संवाद सूत्र, करजाईन बाजार(सुपौल): सितुहर वार्ड नंबर 3 में आयोजित हनुमान महोत्सव के मौके पर आचार्य पंडित धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने हनुमान महात्म्य का वाचन करते हुए भक्तों को हनुमानजी की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन सुनाया। अपने प्रवचन के दौरान आचार्य ने कहा कि हनुमत शब्द में हनु या हनू एक विशेष घटनामय रहस्य का संकेत है। हनुमानजी वायु देवता के औरस पुत्र हैं। इनका शरीर वज्र के समान सु²ढ तथा गति गरुड़ के समान तेज थी। जन्म के समय से ही ये इतने तेजस्वी थे कि बचपन में ही भगवान सूर्य को एक फल समझकर उनको निगल जाने के लिए उछल पड़े, परंतु सूर्य तक ना पहुंच कर उदयगिरि पर्वत पर ही गिर पड़े। उस गिरी के शिला खंड पर गिरने के कारण इनकी हनु (जबड़ा) कुछ कट गई, जिसके कारण ही ये हनुमान नाम से प्रसिद्ध हुए। आचार्य ने भक्तों को हनुमान की महिमा से परिचित कराते हुए कहा कि महर्षि अगस्त्य के कथानुसार इनके पिता केसरी सुमेरु पर्वत पर राज करते थे। वहीं उनकी पत्नी अंजना ने हनुमानजी को जन्म दिया। एक दिन माता की अनुपस्थिति में पवन पुत्र भूख से व्याकुल होकर सूर्य को पकड़ने आकाश की ओर उछल पड़े। अपने पुत्र को सूर्य की ओर जाते देखकर वायुदेव भी शीतल होकर हनुमान के पीछे-पीछे चल पड़े। इस प्रकार पिता के बल से उड़ते हुए सूर्य के समीप हनुमान पहुंच गए। संयोगवश राहु भी उसी दिन सूर्यदेव को ग्रहण करना चाहता था, जब सूर्य के रथ के ऊपरी भाग में हनुमान ने स्पर्श किया तब राहु भागकर भगवान इंद्रदेव की शरण में चला गया और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। राहु की बात सुन इंद्रदेव ने क्रोधित होकर अपने वज्र से हनुमान पर प्रहार किया, जिससे हनुमान की बाई हड्डी टूट गई। हनुमान के इस प्रकार आहत होने से वायुदेव ने अपना आपा खो दिया और देवताओं सहित समस्त जगत को त्रस्त कर दिया। साथ ही अपने पुत्र हनुमान को लेकर एक गुफा में चले गए। तब इंद्रदेव सहित अन्य देवताओं के साथ ब्रह्माजी उस गुफा में आए, जहां वायुदेव अपने पुत्र हनुमान को गोद में लिए बैठे थे। यह ²श्य देखकर ब्रह्माजी को वायुदेव पर दया आ गई। ब्रह्माजी ने हनुमान को पूर्ण स्वस्थ कर दिया तथा इंद्र देवता से उन्हें वरदान देने को कहा। तब इंद्रदेव ने उन्हें वज्र के समान होने का वरदान दिया तथा हनु के टूट जाने के कारण उन्हें हनुमान नाम से प्रसिद्ध होने का भी वरदान दिया।

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