-एक दर्जन गांव के बीच में नहीं है कोई उच्च विद्यालय

-नदी पार कर विद्यालय तक पहुंचना होता है काफी कठिन

-बरसात और सुखाड़ दोनों में स्कूल नहीं पहुंच पाती हैं लड़कियां

-विद्यालयों में खानापूरी के लिए होता है इन सभी का नाम

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संवाद सूत्र, सरायगढ़(सुपौल): कोसी में उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो लड़कियां चाहकर भी कैसे पढ़ पाएंगी। बांध के अंदर कोसी के इलाके में उच्च शिक्षा के नाम पर एकमात्र ललित कोसी पीड़ित उच्च विद्यालय बनैनिया बलथरबा था जो नदी के कटाव से क्षत-विक्षत हो गया। उच्च विद्यालय बलथरवा को पहले पूर्वी गाइड बांध से सटे पूरब लाया गया। जहां कुछ दिनों तक शिक्षकों ने पढ़ाई को चालू रखने का प्रयास किया। लेकिन वहां पर कोसी के छात्र-छात्राओं के नहीं पहुंचने से बड़ी कठिनाई उत्पन्न हो गई। अब बच्चे कोसी में और मवि भपटियाही के छत पर चलता है यह उच्च विद्यालय।

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प्रखंड में हैं 12 पंचायतें

प्रखंड में 12 पंचायतें हैं जिसमें से लौकहा पंचायत का लौकहा, कोढ़ली, कवियाही, कड़हरी, बाजदारी, तकिया, उग्रीपट्टी, बहुआरवा, ढोली पंचायत का सियानी, ढोली, कटैया, कटैया भुलिया, बलथरवा, गौरीपट्टी पलार, भुलिया, बनैनियां पंचायत का औरही, सनपतहा, बनैनियां, खाप सदानंदपुर सहित कुछ अन्य गांव कोसी नदी से बुरी तरह प्रभावित है। इनमें से कुछ गांव पूर्वी कोसी तटबंध के विभिन्न स्थानों तथा तटबंध के किनारे बसे हैं। यहां की खासकर छात्राओं की पढ़ाई पर विद्यालय नहीं रहने के कारण ब्रेक लगा है।

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मवि भपटियाही के छत पर चलता है उच्च विद्यालय

ललित कोसी उच्च विद्यालय का संचालन फिलहाल भपटियाही बाजार स्थित मध्य विद्यालय भपटियाही के भवन के छत पर हो रहा है। वहां कोसी के छात्र-छात्राओं का खासकर लड़कियों का पंजी पर नाम तो रहता है लेकिन कभी स्कूल नसीब नहीं होता है। कोसी क्षेत्र की यह लड़कियां परीक्षा से भी वंचित रह जाती है।

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गरीबी बन जाता है मुख्य कारण

कोसी की बेटियों को उच्च शिक्षा पाने में जो सबसे बड़ा बाधक है वह गरीबी है। नदी के कटाव के कारण कई संपन्न परिवार कंगाल बन तटबंध के किनारे मजबूरी में समय काट रहे हैं। इन परिवारों के अधिकांश पुरुष सदस्य रोजी रोटी के लिए बाहर पलायन करते हैं तो घर की बेटियां अपने कंधे पर पूरे परिवार का बोझ लेकर कामकाज चलाती है। पैसे के अभाव में इन बेटियों को समय से पुस्तकें भी नहीं मिल पाती है।

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मजदूरी से चलता है गुजारा

कोसी के कटाव के बाद विस्थापित होकर पूर्वी तटबंध के किनारे तथा स्परों पर समय काट रहे अधिकांश परिवार की लड़कियां अब मजदूरी करते देखी जाती है। कुछ लड़कियां तो आसपास के गांव में जाकर दिनभर मजदूरी करती है तब वह अपने परिवार का खर्चा चला पाती है।

Posted By: Jagran