मौनी में समा जाते थे बाबा, मिट्टी भी नहीं ढक पाई थी देह; आज भी जीवंत है आस्था और शौर्य की 103 साल पुरानी परंपरा
सिवान के बंगरा में मौनिया बाबा मेला 103 साल पुरानी आस्था और शौर्य की परंपरा को आज भी जीवंत रखे ...और पढ़ें

आज भी जीवंत है आस्था और शौर्य की 103 साल पुरानी परंपरा
HighLights
मौनिया बाबा शरीर को छोटा कर मौनी में समा जाते थे।
1923 में शुरू हुआ यह मेला 103 साल से आस्था का प्रतीक।
अखाड़ों का प्रदर्शन, नागा साधु और पारंपरिक वेशभूषा मुख्य आकर्षण।
आशुतोष कुमार अभय, सिवान। ग्रामीणों की मान्यता है कि सिद्ध संत मौनिया बाबा अपने शरीर का आकार इतना छोटा कर लेते थे कि मौनी जैसे छोटे पात्र में समा जाते थे। बंगरा में एक बार पेड़ की गुफा में बैठे बाबा के शरीर पर मिट्टी डालकर ढकने का प्रयास किया गया, लेकिन मिट्टी उनकी देह को ढक नहीं सकी।
बाबा से जुड़ी ऐसी चमत्कारिक कथाएं आज भी ग्रामीणों की जुबान पर हैं और यही विश्वास हजारों श्रद्धालुओं को उनके दर्शन के लिए खींच लाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, 1923 में अंग्रेजी हुकूमत के समय मौनिया बाबा मेले की नींव पड़ी थी।
गुलामी के दौर में शुरू हुई ढोल-नगाड़ों की थाप और शौर्य प्रदर्शन की परंपरा आज भी कायम है। लाठी, भाला और झंडों के साथ अखाड़ों का प्रदर्शन मेले की पहचान है।
कुंभ की तर्ज पर विभिन्न अखाड़े अपनी सहभागिता दर्ज कराते हैं। नागा साधु-संतों के साथ हाथी-घोड़ों और पारंपरिक वेशभूषा का दृश्य श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहता है।
सवान विग्रह से बंगरा तक पहुंचने की मान्यता:
ग्रामीणों के अनुसार मौनिया बाबा सबसे पहले दाराैंदा प्रखंड के सवान विग्रह गांव पहुंचे थे। शिक्षक प्रशांत कुमार सिंह बताते हैं कि बाद में बाबा सवान से बंगरा पहुंचे। उस समय उनकी उम्र करीब 12 वर्ष रही होगी। बंगरा निवासी शिवशंकर सिंह, स्वतंत्रता सेनानी मुंशी सिंह और भास्कर सिंह के अनुसार बाबा बोलते नहीं थे।
शिक्षक कुमार राजकपूर बताते हैं कि बाबा क्या खाते थे, यह भी किसी को पता नहीं चला। ग्रामीण बताते हैं कि एक बार बंगरा के लोगों ने बाबा से भोजन करने का आग्रह किया तो उन्होंने सिर हिलाकर मना कर दिया और फिर पेड़ की गुफा में जाकर बैठ गए। उनके शरीर को मिट्टी से ढकने का प्रयास सफल नहीं हुआ। बाद में बाबा ने जीवित समाधि ली। ग्रामीणों का विश्वास है कि बंगरा पर बाबा की विशेष कृपा रही।
मेला लोक आस्था, रहस्य, ग्रामीण संस्कृति और शौर्य परंपरा का बना जीवंत दस्तावेज:
मौनिया बाबा को गौ रक्षक संत भी माना जाता है। पशुधन की रक्षा की कामना से श्रद्धालु आज भी उनके स्थान पर दूध-दही चढ़ाते हैं। करीब 103 साल बाद भी यह मेला लोक आस्था, रहस्य, ग्रामीण संस्कृति और शौर्य परंपरा का जीवंत दस्तावेज बना हुआ है।
मेले में रुकुंदीपुर के नागा बाबा और प्रधान अखाड़ा बंगरा की प्रस्तुति देखने के लिए श्रद्धालु घंटों इंतजार करते हैं। अखाड़ों के पहुंचते ही ढोल-नगाड़ों की गूंज और लाठी-भाला के करतब माहौल में रोमांच भर देते हैं।
