यही है। उसी में से बौआ लाल साह बोल पड़े जागरूकता तो आई है लोगों में। लोग अब अपने मत की कीमत समझने लगे हैं इसलिए अब किसी प्रलोभन में किसी को बरगलाया भी नहीं जा सकता है। सरकार ने जो काम किया है वह भी किसी से छिपा थोड़े ही है। हालांकि रामदेव ऋषिदेव का कहना था कि सबकुछ ठीक है लेकिन अभी तक प्रखंडों में बिचौलिया गिरी कहां रुक पाया है। कोई भुगतान चाहिए, सरकारी लाभ लेना है तो बगैर लेन-देन के कहां हो पाता है। मुझे तो शौचालय वाली राशि भी नहीं मिल पाई है। रामेश्वर रजक ने कहा कि अभी अब ई सब बात का समय थोड़े है अभी तो किसको चुनना चाहते हैं उस पर विमर्श कीजिए। रामनंदन बोले कि उपर की जो बात हो वो तो हम नहीं बताएंगे लेकिन स्थानीय स्तर पर तो उम्मीदवार देख के ही मतदान करना चाहिए। वर्तमान सांसद सत्ता दल के नहीं हैं बावजूद इनके कार्यों पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती है। तटबंध के अंदर जा-जाकर कम से कम हाल तो लोगों का अवश्य पूछती है। कौन जाता है, किसको फुर्सत है। हालांकि वहां खड़े लोगों में अधिकांश लोग मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की चुनावी सभा में जाने के लिए गाड़ी के इंतजार में खड़े थे। उस समूह को छोड़ थोड़ा आगे बढ़ा। प्रखंड कार्यालय के मुहाने पर कुछ लोग आपस में बतिया रहे थे। पूरे देश दुनियां की बात। किसको मिलेगा कितना सीट और कौन बना लेगा सरकार। जबर्दस्त बहस, मेरे पहुंचते ही वे लोग थोड़ा ठमक गए। परिचय हुआ तो फिर आगे बात चली। कोई खुलना नहीं चाह रहे थे कि किसका पलड़ा कितना भारी होगा। नागेश्वर सदा बोले कि देखिए अभी तो कहना कठिन हो रहा है लेकिन दोनों गठबंधन की अपनी पकड़ है। दोनों का अपना जनाधर है। इतना आसान नहीं है कुछ भी कह देना। देश दुनियां में जो कुछ हुआ हो लेकिन हम कोसी पीड़ित तो वहीं के वहीं है। तटबंध के किनारे बसे लोगों के लिए सीपेज किसी अभिशाप से कम है क्या। बाढ़ तो आती है चली जाती है लेकिन यह तो सालों भर सालता रहता है। हमलोगों की किसानी तो चौपट हो गई है। प्रखंड से लेकर जिले तक गुहार लगाई। नेता आते हैं चले जाते हैं लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। थोड़ा आगे निकलते हैं सड़क और रेलवे की क्रासिग है। रेलवे अमान परिवर्तन का कार्य चल रहा है। बगल के खेत में रामसुंदर प्रसाद गेहूं कटनी के बाद हल चला रहे थे। मेरे रुकने के साथ ही उन्होंने भी बैल को स्थिर किया और मेरी तरफ आए। कहिए बाबू कुछ कहना है क्या। चुनाव के बारे में कुछ पूछना है, मेरी जिज्ञाशा बढ़ी तो उन्होंने कहा कि आप आज के चौथे व्यक्ति हैं जो वोट के लिए कुछ कहने आए हैं। मैंने अपना परिचय दिया तो वे बोल पड़े कि क्या वोट गिरावें, सामने देखिए सात साल से रेलगाड़ी नहीं आ रही है मेरे गांव। कोई देखने वाला है। इधर कुछ दिनों से देख रहे हैं कि कुछ-कुछ कर रहा है। चुनाव खत्म होगा और ई लोग फिर सो जाएगा। कोसी का वहीं हाल है, बाढ़ आना है लोगों की तबाही होनी है, कौन देखता है। जो आता है उसी को कह देते हैं कि तुम्हीं को देंगे वोट। अब देखिए गांव में क्या निर्णय होता है, किसके पक्ष में लोग गोलबंद होते हैं, अभी कुछ ऐसा नहीं हुआ है, इसीलिए कुछ भी नहीं बता सकते।

Posted By: Jagran

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